Anant Singh Mokama

-समरेन्द्र सिंह

यह कैसे मुमकिन है कि जो एनडीटीवी छोटे-छोटे अपराधियों और बाहुबलियों के खिलाफ घुटने टेक देता है, जो अपने रिपोर्टरों का बचाव नहीं कर पाता है, वही चैनल बड़े नेताओं को निपटा देता है और सत्ता के शीर्ष को चुनौती देता हुआ नजर आता है? आखिर इतना विरोधाभास कैसे हो सकता है?

यह सवाल मुश्किल है और पेंचीदा भी. इसका जवाब जानने के लिए आपको कुछ बातों पर गंभीरता से गौर करना होगा. सत्ता के खेल को समझना होगा. साधन और साध्य के मर्म को पकड़ना होगा. एनडीटीवी की संरचना और उसके मालिकों के हितों को समझना होगा. यह भी कि आखिर एनडीटीवी में एक संस्था के तौर पर “रिपोर्टर” की हत्या क्यों की गई? आखिर क्यों इसको ईमानदार, समझदार और निडर रिपोर्टरों की जरूरत नहीं थी?

इन प्रश्नों पर चर्चा को नवंबर 2007 की एक घटना से आगे बढ़ाते हैं. यह बेहद भयानक घटना थी. उस समय चैनल की कमान मनीष कुमार और संजय अहिरवाल के हाथ में थी. मनीष को पटना से दिल्ली बुलाया गया था. इसलिए बिहार की खबरों से उनका जुड़ाव कुछ अधिक रहता था. मैं उस दिन रात की ड्यूटी पर था. मेरे पास मनीष का फोन आता है कि अभी बिहार से एक लड़की की रहस्यमय मौत की खबर आएगी और उसे सुबह प्लेअप करना है. खबर प्रकाश सिंह ने भेजी थी. मैंने खबर पढ़ने और विजुअल्स देखने के बाद प्रकाश से बात की. बातचीत से मुझे लगा कि वो इस खबर के पक्ष में नहीं हैं और उन्होंने यह स्टोरी मनीष के दबाव में फाइल की है.

खबर के मुताबिक रेशमा नाम की लड़की की रहस्यमय मौत के पीछे बाहुबली नेता अनंत सिंह और उनके सहयोगी बिल्डर मुकेश सिंह का हाथ बताया जा रहा था. सुबूत के नाम पर मुख्यमंत्री के नाम लिखी गई एक चिट्ठी थी. कहा जा रहा था कि यह चिट्ठी रेशमा ने अपनी मौत से कुछ दिन पहले ही लिखी थी और उसमें उसने अनंत सिंह और मुकेश सिंह का नाम लिया था. मैंने प्रकाश से बातचीत के बाद खबर बना दी और एहतियात के तौर पर हमने खबर में अपनी तरफ से कहीं भी अनंत सिंह का नाम नहीं लिया. इतना ही कहा कि एक बाहुबली नेता शक के घेरे में है. लेकिन पटना से आए विजुअल में वो चिट्ठी और उस चिट्ठी का वो हिस्सा भी मौजूद था जिसमें अनंत सिंह और मुकेश सिंह का नाम लिखा था. रिपोर्ट तैयार करते वक्त वो हिस्सा लगा दिया गया.

सवेरे के दो बुलेटिन में वह खबर चलाने के बाद मैं घर लौट आया. मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे ऑफिस से जाने के बाद उस स्क्रिप्ट में अभिरंजन ने कुछ बदलाव कर दिया था और उसे लेकर मेरी उनसे काफी तेज बहस हुई थी. हम दोनों बैचमेट हैं. पुराने मित्र हैं. इसलिए हममें कई बार बहुत तीखी बहस होती थी. वो आज भी होती है. उस दिन भी हुई थी. प्रकाश की स्टोरी तैयार करते वक्त मैंने “बदबू” शब्द जानबूझ कर हटाया था. लेकिन अभिरंजन ने वही शब्द फिर से जोड़ दिया था. मैंने अभिरंजन से कहा कि स्टोरी में अगर तथ्य गलत हो तो आपको स्टोरी में बदलाव करने की इजाजत है. अन्य किसी सूरत में आपको किसी दूसरे की लिखी स्टोरी से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए. हर व्यक्ति के लिखने का अपना अंदाज होता है. उसकी अपनी शैली होती है. उस शैली का सम्मान होना चाहिए.

खैर, अभिरंजन से झगड़े के बाद मैं आराम करने लगा. दोपहर में आंख खुली तो मैंने खबर देखने के लिए न्यूज चैनल लगाया. हंगामा मचा हुआ था. अनंत सिंह ने प्रकाश और कैमरामैन हबीब को घर पर अपनी प्रतिक्रिया देने के बुलाया और फिर बंधक बना लिया. हबीब किसी तरह खिड़की से कूद कर बाहर निकलने में कामयाब हुए और उन्होंने तमाम साथियों को प्रकाश के बंधक बनाए जाने की खबर दी. इसके बाद पटना के दर्जनों मीडियाकर्मी अनंत सिंह के घर के बाहर जमा हो गए. साथी पत्रकार को बचाने के लिए उन्होंने बाहुबली अनंत सिंह को उनकी हैसियत बता दी थी. उस दौरान अनंत के गुंडों ने पत्रकारों पर हमला भी किया था. फिर भी सभी बेखौफ डटे हुए थे. इधर दिल्ली में न्यूज चैनल भी खबर पर चढ़े हुए थे. लेकिन एनडीटीवी पर सन्नाटा था. मैंने ऑफिस फोन किया और अभिरंजन से बात की. उन्होंने बताया कि प्रकाश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अभी खबर हटाई गई है. यह डर है कि कहीं आक्रामक होने से प्रकाश की जान संकट में न पड़ जाए. कुछ घंटे तक चले हंगामे के बाद मीडिया के दबाव में नीतीश सरकार हरकत में आयी. प्रकाश को छुड़ाया गया. अनंत सिंह पर मुकदमा हुआ. गिरफ्तारी हुई. मुझे लगा कि प्रकाश के बाहर आने के बाद एनडीटीवी इस खबर पर चढ़ेगा. थोड़ी देर के लिए ऐसा हुआ भी. लेकिन कुछ ही देर बाद खबर फिर हटा दी गई. उसके बाद बस औपचारिकता पूरी की गई. कुछ दिन बाद समझौता हो गया. यहां कुछ लोग कह सकते हैं कि ऐसा प्रकाश की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए किया गया. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि जब संस्थान अपने पत्रकार के पक्ष में खड़े होने का हौसला नहीं दिखाए और सरकार गुंडे के पक्ष में खड़ी हो तो फिर पत्रकार के पास समझौते के अलावा विकल्प ही क्या बचता है?

(लेखक एनडीटीवी के पूर्व पत्रकार हैं. यह स्टोरी उनके फेसबुक वॉल से ली गयी है)

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