kunal sinha wipro

पूरी दुनिया में कोरोनावायरस के कारण सन्नाटा पसरा हुआ है. उधोग धंधे बंद पड़े हैं. लोगों के सामने रोजी-रोटी की समस्या मुंह बाए खड़ी है. भारत जैसे विकासशील देश में यह समस्या और बड़ी है. उसी का एक स्वरूप अप्रवासी मजदूरों की घर वापसी का मामला है. बिहार जैसे राज्यों में ये समस्या और भी अधिक बड़ी बनकर उभरी है. समस्या इतनी विकराल बन चुकी है कि विपक्ष के शोर-शराबे के बावजूद बिहार सरकार अबतक कुछ खास कर पाने में असफल ही रही है. मजदूर तपतपाती गर्मी में दुनियाभर की मुसीबतें झेलकर बिहार पहुँच रहे हैं और ये सिलसिला आगामी कुछ समय तक चलता ही रहेगा. ज्यादातर मजदूर गाँवों में जा रहे हैं जहाँ से कभी रोजी रोटी के लिए इन्होने दुसरे राज्यों की और पलायन किया था. अब ये तब तक रहेंगे जबतक कि महामारी का संकट नहीं टलता. ऐसे में ये सवाल लाजमी है कि इतनी बड़ी संख्या में पहुंचे मजदूर क्या करेंगे? दूसरे शब्दों में अप्रवासी मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कैसे पैदा किया जाए? साथ ही इस स्थिति का लाभ उठाकर बिहार और समाज के लोग रोजगार और स्वरोजगार के अवसर कैसे पैदा करें?

विप्रो इंटरनेशनल में उच्च पद पर आसीन कुणाल सिन्हा से जब हमने इस मुद्दे पर बात की तो उन्होंने छूटते ही कहा – सबसे पहले तो हमें इन मजूदरों को अप्रवासी (Migrant) कहना ही नहीं चाहिए. यदि हम इन्हें अप्रवासी कहते हैं तो उस हिसाब से बिहार का हर वह बिहारी अप्रवासी है जो बिहार के बाहर रहता है! वे कहते हैं , देखिये शहरों और महानगरों को बनाने में इनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है जिसे लोगों ने बड़ी जल्दी भूला दिया. हम भूल रहे हैं कि जिन घरों में आज हम लॉकडाउन होकर कोरोना से अपने आप को महफूज समझ रहे हैं वह घर इन्हीं मजदूरों ने बनाए हैं. लेकिन ये दुर्भाग्य है कि आज ये ही बेघर-बार होकर भयानक त्रासदियों और कुव्यवस्था के शिकार हो रहे हैं. दरअसल ऐसी परिस्थितियों में इनपर ध्यान देने और इनका ख्याल रखने की जरुरत थी.

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पलायन के मुद्दे पर वे कहते हैं कि दरअसल समस्या के तह तक जाने की जरुरत है कि आखिर वे क्यों गए और अब क्यों वापस लौट रहे हैं? आर्थिक के साथ-साथ इसके सामाजिक कारण भी है. दरअसल जब ये जा रहे थे तो उन्हें किसी ने रोका ही नहीं. दूसरी तरफ बड़ी संख्या में पढ़े-लिखे लोग बाहर चले गए और कभी लौट कर नहीं आए. बिहार थम सा गया. बिहार की छवि लेबर सप्लाई करने वाले राज्य की बन गयी और अबतक वह छवि नहीं बदल सकी. लेकिन अब वक़्त आ गया है कि जब इस छवि को बदलने की जरुरत है. लेकिन ये काम सरकार के भरोसे संभव नहीं. हमे खुद ही करना होगा. हमारे पास मजदूर है लेकिन ये समझना होगा कि इनका इस्तेमाल कैसे किया जाए?

इन्हीं सब मुद्दे पर उन्होंने भूमंत्र के मंच पर आकर बातचीत की और रोजगार और स्वरोजगार के लिए अवसरों की तलाश का तरीका बताया. साथ ही इस कार्य में भूमंत्र की उपयोगिता क्या हो सकती है, उसपर भी प्रकाश डाला. सुनिए उनकी पूरी बातचीत –

बिहारियों के लिए लॉकडाउन के दौरान रोजगार और स्वरोजगार के अवसर

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