” भूमिहार समाज दोहरी लड़ाई लड़ रहा है एक बाहरी शक्तियों से तो दूसरी अपने ही समाज के अंदर बैठे राजनैतिक रावणों ( दलालों ) से “
हालिया सामाजिक गतिविधियों एवं व्यक्तिगत शोध पर आधारित ब्रह्मऋषि चिंतक एवं विचारक “राजीव कुमार ” की प्रस्तुति : –
खल मंडली बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती॥
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती॥
भावार्थ:-दिन-रात दुष्टों की मंडली में बसते हो। (ऐसी दशा में) हे सखे! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता है? मैं तुम्हारी सब रीति (आचार-व्यवहार) जानता हूँ। तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, तुम्हें अनीति नहीं सुहाती॥
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया॥
भावार्थ:-हे तात! नरक में रहना वरन् अच्छा है, परंतु विधाता दुष्ट का संग (कभी) न दे। (विभीषणजी ने कहा-) हे रघुनाथजी! अब आपके चरणों का दर्शन कर कुशल से हूँ, जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है॥
उपरोक्त पंक्तियाँ तुलसीदास रचित रामायण से उद्धरित की गई हैं । ये पंक्तियाँ अक्षरसः आज के भूमिहार ब्राम्हण समाज के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक हैं । भूमिहार ब्राम्हण समाज आज अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु दोहरी लड़ाई लड़ रहा है । एक लड़ाई बाह्य शक्तियों से तो दूसरी अपने समाज के भीतर ही बैठे उन दुष्टों ( छलिया रावणों ) से जो समाज के भीतर ही बैठकर अपने ही समाज का लगातार अहित कर रहे हैं और पूरे भूमिहार ब्राम्हण समाज को बर्बादी की आग में झोंकने पर अमादा हैं । हम परशुराम के वंशज हैं और हम ब्रह्मऋषि हैं । हम ब्रह्मऋषियों का आदि काल से इतिहास रहा है कि हम अन्याय के खिलाफ लड़ाई लड़ते रहे हैं । परंतु दुर्भाग्य यह है कि सत्य और मर्यादा की बात करने वाला ब्रह्मऋषि समाज आज खुद इसी अन्तर्द्वन्द से जूझ रहा है और अपने ही समाज के भीतर बैठे दुष्टों ( छलिया रावणों ) की गिरफ्त में इस कदर जकड़ चुका है कि उससे निकलने की लाख जद्दोजहद करने के बावजूद निकल नहीं पा रहा है ।
बात जब जब ब्रह्मऋषि समाज को सकारात्मक दिशा देने की होती है तो हर प्रयास को विफल करने हेतु ब्रह्मऋषि समाज के भीतर बैठे दुष्ट ( छलिया रावण ) लोग आगे आ जाते हैं और अपनी पूरी ऊर्जा समस्त ब्रह्मऋषि समाज को दिग्भ्रमित करने में लगा देते हैं । नतीजा ब्रह्मऋषि समाज अपनी खोई हुई सकारात्मक शक्ति को पुनः प्राप्त करने से वंचित रह जाता है ।
किसी भी समाज की धूरी और स्तम्भ उस समाज के बौद्धिक और साधु प्रवृति के लोग होते हैं जो समाज को पथभ्रष्ट होने से सदैव बचाने को तत्पर रहते हैं और किसी भी विपरीत परिश्थिति में उचित निर्णय लेते हैं जो समाज के हित में होता है । लेकिन 1990 के उपरान्त इन बौद्धिक एवं साधू प्रवृति के लोगों की गिरफ्त से भूमिहार ( ब्रह्मऋषि ) समाज की बागडोर को लुच्चे एवं अपराधिक लोगों ने अपने हाथों में ले लिया और नतीजा पूरा का पूरा ब्रह्मऋषि समाज दिशाविहीन हो गया और पतन की ओर अग्रसर हो चला ।
अपराधिक लोगों की सामाजिक हैसियत इतनी बढ़ती गई कि ब्रह्मऋषि समाज की राजनीति में अब इक्के दुक्के भले लोगों के अपवाद को यदि छोड़ दें तो आज हर जगह हर ओड़ इन अपराधियों का ही राजनैतिक दबदबा कायम हो चुका है । बात जब भी ब्रह्मऋषि समाज के सुधार की होगी हर बार शुरुआत राजनैतिक सुधार से ही होगी क्योंकि सही दिशा में की गई राजनीति ही समाज में खुशहाली ला सकती है तथा एकता एवं भाईचारा कायम कर सकती है जबकि ठीक इसके विपरीत गलत मंशा के साथ एवं गलत दिशा में की गई राजनीति पुरे देश और समाज को बर्बादी की ओर धकेल देती है । इसलिए जबतक साधु प्रवृति के लोग ब्रह्मऋषि समाज की राजनीति में दुबारा फिर से स्थापित नहीं किये जाते तबतक भूमिहार समाज के पुनरुद्धार की बात करना न केवल बेमानी होगी अपितु यह नामुमकिन भी है । इसलिए बार बार सभी युवा एवं बुद्धिजीवी साथियों से मेरी अपील है कि जरा अपने अन्तःमन से सोंचें और इस सामाजिक बदलाव को हकीकत में तब्दील करने का प्रयास मिलजुलकर करें , तभी हम अपने पुराने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त कर सकते हैं और सच्ची मानव सेवा भी कर सकते हैं । जबतक समाज के बौद्धिक और साधु प्रवृति के लोगों को हम सामाजिक और राजनैतिक रूप से तवज्जो नहीं देंगे , न तो हमारे समाज में एकता आएगी और न ही हम प्रगति की राह पकड़ पाएंगे । ध्यान रहे : वृक्ष कबहू न फल भखें । नदी न संचे नीर ।।परमारथ के कारणे । साधुन धरा शरीर ।।





I HV posted a comment on fb bt yet not approved… Pls clearify ur reason
गजब
भूमिहारों का यह जो मंच बनाया है उसने क्या अन्य जाति के लोग भी शामिल हो गए हैं
Comments are closed.