बिहार में पिछले दो-तीन दशकों में सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य का बदलता स्वरूप और उसका परिणाम :

अरविन्द सिंह

कोराना की वजह से लॉकडाउन क्या हुआ अपनी वजूद को तलाशते लोगों की हकीकत एक ज्वाला की तरह समाज के सभी वर्गों के लिए एक सबक दे गया। लॉकडाउन के दूसरे दिन जब दिल्ली के आनन्द बिहार में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा तो सहसा ऐसा लगा जैसे पूरा बिहार के लोगों की पहचान मजदूरों की एक टोली के अतिरिक्त कोई और न हो। जिधर देखो उधर भूखे प्यासे लोगों की ऐसी जमात जिसको दो जून की रोटी खाने के लाले पड़ गया हो । यह परिदृश्य धीरे धीरे सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य भागों मसलन मुंबई, सूरत, लुधियाना , फरीदाबाद के साथ दक्षिणी भारत के राज्यों के भी देखने को मिला। तेलांगना के मुख्यमंत्री सरीखे कुछ मुख्यमंत्रियों ने मानवता के मिशाल पेश कर बिहारी मजदूरों का राज्य के विकाश में योगदान की सराहना की और उनके रहने खाने का बंदोबस्त करने का आश्वासन दिया तो कुछ और मुख्यमंत्री ने दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बसों में भरकर राज्य के बाहर ढकेल दिया।

यह घटना कोई छोटी बात नहीं है जिसको कॉरोना जनित घटना के परिपेक्ष्य में दरकिनार किया जा सके। यह बिहारी समाज के लिए एक बहुत बड़ी सीख लेने के लिए प्रेरित कर रहा है। यकीन मानिए उस दिन से मै ठीक से सो नहीं पाया हूं और मेरे जैसे हज़ारों लोग और भी होंगे जिन्हें इस परिघटना से गहरा दुःख हुआ होगा। यह पूरे बिहार के लोगों के लिए आत्ममंथन का समय है। जिसके लिए निम्नलिखत बिन्दुओं पर विचार करने की आवश्यकता है-

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बिहार से दिल्ली जैसे अन्य शहरों में वर्षों तक कार्य करने के इन लोगों की हैसियत इतनी भी नहीं हो पाया कि अगले दो दिनों तक भी खाना खा सके। तो फिर बिहार छोड़कर इन प्रदेशों में आकर इन्हें क्या मिला। जो लोग दो वक़्त की रोटी के लिए इतना संधर्ष कर रहे हैं निश्चित रूप से उनका आर्थिक परिदृश्य बदला नहीं है तो उनका समाजिक परिवेश कितना अच्छा होगा इसकी कल्पना न करें तो ही बेहतर है। ऐसे ही लोगों के आर्थिक और समाजिक परिदृश्य देखकर दिल्ली में बिहारी को हीनभावना से ग्रसित एक गाली के रूप में प्रयुक्त होता है।

अब आइए इसके जड़ में चलते हैं कि ऐसा क्यों है ?

मेरा मत है कि इन सब बातों का जड़ बिहार की दोषपूर्ण और अव्यवस्थित शिक्षा पद्धति के साथ साथ लोगों में शिक्षा के प्रति लगाव की कमी। जो लोग अशिक्षित वर्ग के है उनको महानगरों में मजदूर की नौकरी मिलती है जो अधिकतर ठेकेदारों की मातहत होती है। इनके मजदूरी के आधे से अधिक रुपए ठेकेदार किसी न किसी प्रकार से हड़प लेता है। और शेष रकम भी किस्तों में इस प्रकार देता है कि इनके पास दो वक़्त की रोटी से ज्यादा न हो सके ताकि वे निरन्तर उस ठेकेदार पर ही आश्रित रहे। चूंकि इनका मेहनत का कमाया हुआ रुपए ठेकेदार के पास फंसा होता है अतः ये किसी और बेहतर काम की न तो तलाश कर पाते हैं न ही उसके चंगुल से मुक्त होकर किसी और कम्पनी या ठेकेदार के पास काम के लिए जा पाते हैं। इस प्रकार जैसे ही lockdown के घोषणा हुई ठेकेदार अपना पिंड छुड़ाकर चलता बना और ये लोग बेसहारा हो गए। जैसा कि ऊपर विदित है इनके पास दो वक़्त से ज्यादा के खाने का जुगाड था नहीं तो ये भुखमरी के शिकार हो गए। ऐसा निम्नलिखित कारणों से हो रहा है।आखिर बिहार से इतनी बड़ी संख्या में पलायन क्यों है ?

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समाजिक समस्या :

हमारे समाज में झूठी शान और प्रतिष्ठा इसके लिए जिम्मेदार है। चाहे सवर्ण जाति के हो या अन्य किसी जाति के लोग हो शहरों में जाकर ठेकेदारों/साहूकारों/जमीन मालिकों/ दुकानदारों के यहां गाली खाकर भी काम करने के लिए मजबुर हैं क्योंकि उनके अपने समाज का कोई उन्हें देख नहीं रहा। जिल्लत की जिंदगी जीते हुए भी अपनों के बीच शान बखेरने से कम कुछ भी स्वीकार्य नहीं है। मै ऐसे लोगों को जानता हूं जो अपने गांव में खेती नहीं कर रहे बल्कि पंजाब और हरियाणा में पंजाबियों और जाठों के यहां खेत में काम करते हैं। दिल्ली के आस पास नालों के किनारे सब्जी की खेती करने वाले अधिकतर बिहार के लोग ही है। जो गांव वालो के जमीन पट्टे पर लेकर खेती करते हैं। काश! ऐसी ही खेती अपनी जमीन पर बिहार में कर पाते तो उनके परिवार की उन्नति के अतिरिक्त बिहार के जीडीपी में भी योगदान देते। समाजिक संस्कृति के इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। इसके लिए बिहार में कृषि आधारित खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने की जरूरत है। तथा उसके लिए बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है। सभी कार्य सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता। अपने ही समाज के कुछ लोगों को ऐसे उद्योग स्थापित करने चाहिए और उसके उत्पाद को राज्य में विपणन के लिए समुचित मार्केटिंग किया जाना चाहिए। इससे समाज के कुछ लोगों को रोजगार भी मिलेगा और पलायन शहरों की ओर होने में कमी होगी।

कुछ अर्धशिक्षित युवा वर्ग जो सिर्फ सर्टिफिकेट की पढ़ाई कर चुके हैं ऐसे लोगों को शारीरिक श्रम मुक्त कार्य चाहिए। ये महानगरों में आकर गार्ड चपरासी मुंसी या मार्केटिंग में समान डिलीवरी का काम करते हैं। ताकि इनकी समाजिक प्रतिष्ठा अपनों के बीच बनी रहे। आप किसी भी सोसायटी के बाहर खड़े गार्ड से उसकी जाति पूछकर देखिए। अधिकतर भूमिहार ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज के लोग ही मिलेंगे। इसी प्रकार बैंक, एटीएम या किसी बंगला या फैक्ट्री के गार्ड से मिलिए सब की डयूटी कम से कम 12 घंटे की होती है और इनको 8000 से 12000 रुपए तक प्रति माह पगार मिलता है जबकि हकीकत में इनके बदले एजेंसी 12000 से 20000 रुपए तक लेती है। इतना शोषण के बावजूद ये काम करने को इसलिए मजबुर है कि इनको इस कार्य में इज्जत नजर आता है जबकि एक सब्जी का ठेला लगाने वाले की आमदनी रोज के 1000 -1200 तक की है। एक बड़ा पाव और जलेबी बनाने वाले भी प्रतिदिन 1500 से 2000 तक कमाते हैं। इसी प्रकार इलेक्ट्रीशियन प्लम्बर एयरकंडीशन मैकेनिक जैसे स्किल वाले कामगारों की कमाई भी प्रतिदिन 1000 से 2000 के बीच होती हैं। मेरा सुझाव यह है कि जो आबादी अशिक्षित या अर्धशिक्षित है उसको इस प्रकार के कुछ तकनीकी काम सीखकर और शर्म एवं संकोच को त्यागकर बिहार में भी रहकर अच्छा किया जा सकता है। दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में 50000 कमाने वाले लोगों से ज्यादा सुखी और खुशहाल बिहार में वे लोग हैं जो अपने घर परिवार के साथ रहकर 20000 रुपए भी कमा लेते हैं। इसी प्रकार महानगरों 20000 तक प्रतिमाह कमाने वालों से ज्यादा सुखमय जीवन गांव में 8000 रुपए महीना कमाने वालों की है। आज बिहार के गावों में भी एक लेबर का मेहनताना कम से कम 350 रुपए और स्किल लेबर जैसे राजमिस्त्री और बढई जैसे कामगारों की मेहनताना 450 से 500 रुपए प्रतिदन मिलता है। वहां करीब 6 घंटे ही औसत कार्य होता है जबकि इतने ही रकम में महानगरों के ठेकेदरों के यहां 12 घंटे तक कार्य करना पड़ता है।
तो सवाल यह उठता है कि पलायन समाजिक शौक है या व्यक्तिगत मज़बूरी ?

अतः हालिया घटनाक्रम से सबक लेते हुए गांवो से पलायन शहरों में करने से पहले एक बार सोचने की जरूरत है ताकि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अपने को सक्षम बना सके। यदि आप शहरों में सालों रहने के बाद भी 20 – 25 दिनों के लिए खाने और रहने के लायक भी न बना सके तो आप अपने वीवी बच्चों को किस प्रकार का भविष्य देंगे यह सोचने लायक प्रश्न है। ऐसे में आपको गांव या नजदीकी शहरों में ही जीवन यापन के लिए कोई कार्य करने की जरूरत है। महानगरों में जाने से बचे।

असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की ये दशा किसी से छुपी नहीं है। तो इसका उपाय क्या हैं ?

बिहार में सरकारी/गैरसरकारी संस्थाओं को चाहिए कि ऐसे मजदूरों को स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत कुछ तकनीकी शिक्षा प्रदान किया जाए। लोगों को रोजगार के लिए लोक लाज छोड़कर डेयरी उत्पाद के लिए प्लांट लगाने , पोल्ट्री फॉर्म , मछली पालन, सब्जी की खेती, मशरूम उत्पादन , फूलों की खेती , अलवीरा , नीम, जामुन, आंवला जैसे आयुर्वेदिक दवा के काम आने वाले पौधों की खेती कर कई गुना धन का अर्जन किया जा सकता है। इसमें गति प्रदान करने के लिए संबंधित उद्योग स्थापित करें या ऐसे उद्योगों से कॉन्ट्रैक्ट करें।

शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव 

बिहार में शिक्षा मृतप्राय अवस्था में है। सरकार ने पंचायतों के जरिए शिक्षकों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू की उसमें किस प्रकार के ज्ञानी शिक्षकों को नौकरी पर रखा गया यह आए दिन आप टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित खबरों के माध्यम से या सोशल मीडिया पर एक्टिव यूजर के तौर पर देखते होंगे। जब हमारी प्रारम्भिक शिक्षा पद्धति ही इतनी जीर्ण हालत में है तो बाल विकास ही अवरुद्ध होने से भला कौन रोक सकता है। कहते हैं बाल मन बहुत सरल होता है जो भी सीखा दीजिए उम्र भर मन मस्तिष्क में बना रहता है। लेकिन हम सीखा क्या और किस गुणवत्ता का रहे हैं यह महत्वपूर्ण है। ऐसे में आगे चलकर हम चाहे सुधार के लिए लाख प्रयत्न करें यह उतना आसान नहीं होता।

उदाहरण के लिए बिहार शब्द ही ले लीजिए मुझे लगता है कि यह शब्द विहार था बिलकुल उसी तरह जैसे मेरा नाम अरविंद रखा गया होगा मुझे अरबिंद लिखना किसी ने सीखा दिया। आज भी बिहार के अधिकतर लोग अंग्रेजी के अक्षर ” V ” का उच्चारण “भी ” करते है। भेरी गुड बोलते है। जबकि अक्षर ” V ” का सही उच्चारण ” वी ” होता है वेरी गुड बोलना चाहिए। इसी प्रकार हम लोग प्राय “She” “see” और Sea के उच्चारण में अंतर नहीं कर पाते हैं। मेरे इन सब उदाहरणों का तात्पर्य यह है कि बचपन की शिक्षा उच्च गुणवत्ता वाला होना चाहिए अगर उसमें त्रुटि हुई तो बड़े होकर उस त्रुटि के जानने के बाद भी उसमें प्रत्याशित सुधार कर पाना दुष्कर कार्य है। इसलिए प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षकों के लिए यह जरूरी है कि कोई गलत बात बच्चों को न बताई जाए। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि राज्य सरकार इस दायित्व का निर्वहन अच्छा से नहीं कर रहा है। तो आपको क्या करना चाहिए ?

संभव हो तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने बच्चों को प्राथमिक स्तर पर शिक्षा प्रदान करने के लिए आप बेहतर शिक्षा संस्थानों में दाखिला दिलाने का प्रयास करें। सक्षम हो तो खुद भी मॉनिटर करें।

बच्चों में मानसिक विकास के लिए एक्स्ट्रा कुरिकुलर एक्टिविटी का समावेश अवश्य करें। दूसरों के देखा देखी आपने बच्चों पर इंजीनियरिंग कॉलेज और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन के लिए तैयारी का दबाव न डालें। इसमें अनावश्यक खर्च करने के बाद भी यदि रुचि नहीं हो तो बच्चे उस क्षेत्र में नहीं जाकर एसएससी परीक्षा, बैंकिंग परीक्षा इत्यादि की तैयारी करने में समय धन और ऊर्जा का अपव्यय करते हैं।

अगर उनका मन हो तो फोटोग्राफी, लॉ , पेंटिंग, चित्रकारी, इवेंट मैनेजमेंट, एंटरप्रे्योरशिप , पत्रकारिता, मॉडलिंग , डाइटीशियन , फिजियो , खेलकूद जैसे क्षेत्रों में जाने के लिए सहयोग करें।

खेती पर भरोसा 

हाल के दिनों में सवर्ण समाज के लोगों का खेती कार्य से विश्वाश उठ गया है। खेती कार्य करने वाले को समाजिक पिछड़ापन के तौर पर देखा जाने लगा है। इस दृष्टकोण में बदलाव लाना जरूरी है। उनको भी उसी आदर के साथ देखा जाना चाहिए जैसे आप एक फैक्ट्री के मालिक को देखते हैं। दोनों ही उत्पादन का कार्य ही तो करते हैं। अगर आप उन्नत और वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण कर खेती कर्ट हैं तो मेरा मानना है कि व्यवसायिक खेती कर एक एकड़ ज़मीन पर कम से कम 25000 रुपए मासिक की आय आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं।

एक अवलोकन   : उपरोक्त वर्णित बातों के संदर्भ में सत्य यह है कि बिहार से से पलायन करने वाले मजदूरों में बहुत बड़ी संख्या सवर्ण समाज के लोगों की है। यह मान लेना कि देश के कोने कोने से बिहार की ओर जाने वाले मजदूर दलित वर्ग के है आत्मघाती साबित होगा। मेरे ही गांव के कई लोग दिल्ली और उसके अास पास दिहाड़ी मजदूरी कर जीवन यापन करने को मजबुर है और कोरोना वायरस जनित संकट के समय अधिकतर पैदल चलकर जैसे तैसे गांव पहुंचे है। ऐसा ही अन्य गांवों में भी हुआ होगा। अब भी समय है अपनी पूर्वज के जमीनदार होने का गौरवमय इतिहास को किनारे कीजिए और शिक्षा व्यवस्था पर ध्यान दीजिए। जिस प्रकार कोरोना वायरस से बचने का एकमात्र उपाय घर में रहना है उसी प्रकार अपनी समाजिक समस्या से उपर उठकर अपने आर्थिक और सामाजिक जीवन स्तर को सुदृढ़ करने और आने वाली पीढ़ी को एक जीवंत संस्कार के साथ राजनीतिक विरासत की ओर अग्रसर होने का स्वप्न देख रहे हैं तो एकमात्र उपाय शिक्षा के स्तर पर ध्यान देना ही है।

लिखने के लिए बहुत कुछ बाकी है । लेकिन अब अपनी लेखनी को विश्राम देते हैं।
आप सभी प्रियजनों को का अभिवादन !
जय हिन्द! जय भारत! जय परशुराम !!!

(लेखक अरविंद सिंह सिविल सेवा परीक्षा की कोचिंग संस्थान में डायरेक्टर रह चुके हैं और समाजिक आर्थिक विषयों पर कई व्याख्यान दे चुके हैं।)

1 COMMENT

  1. अति महत्वपूर्ण आलेख
    लेखक के विचार सम सामयिक है और अनुकरणीय
    जरूरत है इन सदविचारों पर अमलीजामा पहनाने की व्यक्तिगत , सामाजिक तथा सरकारी स्तर पर।
    मानसिक स्तर पर बदलाव की
    सामाजिक मानदंडों को प्रबुद्ध वर्ग द्वारा पुनः स्थापित करने की
    सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की
    “सबको शिक्षा एक समान वाले “नीति की

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