Rajeev Kumar

एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा

विगत तीन दशकों से भूमिहार ब्राम्हण समाज को पथभ्रष्ट कर उसको बर्बादी की आग में झोंकने पर लगातार अमादा छद्मि भूमिहार नेताओं का साथ देने हेतु एवं भूमिहार समाज की राजनीति करने हेतु फ़ड़फड़ा रहे कुछ अतिमहत्वाकांक्षी व पथभ्रष्ट युवाओं की एक नई-नवेली टोली एवं उनके घटिया सोंच व कुकृत्यों पर ब्रम्हर्षि चिंतक व विचारक के व्यक्तिगत शोध पर आधारित कलमबद्ध प्रस्तुति

लेख का शीर्षक इस लेख का उद्देश्य बताने के लिए काफी है कि आज भूमिहार ब्राम्हण समाज अपने राजनैतिक रहनुमाओं के किस प्रकार कोपभाजन का शिकार हो रहा है ।मैं अपने हर लेख में 1990 के दशक का उल्लेख करता हूँ क्योंकि इसी दौरान मैंने जीवन की गहराइयों को देखना और समझना शुरू किया था । हालाँकि बहुतेरे अनुभवी लोग मुझे बताते हैं कि भूमिहार राजनीति का सैद्धांतिक व वैचारिक पतन 1990 से भी पहले यानि 1980 के दशक से ही शुरू हो गया था । लेकिन चूँकि मैंने उस दौर को देखा और महसूस नहीं किया , इसलिए उसपर खास प्रतिक्रिया नहीं दे सकता । हाँ अलबत्ता इतना जरूर कह सकता हूँ कि श्री बाबू जैसे ईमानदार और देवतुल्य इंसान का नाम बेचकर उनके मरणोपरांत भूमिहार समाज के छलिया लोगों ने राजनीति में आसान प्रवेश का जो प्रपंच रचा , उसमें वो सफल रहे और वो प्रपंच आज भी बदस्तूर जारी है । हाँ ये बात अलग है कि आज सोशल मीडिया का जमाना है और प्रत्येक नेता के कार्यशैली एवं उसके आचरण पर सामाजिक चर्चा होने के कारण आज पूरे समाज को गुमराह कर पाना जरूर थोड़ा कठिन हो गया है , खासकर तीक्ष्ण बुद्धि वाले युवाओं को बड़गलाना ।

लेकिन ये बात भी सत्य है कि जितना ही पथभ्रष्ट और विचारहीन तथा चरित्रहीन व आपराधिक नेताओं का आगमन भूमिहार राजनीति में पिछले तीन दशकों में या चार दशकों में हुआ , उससे भी एक कदम आगे बढ़कर वैचारिक व चारित्रिक रूप से अतिनिम्न कोटि के पथभ्रष्ट युवा आज एक बार फिर से भूमिहार राजनीति का सिरमौर बनने के लिए उतावले हो रहे हैं और अपना पंख फड़फड़ा रहे हैं । इन सारे पथभ्रष्ट युवाओं का बस एक ही सोंच दीखता है कि किसी प्रकार छल करके भूमिहार समाज का राजनैतिक रहनुमा बनकर राजनीति में प्रवेश पा जाएँ और फिर सरकारी धनबल का अपने लिए लूट पाट करें । इन पथभ्रष्ट युवाओं को ऐसा लगता है कि राजनीति सबसे अच्छा व्यापार का साधन बन गया है , जहाँ प्रवेश पाकर रातोँ रात करोड़पति और अरबपति बना जा सकता है । आखिर इनकी ऐसी सोंच हो भी क्यों न , जब विगत तीन-चार दशकों में भूमिहार समाज की राजनीति करने हेतु एक से बढ़कर एक दुर्दान्त अपराधी आगे आये और उन्होंने सरकारी धन का जमकर दुरूपयोग कर अपने लिए अकूत संपत्ति अर्जित की । जिस पथभ्रष्ट और चरित्रहीन भूमिहार की कौड़ियों की भी औकाद नहीं थी , उसने भी छल पूर्वक भूमिहार राजनीति में प्रवेश पाकर गजब का धन लूट किया और पूरे भूमिहार समाज का हक़ लूटकर खुद धनवान बन बैठे । सारे पढ़े लिखे बुद्धिजीवी एवं ईमानदार लोग उन लुटेरों के मायाजाल में जातीय मोह के कारण ऐसा फँसे कि उनको इन लुटेरों के असल उद्देश्यों का भनक भी नहीं लग पाया और जब सब कुछ पता चला तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।

मैं बार बार कहता हूँ कि भूमिहार समाज को कोई वैरागी चरित्र के अति निश्छल व्यक्तित्व की तलाश करनी चाहिए जो सम्पूर्ण समाज की समृद्धि हेतु आगे आकर भूमिहार समाज की राजनैतिक बागडोर थामे ना कि भूमिहार समाज को अपराधियों, बाहुबलियों व धनकुबेरों के आगे नतमस्तक होकर अपना राजनैतिक व सामाजिक बागडोर उन्हें सौंप देना चाहिए ।
जबतक भूमिहार समाज की राजनैतिक बागडोर श्री बाबू जैसे दिव्य पुरुषों के हाथों में रहा , न केवल भूमिहार समाज ने उत्तरोत्तर तरक्की की बल्कि अन्य जातियों को भी तरक्की का सन्मार्ग दिखाकर भूमिहार समाज ने समस्त मानव जगत में अपनी खूब वाहवाही बटोरी और ढेर सारा यश भी प्राप्त किया ।लेकिन चंद लोगों के निजी स्वार्थ और छल तथा दुष्टता की पराकाष्ठा ने समस्त भूमिहार समाज को अपने आगोश में ऐसा जकड़ा कि सारे छलिया तथा आपराधिक लोग कालान्तर में इस समाज के राजनैतिक सिरमौर बनते चले गए और उन्होंने समस्त भूमिहार समाज को गर्त में डुबो दिया । आज स्थिति इतनी विपरीत है कि गाँव में भूमिहार अपना जमीन बेचकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं , फिर भी युवाओं को बेरोजगारी का दंश झेलना पड़ रहा है । किसी भी वर्तमान भूमिहार नेता को इसकी फ़िक्र नहीं कि उसके समाज में कितनी बेरोजगारी है और उसके समाज की और कौन कौन सी समस्याएँ हैं ? होगा भी क्यों जब ये नेता खुद पथभ्रष्ट हैं व वैचारिक तथा चारित्रिक रूप से शून्य हैं ।

कुछ पथभ्रष्ट और चरित्रहीन भूमिहारों को मैंने ये भी कहते सुना कि मैं फलाने राजनैतिक परिवार से हूँ ।भले ही उसके परिवार के सभी सदस्यों ने बारी-बारी से भूमिहार समाज के हक़ को लूटकर खुद के लिए अपार धन अर्जन किया और समस्त भूमिहार समाज को पतन की ओर धकेल दिया लेकिन उसकी वर्तमान पीढ़ी को आज भी दम्भ है कि वो फलाना राजनैतिक परिवार से ताल्लुकात रखता है और वो आज भी समस्त भूमिहार समाज को तोड़-मरोड़ कर उसी प्रकार सबों की आँखों में धुल झोंककर राज करेगा और पूरे भूमिहार समाज के हक़ को लूटेगा जैसा उसके पहले की पीढ़ियों ने किया । मुझे आश्चर्य होता है इन दम्भ में जीने वाले राजनैतिक महत्वाकांक्षी लोगों पर कि आज के हाईटेक युग में भी वो उसी घटिया सोंच को पाल उसी दम्भ में जी रहे हैं जिस दम्भ में उनके अग्रज छलपूर्वक अपना जीवन व्यतीत किये ।

आज जरूरत है भूमिहार ब्राम्हण समाज को समग्रता से इन बिंदुओं पर चिंतन करने की कि अब कौन हमारा राजनैतिक सिरमौर हो सकता है और कौन नहीं ?अगर समाज समय रहते सचेत नहीं हुआ तो इस समाज को अपने ही समाज में बैठे ये दुश्चरित्र राजनैतिक रावण मिट्टी में मिला देंगे ।

1 COMMENT

  1. बिल्कुल ही सही कहा आपने।आज पता नहीं हमारे कुछ युवापीढ़ी इतनी सिरफिरों की तरह क्यों बात कर रहा है।हाय रे इस समाज का दुर्भाग्य, आज भूमिहार का आईकॉन बना है, गुंडा, मवाली, अपराधी, और कुछ लोग इसका बड़ी निर्लज्जता के साथ समर्थन करते हैं।मैं अगर मान भी लूं कि तथाकथित बाहुबली, छोटे सरकार को जान बुझ कर सरकार ने फंसाया तो इससे ऐसे लोग साधु संत तो नहीं बन जाऐंगे!अगर भूमिहार के बच्चे इसी प्रकार अपने आप को अपराधियों का गुणगान करते रहेंगे, तो वह दिन दूर नहीं जब इस जाति के प्रति लोगों के मन में केवल और केवल नफरत ही होगा और उसकी शुरुआत तो हो चुकी है।पहले लोग कहा करते थे कि भूमिहार बुद्धि का पर्याय है लेकिन आज तो लगता है कि भूमिहार अपराधियों का पर्याय बन कर रह गया है ।एक अपराधी को बचाने के लिए जब हम सड़क पर आते हैं तो फिर हम नीति और नैतिकता की बात कैसे कर सकते हैं।भले युवा पीढ़ी को मेरी बात अच्छी नहीं लगे, लेकिन मैं तो व्यक्तिगत रूप से यही सलाह दुंगा कि अपराधियों को अपना आइकॉन मानकर अपनी जिंदगी बर्बाद न करें।अपराधी अंततः अपराधी ही होता है ,उससे किसी समाज का भला नहीं होता।

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