ram bahadur rai
समकालीन हिंदी पत्रकारिता में वर्तमान समय में रामबहादुर राय से बड़ा नाम शायद ही कोई हो । दूसरे 
शब्दों में आप कह सकते हैं के वे अपने आप में पत्रकारिता के संस्थान हैं । कई दशकों से वे अपनी 
पत्रकारिता से भारतीय जनमानस को आंदोलित कर रहे हैं । लेकिन उन्हें सिर्फ एक पत्रकार मानना नाइंसाफी 
होगी । उन्होंने निरंकुश हो रहे सत्ता प्रतिष्ठानों के खिलाफ भी अपनी आवाज़ बुलंद की और आपातकाल के 
दौरान जेल गए। सत्ता के पास रहकर भी सत्ता से दूरी बनाकर पत्रकारिता की कलम की धार को जीवंत 
रखना उनसे सीखना चाहिए। अपने जीवनकाल में उन्हें कई बार राजनीति में आने का मौका मिला, लेकिन 
उन्होंने हर बार विनम्रता से ठुकराकर पत्रकार बने रहना ही स्वीकार किया । आइये उनके बारे में विस्तृत 
जानकारी इस लेख के माध्यम से हासिल करते हैं जिसमें उनकी शुरुआत से लेकर अबतक के जीवन को 
समाहित करने का प्रयास किया गया है । (राकेश कुमार गांधी की कलम से )

हिंदी पत्रकारिता का सूरज, जयप्रकाश आंदोलन के नायकों में से एक

हिंदी पत्रकारिता का एक बड़ा नाम है रामबहादुर राय । मूलतः उतर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले और वाराणसी के बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पढ़ाई-लिखाई करके छात्र आंदोलनों का नेतृत्व करने वाले रामबहादुर राय एक ऐसे पत्रकार के तौर पर जाने जाते हैं, जो मीडिया पर बढ़े बाजारवाद के दबदबे के बावजूद मूल्यों और मुद्दों पर कायम रहते हुए पत्रकारिता कर रहे हैं । रामबहादुर राय को लोग राय साहब कहकर बुलाते हैं । राय साहब अभी नोएडा से निकलने वाली पाक्षिक पत्रिका `यथावत` के संपादक हैं ।

राय साहब जयप्रकाश आंदोलन के नायकों में से एक थे । आंदोलन के बाद उन पर चुनाव लड़ने का बहुत दबाव रहा, लेकिन उन्होंने सियासत करने के बजाय पत्रकारिता की राह पकड़ी । उन पर जब चुनाव लड़ने का बहुत ज्यादा दबाव पड़ा तो वे सियासी सरगर्मी के माहौल को छोड़ भगवान की नगरी कहे जाने वाले हरिद्वार चले गए । पत्रकारिता में आने के बाद भी उन पर कई दफा चुनाव लड़ने का दबाव रहा, लेकिन उन्होंने इन सभी प्रस्तावों और आग्रहों को ठुकरा दिया । भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में शीर्ष पर बैठे लोगों से बहुत अच्छे संबंध होने के बावजूद उन्होंने कभी इसका फायदा नहीं उठाया और कभी भी अपने किसी मित्र नेता के खिलाफ बोलने और लिखने से नहीं हिचके । राय साहब जनसत्ता की उस प्रभाष जी की टीम का हिस्सा थे जिसने इस अखबार को सत्ता व्यवस्था में बैठे लोगों की नींद उड़ाने वाला अखबार बना दिया था । माथुर साहब के यह कहने पर कि वे नवभारत टाइम्स को मुकम्मल अखबार बनाना चाहते हैं, राय साहब ने नवभारत टाइम्स में भी लंबे समय तक काम किया । आपातकाल के दौरान आंदोलन चलने वाले रामबहादुर राय मीसा कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने वाले पहले राजनीतिक बंदी थे ।

गाजीपुर के एक किसान परिवार में जन्म

रामबहादुर राय के शौक्षणिक और आधिकारिक दस्तावेजों में उनकी जन्म की तारीख दर्ज है 1 जुलाई 1946 पर उन्होंने खुद ही एक जगह बताया है कि उनका जन्म 4 फरवरी, 1946 को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सोनाड़ी गाँव में एक किसान परिवार में हुआ था । इनके परिवार की जमीन दो जगह पर है । एक तो गाजीपुर के सोनाड़ी में और दूसरी जगह है पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में । राय साहब के पिताजी अध्यापक थे, लेकिन अपनी नौकरी छोड़कर वे खेती में लग गए थे ।

रामबहादुर राय के शुरुआती जीवन का एक दशक पिताजी के साथ बंगाल में ही गुजरा । औपचारिक पढ़ाई की शुरुआती उन्होंने छठी कक्षा से शुरू की । गाजीपुर के अवथाही मिडिल स्कूल से उन्होंने आठवीं की परीक्षा पास की । उनके गांव से तीन किलोमीटर की दूरी पर ही है एस.एम. इंटर कॉलेज । यहीं से उन्होंने नवीं की परीक्षा पास की । इसके बाद रामबहादुर राय ने तय किया कि अब आगे की पढ़ाई गाजीपुर जाकर करनी है । उन्होंने मां से कुछ पैसे माँगे और पहुँच गए गाजीपुर । उस वक्त गाजीपुर के सांसद होते थे सरयू पांडे । वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता थे । सरयू पांडे रामबहादुर राय के पिताजी के मित्र थे आर जिला मुख्यालय में उनके एकमात्र परिचित । सरयू पांडे ने रामबहादुर राय का दाखिला दसवीं में करा दिया । दसवीं की परीक्षा देने के बाद उन्हें किसी ज्योतिषी ने बता दिया कि वे परीक्षा में फेल हो जाएँगे । रामबहादुर राय ने पढ़ाई ठीक से की थी और परीक्षा भी ठीक से दी थी । उन्हें ज्योतिषी की बात पर यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन उनकी उत्सुकता बढ़ गई थी । जिस दिन परीक्षा का परिणाम आया, उस दिन वे सुबह से ही अखबार तलाशते रहे, लेकिन नहीं मिला । समय काटने के लिए वे स्थानीय प्रकाश टॉकिज में फिल्म देखने चले गए । तीन घंटे बाद जब निकले तो अखबार आ गया था और वे पास हो गए थे । उन्हें यकीन नहीं हो रहा था इसलिए उन्होंने कुछ और लोगों से अपना परिणाम दिखलाया ।

बनारस से पढ़ाई

दसवीं के पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे 1963 में बनारस आ गए । बनारस आकर उन्होंने हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में दाखिला लिया और यहीं से बारहवीं की परीक्षा पास की । इसके बाद उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय यानी बी.एच.यू. से राजनीति विज्ञान में स्नातक और अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की । इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की और शोध पर भी हाथ आजमाया । रामबहादुर राय नौवीं कक्षा से नियमित अखबार पढने लगे थे । अपने छात्र जीवन में वे बनारस से निकलने वाला `आज`, इलाहाबाद से निकलने वाला `लीडर` और कलकत्ता से निकलने वाला `स्टेट्समैन ` पढ़ते थे ।

छात्र आंदोलन

छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रामबहादुर राय के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़ना भी एक संयोग की तरह ही था । जब वे हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज में पढ़ते थे तो उन्होंने एक दिन अखबार में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ए.बी.वी.पी. से सम्बंधित कोई खबर पढ़ी । साल-भर से बनारस में होने के बावजूद उन्होंने कभी इसके बारे में सुना नहीं था । इसलिए उत्सुकता जागना स्वाभाविक ही था । उन्होंने अपने साथ के लोगों से ए.बी.वी.पी. के बारे में पता किया और धीरे-धीरे संगठन की गतिविधियों से जुड़ते चले गए ।

जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे तो उस वक्त धर्मनिरपेक्षता को मजबूत करने के मकसद से सरकार ने यह तय किया था कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से `मुस्लिम` और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से `हिन्दू` शब्द हटा दिया जाए । इसके खिलाफ छात्रों ने आन्दोलन चलाया और रामबहादुर राय ने भी उसमें हिस्सा लिया । यहीं से राय साहब छात्र राजनीति में सक्रिय हुए । जब यह आन्दोलन चला तो उस वक्त बी.एच.यू. के कुलपति थे कालूलाल श्रीमती ।इस आन्दोलन की वजह से कुल 46 छात्रों को निकाल दिया गया । कुलपति ने कहा कि जो माफी मांगेंगे, उन्हें विश्वविद्यालय में वापस ले लिया जाएगा । रामबहादुर राय ने माफी नहीं मांगी । इसके बाद उन्हें ए.बी.वी.पी. का संगठन मंत्री बना दिया गया ।

जयप्रकाश नारायण से रामबहादुर राय की मुलाकात

1971 में गांधी विद्या संसथान में युवा विद्रोह पर आयोजित एक सेमीनार में जयप्रकाश नारायण से मिलने का मौका रामबहादुर राय को मिला जे.पी. से रामबहादुर राय बेहद प्रभावित हुए । उसी दौरान उस समय पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले और अब के बांग्लादेश में हुए चुनावों में शेख मुजीब की पार्टी जीती थी । मुजीब के नेतृत्व में शासन के अधिकारों को हासिल करने के लिए वहाँ विद्रोह हुआ था और मुजीब ने इस काम के लिए `मुक्तिवाहिनी` सेना बनाई थी । बनारस के टाठन हॉल के एक भाषण में जे.पी. मुजीब के संघर्ष की हिमायत कर रहे थे । रामबहादुर राय जे.पी. के भाषण से बेहद प्रभावित हुए और सभा खत्म होने पर उन्होंने जे.पी. से जाकर कहा कि मैं क्या कर सकता हूँ ? उस वक्त जे.पी. के साथ  उनकी पत्नी प्रभावती भी थीं । उनके कहने पर जे.पी. ने अगली सुबह आठ बजे रामबहादुर राय को नाश्ते पर बुला लिया । तय समय पर पहुँचने के बाद जे.पी. ने रामबहादुर राय से कहा कि कुछ करने से पहले बांग्लादेश जाकर वहाँ का संघर्ष देख आओ । जे.पी. ने यह भी कहा कि अगर तुम जाना चाहते हो तो मैं दो-तीन पत्र दे दूँगा, ताकि तुम्हें वहाँ कोई परेशानी न हो ।

रामबहादुर राय की बांग्लादेश यात्रा

रामबहादुर राय ने बांग्लादेश चलने के लिए अपने कुछ साथियों से बात की । उनके एक मित्र उनके साथ जाने को तैयार हो गए । इसके बाद वे अपने मित्र के साथ बांग्लादेश चले गए । वहाँ जाकर राजशाही और ढाका के बीच 40 दिनों तक घूमते रहे । वहां से लौटकर आए तो छात्र संघ ने एक सभा की । इस सभा में उन्होंने वह सब कुछ बताया, जो वहाँ से देखकर आए थे । इन सभी में बी.एच.यू. के कुलपति , उस समय के जाने-माने नेता राजनारायण, `आज` अखबार के मालिक सत्येन्द्र कुमार गुप्त और `गांडीव` के डॉ. भगवान दास अरोड़ा भी मौजूद थे । जब रामबहादुर राय अपनी बात समाप्त करके मंच से उतरे तो सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने उन्हें बुलाया और दफ्तर आने का न्यौता दिया । जब रामबहादुर राय वहां पहुंचे तो उन्हें सत्येन्द्र कुमार गुप्त ने कहा कि जो भी वहाँ देखकर आए हो, सब लिख डालो । रामबहादुर राय ने लिखा और वह उनका पहला ऐसा लेख था, जो प्रकाशित हुआ था । यह लेख तीन खंडों में लगातार तीन दिन तक छपा ।

इसके बाद से रामबहादुर राय की सक्रियता छात्र आन्दोलन में बढती ही गई । उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे चौधरी चरण सिंह और प्रधानमंत्री थीं इंदिरा गांधी । उस वक्त छात्रसंघों पर रोक लगी हुई थी और मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बनारस आने वाले थे । छात्रसंघों पर रोक के कारण बनारस के छात्रों ने तय किया कि इन दोनों को काला झंडा दिखाया जाए । प्रशासन को इस योजना की भनक लग गई थी । यही वजह है कि रामबहादुर राय को पकड़ने के लिए कई हॉस्टलों पर छापे मारे गए, लेकिन वे पकड़ में नहीं आए । धुन के पक्के रामबहादुर राय प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को काला दिखाने में सफल रहे और उसी वक्त उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया । हालाँकि बाद में वे छूट गए ।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सचिव बने

रामबहादुर राय की सक्रियता को देखते हुए उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया और बिहार प्रदेश का जिम्मा भी दिया गया । उस वक्त वे पटना में रहने लगे थे । एक साल तक वहाँ काम करने के बाद 1973 के जुलाई में उन्होंने वहाँ संगठन बनाया । उसी महीने में पटना छात्रसंघ का चुनाव होना था । उस चुनाव में रामबहादुर राय के नेतृत्व में खड़े किए गए उनके उम्मीदवारों में से लालू यादव अध्यक्ष पद पर जीते, सुशील कुमार मोदी महासचिव पद पर जीते और रविशंकर प्रसाद सचिव पद पर विजयी रहे । इधर दिल्ली में हुए छात्रसंघ चुनाव में जीतने वाले अरुण जेटली ने छात्रसंघों का राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया । इसमें बिहार का प्रतिनिधिमंडल लेकर रामबहादुर राय पहुंचे । इसी सम्मलेन में छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ ।

रामबहादुर राय की गिरफ्तारी

छात्र संघर्ष समिति में यह फैसला किया कि 18 मार्च, 1974 को बिहार विधानसभा का घेराव किया जाएगा । उस वक्त देश-भर के विपक्षी दलों में सत्ता को लेकर नाराजगी थी । यह घेराव सफल रहा और इस तरह बिहार आन्दोलन की शुरुआत हो गई । दूसरे दिन रामबहादुर राय जयप्रकाश नारायण से मिलने गए । जे.पी, ने रामबहादुर राय से सवाल-जवाब किए और पाया कि छात्रों का पक्ष सही है । रामबहादुर राय ने जे.पी. से आग्रह किया था कि वे छात्र आन्दोलन के पक्ष में बयान जारी-करें ।

22 मार्च, 1974 को जे.पी. ने छात्र आन्दोलन के पक्ष में बयान दिया और 8 जुलाई को उन्होंने मौन जुलूस का नेतृत्व किया । जुलूस खत्म होने के बाद जे.पी. ने रामबहादुर राय को बुलाकर कहा कि यहाँ से चले जाओ क्योंकि डी.एम. तुम्हें गिरफ्तार करने के लिए तलाश रहा है । जे.पी. ने कहा कि हो सकता है कि तुम्हें गोली मरवा दी जाए । इसके बाद उस दिन रामबहादुर राय वहाँ से चले गए,लेकिन दूसरे दिन के सत्याग्रह में शामिल होने फिर पहुँच गए । यहीं से उन्हें गिरफ्तार कर किया गया और रामबहादुर राय पहले ऐसे व्यक्ति बने जिन पर मीसा लगाया गया । इसके बाद वे 10 महीने तक जेल में बंद रहे । जब सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आया तो 1974 के नवम्बर महीने में रामबहादुर राय जेल से निकले । आपातकाल के दौरान फिर से 30 जून, 1975 को रामबहादुर राय को गिरफ्तार कर लिया गया । जब आपातकाल खत्म हुआ तो रामबहादुर राय के कई मित्र चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन राय साहब ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया । उन्हें राजनीति लक्ष्य से समझौता करने सरीखा लगा और उन्होंने दूसरी राह पकड़ने का निश्चय किया ।

सक्रिय राजनीति में जाने का अवसर, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता को चुना

1977 में जनता पार्टी की ओर से गाजीपुर सीट के लिए रामबहादुर राय और गौरीशंकर का नाम बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था । रामबहादुर राय ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया । 1979 में फिर उन्हें जनता पार्टी ने बनारस से चुनाव लड़ने को कहा । इसके बाद 1991 में भाजपा की ओर से बनारस से रामबहादुर राय के पास चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया । इस बार भी उन्होंने अस्वीकार कर दिया ।

एक बार रामबहादुर राय पर चुनाव लड़ने का बहुत दबाव बना । रोज सुबह-सुबह उनके घर पर भीड़ लगती थी । रामबहादुर राय भी दुविधा में थे और इस दुविधा से पार पाने के लिए वे झोला उठाकर हरिद्वार चले गए । वहाँ वे दिन में अंकुरित अन्न और रात में एक रोटी खुद बनाकर खाते हुए छः-सात महीने रहे । उस दौरान वे पूरे दिन पढ़ाई करते थे ।

इसी बीच जयप्रकाश नारायण की मौत खबर उन्हें मिली और वे सीधे हरिद्वार से पटना पहुंचे । वहाँ पहुँचकर देखा कि जे.पी. के राजकीय सम्मान के अलावा कुछ और बातों को लेकर विवाद है । वहाँ उस समय के सभी बड़े नेता पहुंचे हुए थे । रात के बारह बजे चंद्रशेखर को जगाकर रामबहादुर राय ने चीजें तय कीं । इसके बाद भी उन पर चुनाव लड़ने का दबाव बढ़ता गया । जनता पार्टी के सभी घटक दलों की तरफ से कहा जा रहा था कि रामबहादुर राय को चुनाव लड़ना चाहिए ।

लेकिन रामबहादुर राय तो कुछ और ही तय कर चुके थे । उसी समय उनके पास बनारस में एक प्रिंटिंग प्रेस खोलने का भी प्रस्ताव आया । प्रस्ताव देने वाले भी बनारस के बहुत बड़े आदमी थे, पर रामबहादुर राय के एक अभिभावक तुल्य मित्र ने उन्हें प्रिंटिंग प्रेस खोलने से मना किया । उनके मित्र ने कहा कि तुम्हारा स्वभाव कारोबारी नहीं है इसलिए तुम इसमें मत पड़ो । उन्होंने भी पत्रकारिता की ओर जाने की सलाह दी । उन्होंने समाचार एजेंसी हिंदुस्तान समाचार के प्रधान संपादक और महाप्रबंधक बालेश्वर अग्रवाल को पत्र लिखकर यह कहा कि अगर आप अवसर दें तो मैं हिंदुस्तान समाचार में काम करना चाहता हूँ । बालेश्वर अग्रवाल की तरफ से रामबहादुर राय के पत्र का जवाब आया । उसमें मुख्य तौर पर तीन बातें थी । पहली यह कि रामबहादुर राय के आने से उनकी समाचार एजेंसी को प्रतिष्ठा मिलेगी और दूसरी बात यह कि हिंदुस्तान समाचार अधिक पैसा नहीं दे पाएगी । बालेश्वर अग्रवाल ने उस पत्र के जरिए अपने दिल्ली आने की तारीखों की सूचना दी और कहा कि आइए तो मिलकर बात करेंगे ।

मिलने पर बालेश्वर अग्रवाल ने रामबहादुर राय को कहा कि मोरारजी देसाई की लिस्ट में आपका नाम सबसे ऊपर है तो आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? बालेश्वर अग्रवाल मोरारजी के करीबी लोगों में से एक थे । रामबहादुर राय ने बातचीत के दौरान उनसे कहा कि डेस्क पर काम नहीं करूँगा, बल्कि रिपोर्टिंग करूँगा । संस्थान के नियम के अनुसार रामबहादु राय को प्रशिक्षण के लिए भोपाल भेजा गया । रामबहादुर राय की प्रशिक्षण की बात सुनकर एस.पी. सिंह जैसे कई लोगों को बड़ा अजीब लगा था और इन लोगों ने टोका भी था । इसके बावजूद भोपाल के अपने कुछ परिचित को पत्र लिखने के बाद रामबहादुर राय भोपाल पहुँच गए । जिस दिन वे वहाँ पहुंचे, उसी दिन वहाँ सुन्दरलाल पटवा के खिलाफ प्रदर्शन था । रामबहादुर के पहुँचने की जानकारी पाते ही भोपाल के अखबारों में यह खबर छप गई कि वे इस प्रदर्शन का नेतृत्व करने आ रहे हैं । वहाँ हिन्दुस्तान समाचार के प्रभारी में खबर दिखाकर रामबहादुर राय से सवाल किया कि आप यहाँ प्रशिक्षण के लिए आए हैं या फिर आन्दोलन करने । अखबारों में खबर प्रकाशित हो गई थी इसलिए रामबहादुर राय ने उस प्रदर्शन का नेतृत्व किया ।

1980 में लोकसभा चुनाव हुए और उस दौरान राय साहब भोपाल में ही थे । उन्होंने वहा से कुछ अच्छी खबरें लिखीं जिन पर चर्चा हुई । उस वक्त स्टेट्समैन के ब्यूरो प्रमुख रहे तरुण भादुड़ी ने रामबहादुर राय की कुछ खबरों का फॉलोअप भी किया । मालूम हो कि तरुण भादुड़ी अमिताभ बच्चन के ससुर थे । प्रशिक्षण की अवधि छः महीने की थी, लेकिन बालेश्वर अग्रवाल ने उन्हें दो महीने में ही वापस दिल्ली बुला लिया ।

बालेश्वर अग्रवाल ने रामबहादुर राय को अरुणाचल प्रदेश भेज दिया । इटानगर में रामबहादुर राय 1982 तक रहे । इसी दौरान केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी हुई और बालेश्वर अग्रवाल को हटा दिया गया । इसके बाद रामबहादुर राय ने तय किया कि अब हिन्दुस्तान समाचार में नहीं रहना है और अपना समान समेटकर वे दिल्ली पहुंच गए । इसी दौरान एक दिन उनकी मुलाकात राजमाता विजयराजे सिंधिया से हो गई । उन्होंने रामबहादुर राय से पूछा कि कहाँ रह रहे हो । इसके जवाब में रामबहादुर राय ने कहा कि रहने की जगह नहीं है । इसके बाद राजमाता सिंधिया ने उनके रहने का बंदोबस्त करवाया ।

जनसता और फिर नवभारत टाइम्स से जुड़ाव

1982 में ही जनसत्ता शुरू होने का विज्ञापन प्रकाशित हुआ और रामबहादुर राय ने आवेदन कर दिया । साक्षात्कार के लिए उनके पास प्रभाष जोशी का पत्र आया । साक्षात्कार के बाद उन्होंने 1983 के जुलाई में जनसत्ता में रिपोर्टर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया । साल-भर के अन्दर ही उन्हें प्रभाष जोशी ने मुख्य संवाददाता बना दिया । इसी दौरान राजेन्द्र मथुर नवभारत टाइम्स के संपादक बनकर आए थे । वे अक्सर रामबहादुर राय को नवभारत टाइम्स में आने के लिए कहते थे और एक दिन रामबहादुर राय ने भी हाँ कर दी ।

1986 में विशेष संवाददाता के तौर पर रामबहादुर राय ने नवभारत टाइम्स में काम करना शुरू किया । जब तक माथुर साहब रहे, तब तक वे नवभारत टाइम्स में रहे । इस दौरान प्रभाष जी भी बार-बार उनसे जनसत्ता लौटने को कह रहे थे । प्रभाष जी रामबहादुर राय से कहते थे कि जनसत्ता तुम्हारा अपना अखबार है, यहाँ वापस आ जाओ । 1991 में रामबहादुर राय जनसत्ता लौट आए । 1995 से 2004 तक रामबहादुर राय जनसत्ता के समाचार संपादक रहे । यहाँ से सेवानिवृत्त होने के बाद वे बतौर संपादक पाक्षिक पत्रिका `प्रथम प्रवक्ता` के साथ जुड़े ।

रामबहादुर राय की कई रिपोर्ट बेहद चर्चा में रही । सहारनपुर दंगे और बोफोर्स कांड पर उनकी खबरों की बहुत चर्चा हुई थी । ऐसे ही उन्होंने दिल्ली विकास प्राधिकरण के भी एक घोटाले का पर्दाफाश किया था और इस वजह से कई लोगों को निलंबित कर दिया गया था । रामबहादुर के राजनीतिक वेश्लेषण का लोहा माना जाता है । देश के अब तक के बड़े राजनीतिक पत्रकारों में रामबहदुर राय एक प्रमुख नाम है ।

रामबहादुर राय ने पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह पर एक किताब भी लिखी है । इस किताब का नाम है – मंजिल से ज्यादा सफर । इस किताब के छपने के बाद इसकी कुछ बातों पर विवाद हुआ । इसके बाद वी.पी. सिंह ने खुद प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर सार्वजनिक तौर पर कहा कि किताब में जो भी प्रकाशित हुआ है और जिन बातों पर विवाद है, वे मैंने ही कही हैं । पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर पर भी उन्होंने एक किताब लिखी है । इस किताब का नाम है – रहबरी के सवाल । रामबहादुर राय को सार्थक पत्रकारिता करने के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं । 2010 का माधवराव सप्रे राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार भी रामबहादुर राय को मिला है। राम बहादुर राय को भारत सरकार ने पदमश्री से उनकी इच्छा न होने के वावजूद भी सम्मानित किया। वर्तमान समय मे वे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष के साथ साथ हिंदुस्तान समाचार के समूह संपादक है ।

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