– भूमंत्र डेस्क
शिवसेना की चाणक्य नीति के आगे नतमस्तक भाजपा
लोकसभा चुनाव का बिगुल बजते ही राजनीतिक दलों और नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे में बदलाव साफ नज़र आने लगा. संभवतः बदलाव शब्द इसके लिए छोटा है. आमूल चूल परिवर्तन कहना ज्यादा ठीक होगा. धूर विरोधी गलबहिया कर रहे हैं तो गलबहिया करने वाले एक – दूसरे पर आँखें तरेर रहे हैं. महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा के रिश्ते में भी कुछ ऐसा ही हुआ.
दोनों पार्टियाँ महाराष्ट्र में सरकार तो साथ चला रही है लेकिन पिछले चार साल में दोनों ने एक-दूसरे को बातों से जलील करने का को कोई मौका नहीं छोड़ा. शिवसेना इस मामले में ज्यादा आक्रामक रही. उद्धव ठाकरे ने कई मौकों में भाजपा को जमकर कोसा. सामना अखबार में लेख लिखे. प्रधानमंत्री मोदी पर भी तंज कसा. सभाओं में भाजपा को ललकारा. ये सब देखकर राजनीतिक पंडितों का आंकलन था कि महराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन अपनी आखिरी साँसे ले रहा है और शायद लोकसभा चुनाव 2019 में दोनों पार्टियाँ अलग-अलग चुनाव लड़ेंगे. लेकिन इन आंकलनों को गलत साबित करते हुए शिवसेना ने भाजपा के साथ लोकसभा गठबंधन की घोषणा कर दी और अब वे साझा रैलियां भी करेंगे.
शिवसेना ने भाजपा नेताओं के साथ गले मिलकर गठबंधन की ऐसे घोषणा की जैसे पहले कभी कुछ हुआ भी नहीं था. राज्य की 48 लोकसभा सीटों का बंटवारा दोनों पार्टियों के बीच हो गया. भाजपा को 25 सीटें मिली तो शिवसेना को 23 सीटें. शिवसेना को इस सीट बंटवारे में पहले की तुलना में फायदा हुआ. उसे पिछली बार लोकसभा में 20 सीटें ही मिली थी. मतलब उन्हें 3 सीटों का सीधे – सीधे फायदा हुआ. इसके अलावा महाराष्ट्र विधानसभा के लिए भी समझौता हुआ जिसमें आधी सीटें हथियाने में भी शिवसेना को फायदा हुआ. यानी पिछले चार साल से शिवसेना ने व्यंग्यवाण छोड़कर भाजपा पर जो दवाब बनाया, उसका फायदा उन्हें मिल गया.
शिवसेना की इस रणनीति को भूमिहार समाज और उसके नेताओं को समझने की जरुरत है. भू-नेता समझे या न समझे, लेकिन भक्ति रस में रमे समाज को समझने की जरुरत है. क्योंकि साथ रहकर भी दवाब की नीति को ही राजनीति की चाणक्य नीति कहते हैं जिसका नमूना शिवसेना ने पेश किया. राजनीति का स्वरुप अब बदल गया है. राजनीतिक पार्टियाँ बिना दवाब के किसी भी समाज को कुछ नहीं देती. इसलिए दवाब बनाना और आलोचना करना जरुरी होता है. यह दवाब और आलोचना तब काम आती है जब आप बातचीत के टेबल पर बैठते हैं. इसे समझकर अपनाने की जरुरत है. दल विशेष की अंधभक्ति किसी भी समाज के लिए अंततः घातक ही सिद्ध होती है. बहरहाल आपको कुछ बयानों के साथ मंथन के लिए छोड़े जा रहे हैं जो शिवसेना ने भाजपा पर तंज कसते हुए दिए थे –
पंढरपुर की रैली में उद्धव ठाकरे का बयान – ‘चौकीदार चोर है’ ‘ गठबंधन गया गढ्ढे में, आजकल चौकीदार भी चोरी करने लगे है.’
संजय राउत, संपादक, सामना – ‘भाजपा ने चुम्मा लिया तो भी गठबंधन मुमकिन नहीं.’
उद्धव ठाकरे- “मोदी का पूरा कैबिनेट महाराष्ट्र में वोट मांगते हुए घूम रहे हैं. वह अफज़ल खान की फ़ौज की तरह महाराष्ट्र जितना चाहते है. लेकिन हम उनके मनसुबे कामयाब नहीं होने देंगे.”
‘सामना’ के संपाकदीय में बीजेपी की आलोचना करते हुए लिखा गया (23 जनवरी 2019)- ”शिवसेना खत्म करने का बीड़ा उठाकर महाराष्ट्र में कई सारे अफज़ल खान आये और औंधे मुँह गिर गये. शिवसेना को राजनीति के मैदान में पटकने का ऐलान करने वाले समय के साथ खत्म हो गए.”
अयोध्या में उद्धव ठाकरे का मोदी सरकार पर तंज – ”मैं कुंभकर्ण को जगाने आया हूं , हमारा राम अभी भी वनवास में है.”
सामना में वक्तव्य – ‘चार राज भाजपा मुक्त, बहुत उड़ने वाले गिर गए.’
सामना में हेडलाइन- ‘चुनाव में राम याद आते है, फिर अयोध्या में राम मंदिर क्यों नही बनाते’




