गर्म खून, अच्छी नस्ल, ऊँची जात हूँ, हाँ मैं भूमिहार हूँ
ये पंक्तियाँ किसी जोशीले भूमिहार युवा द्वारा बनाये गए पोस्टर की है. पोस्टर पर दहाड़ते शेर की तस्वीर है. ये मात्र एक बानगी भर है. ऐसे दर्जनों पोस्टर आपको सोशल मीडिया पर मिल जायेंगे जिसमें ऐसी-ऐसी ही लाइनों की भरमार होगी. कुछ पंक्तियाँ तो पढ़कर आप शायद हंस भी पड़ेंगे. कम ही ऐसे पोस्टर आपको मिलेंगे जो अतिशयोक्तिपूर्ण की बजाए कुछ बढ़िया संदेश देने वाली हो.
पोस्टर में बहुतेरा बाघ-शेर और बंदूक की तस्वीर को देखकर एक बात साफ़ हो जायेगी कि बहुत सारे भूमिहार युवाओं की दिलचस्पी किस चीज में है? ऐसे ही एक पोस्टर पर टिप्पणी करते भूमंत्र का वक्तव्य – “भूमिहारों को लेकर बनाये ऐसे पोस्टर हास्यास्पद ही लगते हैं।। हर ग्रुप में महीने में चार बार पोस्ट होता है।।सालों से ऐसा ही होता आया है।। ये कोई अच्छी छवि नहीं बनाता।। बेहतर होता कि भूमिहार समाज के विद्वानों जैसे सहजानंद सरस्वती,श्रीबाबू आदि के विचारों वाले पोस्टर बनाये और सोशल मीडिया पर शेयर किए जाते।। आश्चर्य तब ज्यादा होता है जब #भूमिहार_आरक्षण की मांग करने वाले भी इसे साझा करते हुए शेर दिल होने का दावा करते हैं।। फिर जय-जय….”
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लेकिन इन पोस्टरों के समर्थन में बात करते हुए अरविंद रॉय कहते हैं – ” ऐसे बातो का भी महत्व है समाज में हमेशा नीरस वाली बात तो बेमानी है”
अविनाश राय भी इसका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि, नही कभी-कभी इन पोस्टरों का भी महत्व हो जाता हैं खास तौर पर दूसरों को उन्ही की भाषा मे जवाब देने के लिए…
लेकिन वरिष्ठ चिंतक ‘कामेश्वर पाण्डेय’ आलोचना करते हुए कहते हैं कि ये बिल्कुल गलत और गैरजिम्मेदाराना व्यक्तव्य है! बहुत हल्के और छोटी जाति के लोग ही इस धौंस वाली बात, केवल बात ही करते रहते हैं!
दूसरी तरफ ‘ओमप्रकाश राय ब्रह्मर्षि समाज’ कहते हैं कि भूमिहार का मूल हथियार उसकी बुद्धिमता होती है ये तो बुद्धि हीनता का प्रदर्शन मात्र है.
विदेहश्री चुटकी लेते हुए लिखते हैं कि , ई तो कुछ भी नही है मजा तो और बढ़ जाता है जब कोई “भूमिहार का बेटा हूँ और चंद्रमा की मिट्टी से तिलक करता हूँ” वाला पोस्ट करता है. तब एक दम से बाप मरल अंधेरे में और बेटा पावर हाउस वाली कहावत याद आ जाती है.
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लेकिन इस संदर्भ में विजयेन्द्र आर्य की बात सबसे सटीक प्रतीत होती है जिसे निष्कर्ष के रूप में लिया जा सकता है. वे लिखते हैं – “आजकल सोशल साइट्स पर बहुत सारे ब्रह्मर्षि वंशज स्वयं को ओजपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करना चाहते हैं।ऐसा करते हुए वे अपने आदर्श व्यक्तित्व को भी प्रदर्शित करते है।इस प्रदर्शन से दबंग मानसिकता का भाव बोध होता है,जो इस जाति की सच्चाई नहीं है।वर्तमान सच्चाई तो बिलकुल भी नहीं। वर्तमान परिदृश्य में हमारा ब्रह्मर्षि समाज अपने सह अस्तित्व को बचाने हेतु संघर्षरत है।ऐसे में हमारी ऊर्जा का सही उपयोग सार्थक होनी चाहिए।जब हम अपने प्रतीकों के रूप में बंदूकों,शेरों और भगवान परशुराम के फरसे का उपयोग करते हैं तो उसके पीछे छिपे सामर्थ्य के गुणों पर भी हमें ध्यान देना होगा।सामर्थ्यवान बन्दुक का उपयोग आत्मरक्षा के लिए करते है,आक्रमण तो अपराधियो और चरित्रहीनों का लक्ष्य होता है।शेर की वीरता केवल अपने प्राण रक्षा तक सीमित होता है,अनावश्यक दम्भ और साहस का दुरूपयोग वह कभी नही करता क्योंकि वह अपने आप पर विश्वास करता है।परशु की तेज धार हमे यह भी याद दिलाता है कि भगवान भार्गव अपने धर्म प्रवर्तन और संस्कार परिवर्धन के अभियान के प्रति कितने गंभीर थे।परशु की तीक्ष्ण धार अगर किसी आततायी का शिरोच्छेद कर सकती थी तो कंठ से फूटने वाली ज्ञान और साधना की अजस्र मंत्रधारा निर्मल सरिता का नवीन प्रवाह भी करा सकती थी।उन्होंने अपने ज्ञान,साधना और संस्कारों के बल पर आर्य सभ्यता को स्थापित किया,न कि अपने परशु के बल पर।परशु तो एक साधन मात्र था,उनके लिए जो सठं साठ्यं समाचरेत् वाली भाषा समझते थे।कहने का अर्थ यह है कि हम अपनी शिक्षा,संस्कार और आत्मविश्वास को अपना संबल बनाये और पूर्ण बुद्धिजीविता से अपना लक्ष्य हासिल करें,जिसके लिए हम जाने भी जाते हैं। ”
बहरहाल देखिये सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ पोस्टर जिसके रचियेता कौन है कोई नहीं जानता –





















