1990 के बाद भूमिहार समाज की राजनीति के स्तर में आये तीव्र ह्रास एवं उसके फलस्वरूप समस्त भूमिहार समाज को हुए नुकसान पर ब्रम्हर्षि चिंतक व विचारक “राजीव कुमार ” के व्यक्तिगत शोध पर आधारित प्रस्तुति –
झूठी जय जय कार, में बर्बाद हो रहा भूमिहार ।
लाख जतन कर भी , ढूंढ रहा सच्चा खेवनहार ।।
अपराधी नेताओं को सबक सिखाने का वक़्त, भू-समाज धृतराष्ट्र न बने
1990 के पूर्व चुनाव को लोकतंत्र के पर्व के रूप में जाना जाता था । परंतु मंडल कमंडल की राजनीति के नाम पर तथाकथित समाजवादियों के राजनैतिक प्रवेश ने आम चुनाव को जैसे समर का रूप दे दिया । कारण स्पष्ट था पहले स्वच्छ एवं सामाजिक चरित्र के पुरोधा लोग राजनीति में देश एवं समाज सेवा के भाव से आते थे जबकि 1990 के बाद स्थिति बिलकुल विपरीत बना दी गई । चरित्रवान एवं निष्ठावान लोगों के लिए तो जैसे छल पूर्वक देश एवं समाज सेवा के इस मार्ग को एकदम से बंद ही कर दिया गया और उनकी जगह अधिकांशतः अपराधी एवं दलाल चरित्र के लोगों के लिए इस क्षेत्र को खोल दिया गया । नतीजा सरकारी राजकोष को विभिन्न घोटालों द्वारा जमकर लूटा गया और यह सिलसिला बरक़रार है ।
जाहिर सी बात है कि जोर की आँधी के रूप में आए इस परिवर्तन की आँधी ने सबसे प्रबुद्ध एवं चरित्रवान जाति के रूप में विख्यात भूमिहार ब्राम्हण की आँखों में भी धूल झोंका और फलस्वरूप यह जाति भी अंधों की भांति अपने समाज के राजनैतिक प्रतिनिधि के रूप में सच्चे सामाजिक प्रहरियों के बजाए अपराधी एवं दलालों के फैलाए कुचक्र में फँसती चली गई जो कि बदस्तूर जारी है । कहने को बुद्धिजीवी भूमिहारों की जमीनी सच्चाई यह है कि विगत 28 सालों के दरम्यान राजनीति में इन अपराधी एवं दलालों के राजनीतिक गठजोर ने इस समाज को जोड़ो का झटका धीरे से दिया परंतु इस समाज को इसकी भनक तक नहीं लगी ।
बौद्धिक एवं सांस्कृतिक रूप से संपन्न एवं सुसभ्य भूमिहार जाति को ग्रामीण परिवेश का आधार स्तम्भ माना जाता था और अन्य जातियाँ भूमिहारों को अपना आदर्श के रूप में मानती थी । कारण भी था कि पहले भूमिहार समाज के पढ़े लिखे विद्वान एवं चरित्रवान तथा न्यायप्रिय लोग राजनीति में भेजे जाते थे एवं ऐसे ही लोगों का अपने समाज पर प्रभुत्व रहता था और ऐसे ही लोग अपने समाज को निर्देशित भी करते थे । नतीजा जहाँ एक ओर ऐसे लोगों के सानिध्य में यह समाज एक न्यायप्रिय एवं सुसभ्य समाज के रूप में विख्यात था वहीँ दूसरी जातियां भी इस समाज को बतौर आदर्श मानकर इसका ध्वजवाहक बनी रहती थी ।
परंतु मंडल की जातिगत राजनीती के प्रारम्भ ने तो जैसे भूमिहार समाज के भीतर बैठे गंदे तत्वों की चाँदी ही कर दी और ऐसे अवांछित तत्वों ने जातिगत उन्मादी माहौल रुपी हत्या -अपहरण की गन्दी राजनीति को छल पूर्वक खूब भुनाया और अपनी ही जाति के लोगों का केवल नुकसान कर उनके ही राजनैतिक मसीहा बन बैठे ।
इतिहास इस बात का शुरू से गवाह रहा है कि अच्छे लोगों के सानिध्य में सबका भला हुआ है जबकि गलत लोगों को जब जब पॉवर मिला है तब तब समाज का भारी भरकम नुकसान हुआ । आज भूमिहार समाज में शिक्षा के नाम पर लोग अपना घर बार भी बेच रहे हैं परंतु इतना त्याग के बावजूद सर्वाधिक बेरोजगारी भी इसी समाज में हैं । पढ़े लिखे इंजीनियरिंग स्नातक बहुत सारे बेरोजगार बैठे पड़े हैं । इस सबके पीछे मूल कारण है अपराधी एवं दलाल लोगों का राजनैतिक मसीहा बन बैठना क्योंकि राजनीति का मतलब है राज काज द्वारा समाज एवं देश की खुशहाली के लिए बनाई जाने वाली नीति और यह उन्हीं लोगों द्वारा संभव है जो विद्वान होंगे , दूरदर्शी होंगे ।
अपराधी एवं दलालों को तो केवल इतना पता है कि छल और प्रपंच से सत्ता उनको मिली है केवल अपने लिए धन बनाने के लिए और वो इसी कार्य में लिप्त भी हैं । इन अपराधियों एवं दलालों के गठजोर ने न केवल भूमिहार समाज को बर्बाद किया बल्कि इस समाज के अनुयायी अन्य जातियों को भी दिशाविहीन कर दिया । स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि समाज के लोग अपनी उचित माँग , उचित समस्या एवं दुखड़ा को भी इन नेताओं के समक्ष नहीं रख सकते और इसके सारे द्वार भी बंद कर दिए गए हैं ।
एक झूठा हिंदुत्व के नाम पर बरगलाने वाले समाज के नेता के बारे में तो ये भी खबर आई थी कि जब समाज के लोगों ने सांकेतिक विरोध स्वरुप उस नेता को काला झंडा दिखाया तो उस नेताजी ने बजाए इसके कि उन लोगों की बात सुनें , अपने ही लोगों पर अपने पालतू गुंडों से दौड़ा- दौड़ा डंडा चलवाया और खुलेआम अपने गुंडे चरित्र का प्रदर्शन किया । अब प्रश्न यह उठता है कि इसी लिए हम इन नेताओं को चुनते हैं एवं इनको वोट देने एवं जिताने के लिए लालायित रहते हैं ।
क्या इन नेताओं से जायज प्रश्न पूछने का भी हमें अधिकार नहीं रहा ?
क्या हमें इनकी गुंडागर्दी के आगे यूँ ही नतमस्तक हो जाना चाहिए ? अथवा चुनाव में मिल रहे इस मौके का सदुपयोग करते हुए हमें इनको पाठ पढ़ाना चाहिए । जो भी हो निर्णय पुरे भूमिहार समाज को लेना है और यह देखना काफी दिलचष्प होगा कि क्या भूमिहार समाज इसबार कोई निर्णायक सन्देश देता है या धृतराष्ट्र की ही भांति जातिगत मोंह में फंसकर खुद को और भी दल दल में धकेल देता है । दरअसल ऊपर में मैंने गलत नेताओं के एक त्रियाचरित्र का वर्णन किया है जबकि ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनकी चर्चा इस लेख में करने लगूं तो शायद मुझसे एक किताब ही लिखा जाए ।
इसी चर्चा का दूसरा पहलू यह है कि भूमिहारों में जो निष्ठावान एवं क्षमतावान लोग जो समाज को कुछ देने की स्थिति में थे उन लोगों ने अपराधियों एवं दलालों के राजनैतिक सरपरस्ती की वजह से समाज से किनारा कर लिया और नतीजा पूरा समाज पतन की राह चलने को मजबूर हो गया ।
आज भूमिहार समाज की स्थिति इतनी दयनीय हो चूकि है कि इस समाज की आँखों में इन गंदे आपराधिक एवं दलाल छवि के नेताओं द्वारा दिन दहाड़े धूल झोंका जाता है और समाज को लूटा जाता है फिर भी समाज बेफिक्र सोया हुआ है ।नए नए आपराधिक पृष्ठभूमि के लोग समाज की राजनीतिक बागडोर थामने को लालायित दिख रहे हैं एवं तैयार हो रहे हैं और अपना यह समाज उनकी सारी हकीकत जानकर भी बेपरवाह बैठा हुआ है । लोग झूठ मूठ के इन अपराधियों एवं दलालों की राजनैतिक जय जयकार में लगे हुए हैं ।
आखिर ये जानबूझकर झूठा जय जयकार कब तक चलेगा ? क्या ये समाज जबतक बर्बादी की आखिरी सीढ़ी न चढ़ ले तबतक इन अपराधी एवं दलालों की राजनैतिक जय जयकार करेगा ?
हर बार चुनाव आते हैं और बीत जाते हैं परंतु उस मौके का सदुपयोग करने से ये भूमिहार समाज क्यों वंचित हो जाता ?
आखिर कबतक हम दृष्टिविहीन बनकर और विकलांगों की भाँति हाथ पर हाथ रखकर इसी प्रकार देखते रहेंगे ? आखिर कबतक हम एक सच्चे राजनैतिक खेवनहार का इंतजार करते रहेंगे ?मैं बार बार समाज के युवा एवं बुद्धिजीवी भाइयों से विनम्र प्रार्थना करता हूँ कि वक्त अब और जाया न करें और इस चुनाव में अपराधी एवं दलाल प्रवृति के लोगों को करारा जवाब दें और इसी चुनाव से बिना किसी पार्टी के चक्कर में फँसे अपने समाज के लिए एक सच्चे राजनैतिक प्रहरी एवं खेवनहार की तलाश शुरू कर दें ।




