मेरी रचना “” नारी “” की कुछ पंक्तियां कृप्या अपना सुझाव एवं प्रेरणा अवश्य दें ।

क्या कहते हो रच दूं मैं उन नीड़ भरी व्यथाओं को
या आज कलम को कह दूं लिख दे नारी के करुण कथाओं को

झंझा झकोरती दग्ध हृदय को कैसे साहस दूं कहने का?

हमनें भी देखा है लुटते कितने ही द्रुपद सुताओं को
सभ्य शिष्ट सब लोग खड़े थे वो शहर नहीं इक बंजर था
हाथ जोड़ते पैर पटकते शेष सांसो का सिसकता मंजर था

खामोश खड़े सब देख रहे इक हाथ मदद को ना आई
सच पुछो वो भीड़ नहीं शराफत का खुनी खंजर था
जो सृजन की काया लेकर आई छील कहा रख आएगी
भुखे मर्दो के दलदल में कब तक नारी कमल कुम्हलाएगी

कैसी बैमानी पुरूष तुम्हारी सृष्टि के आधार स्तम्भों से
पर नारी की सौंदर्य इकाई वक्ष और नितम्बों से
निज घर की अस्मत प्यारी हो तो दुजे पर नजर न डालो तुम

वरना सब देखगें उनको भी अंगों के मापदंडो से
रवि शशि पोषित वसुंधरा पर अाज भी क्यूं इतनी बाध्य है नारी

नई सदी के इस ऊर्जा युग में संसाधन नहीं साध्य है नारी
भारत की आधी आबादी क्यूँ भय मिश्रित जीवन जीती है

सिर जब आंचल से जब ढक लेती है आकर्षण नहीं आराध्य है नारी
स्रोत – भूमंत्र