शेर-ए-बिहार योगेन्द्र शुक्ल: आज़ादी के अमर क्रांतिकारी
शेर-ए-बिहार योगेन्द्र शुक्ल: आज़ादी के अमर क्रांतिकारी

भारत की स्वतंत्रता संग्राम की लंबी लड़ाई में ऐसे अनेक वीर हुए, जिनके साहस, त्याग और अदम्य जज़्बे को इतिहास उतना स्थान नहीं दे पाया, जितने के वे हकदार थे। इन्हीं अमर सपूतों में एक नाम है—शेर-ए-बिहार बाबू योगेन्द्र शुक्ल। बिहार के वैशाली जिले में जन्मा यह बालक आगे चलकर वह योद्धा बना जिसने अंग्रेजी हुकूमत को वर्षों तक छकाए रखा, काला पानी की यातनाएँ सही, और जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े नेताओं को अपनी पीठ पर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया। आज, जब देश उनकी 65वीं पुण्यतिथि मना रहा है, तब इस शूरवीर की गाथा को याद करना एक राष्ट्रीय कर्तव्य भी है और गौरव का विषय भी।

बाल्यकाल से क्रांति की ओर

बाबू योगेन्द्र शुक्ल का जन्म 30 सितम्बर 1896 को लालगंज (वैशाली) के जलालपुर गाँव में एक साधारण भूमिहार परिवार में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही पूरी हुई। कम उम्र में माता के निधन और जीवन के संघर्षों ने उन्हें जल्दी परिपक्व बना दिया।

मुजफ्फरपुर में पढ़ाई के दौरान जब उन्होंने खुदीराम बोस को फाँसी दी जाने की घटना सुनी, तो वह उनके मन पर गहरा आघात छोड़ गई। वे देश की आजादी को अपना लक्ष्य मान चुके थे। बसावन सिंह जैसे क्रांतिकारियों से मिला मार्गदर्शन और तिलक मैदान का वातावरण उनके व्यक्तित्व को दिशा देता गया।

कृपलानी, गांधी और क्रांति–अहिंसा का द्वंद्व

भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज में अध्ययन करते समय शुक्ल जी का परिचय आचार्य जे.वी. कृपलानी से हुआ। कृपलानी का व्यक्तित्व, उनके व्याख्यान और गांधीजी से उनके संबंधों ने शुक्ल जी को बेहद प्रभावित किया। वे वर्धा आश्रम में भी गांधीजी के साथ रहे और असहयोग आंदोलन में सक्रिय रहे।

लेकिन क्रांति और अहिंसा—दोनों के बीच का वैचारिक संघर्ष उनके मन में था। गांधी के मार्ग का सम्मान करते हुए भी उन्हें लगता था कि अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए केवल सत्याग्रह पर्याप्त नहीं होगा। यही सोच उन्हें चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की पंक्ति में खड़ा कर देती है।

HSRA की नींव और हथियार उठाने का निर्णय

1925 में उन्होंने बसावन सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वे सिर्फ विचारक ही नहीं, बल्कि रणनीतिकार भी थे। बिहार और यूपी के जंगलों में उन्होंने आजाद और भगत सिंह को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी। सरकारी खजाना लूट की साहसिक कार्रवाइयों ने अंग्रेजी 정부 को हिला दिया।

गद्दारी, गिरफ्तारी और काला पानी

चन्द्रशेखर आजाद के साथ लाहौर जेल ब्रेक की योजना बना रहे शुक्ल जी अंग्रेजी खुफिया पुलिस के जाल में लगभग फँस चुके थे, पर चलती ट्रेन से कूदकर किसी तरह बच निकले।

लेकिन 12 जून 1930 को सोनपुर के मलखा चक में एक गद्दार की मुखबिरी से वे गिरफ्तार कर लिए गए। भयंकर यातनाओं के बाद उन्हें तिरहुत षड्यंत्र केस में काला पानी की सजा सुनाई गई।

सेल्युलर जेल, अंडमान में 46 दिनों की भूख–हड़ताल के बाद उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि प्रशासन को उन्हें हजारीबाग जेल भेजना पड़ा।

स्वतंत्रता की लड़ाई में पुनः सक्रिय

1938 में रिहा होने के बाद उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी जॉइन की। वे जयप्रकाश नारायण, स्वामी सहजानन्द सरस्वती और बेनीपुरी जी के निकट सहयोगी बन गए। किसान आंदोलनों और समाजवादी विचारधारा के प्रसार में उनका बड़ा योगदान रहा।

भारत छोड़ो आंदोलन और इतिहास की अद्भुत घटना

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का निर्णायक मोड़ था। इस समय जेपी, बेनीपुरी और अन्य कई नेता हजारीबाग जेल में बंद थे। जेल से भागने की योजना में शुक्ल जी अग्रणी भूमिका में थे।

9 नवंबर 1942 की रात जब सभी नेता दीवार फांदकर भाग निकले, तब जयप्रकाश नारायण गंभीर रूप से बीमार थे और चलने में असमर्थ थे। ऐसे में योगेन्द्र शुक्ल उन्हें अपने कंधे पर उठाकर कठिन जंगलों, पगडंडियों और जोखिम भरे रास्तों से हजारीबाग से गया तक पैदल ले आए।
यह घटना स्वतंत्रता संग्राम की सबसे असाधारण घटनाओं में गिनी जाती है।

बाद में अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए 5000 रुपये का इनाम घोषित किया, पर वे पुलिस को चकमा देकर आंदोलन में सक्रिय रहे।

नेपाल में आज़ाद दस्ता का गठन

1943 में अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए नेपाल के कोशी क्षेत्र में ‘आज़ाद दस्ता’ नामक गुरिल्ला संगठन बनाने की योजना बनी। शुक्ल जी इस अभियान के प्रमुख स्तंभ रहे। अंग्रेजी दबाव पर नेपाल सरकार ने छापेमारी की, कई नेता गिरफ्तार हुए, परंतु शुक्ल जी और सूरज नारायण सिंह नेतृत्व में सक्रिय रहे।

आज़ादी के बाद की राजनीतिक यात्रा

स्वतंत्रता के उपरांत 1952 के पहले आम चुनाव में वे लालगंज से चुनाव मैदान में उतरे, पर कांग्रेस उम्मीदवार बाबू ललितेश्वर प्रसाद शाही से पराजित हुए। 1958 में वे प्रजा समाजवादी दल से विधान परिषद के सदस्य बने।

19 नवम्बर 1960 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया।

दुःखद है कि जिस वीरता और योगदान के वे अधिकारी थे, वैसा सम्मान उन्हें जीवित रहते या स्वतंत्र भारत में नहीं मिला। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उनके नाम का डाक टिकट जारी कर इस महानायक को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया।

निष्कर्ष : एक भूला–बिसरा पर अटल प्रकाश

बाबू योगेन्द्र शुक्ल का जीवन त्याग, साहस, निष्ठा और राष्ट्रप्रेम का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने न पद चाहा, न प्रसिद्धि; बस देश की स्वतंत्रता को ही अपना धर्म माना।

आज जब हम आज़ादी का अमृतकाल मना रहे हैं, तब इस महान सेनानी को याद करना हमारी जिम्मेदारी है।
उनके संघर्ष, साहस और सेवा को इतिहास में जितना स्थान मिलना चाहिए था, उतना अभी भी नहीं मिला है।

शेर-ए-बिहार, क्रांति-पथ के अमर पथिक बाबू योगेन्द्र शुक्ल को शत–शत नमन।

(गंगोत्री प्रसाद सिंह ,अधिवक्ता ,सिविल कोर्ट हाजीपुर ,वैशाली)