Kanhaiya

-हरेश कुमार
लालू प्रसाद यादव ने चार दशकों से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति में हिस्सा लिया है। पहली बार वो खुद चंद्रशेखर और देवीलाल के आशीर्वाद की बदौलत रघुनाथ झा की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की पहली पसंद रामसुंदर दास थे,लेकिन देवीलाल बिहार के मोर्चे पर किसी भी सूरत में वीपी सिंह को बढ़त लेने देना नहीं चाहते थे। इसके लिए देवीलाल ने चंद्रशेखर का सहारा लिया और चंद्रशेखर ने अपने राजनीतिक शिष्य रघुनाथ झाको आगे कर दिया, जिसे तीन दर्जन विधायकों का समर्थन प्राप्त हुआ और आगे चलकर ये सभी लालू प्रसाद यादव के पक्ष में हो गए। उसी दिन से बिहार का दुर्दिन शुरू हो गया। बिडम्बना तो देखिए जिस देवीलाल ने लालू प्रसाद यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया आगे चलकर लालू ने उसी को हरियाणा का बैल तक कहा। रघुनाथ झा को भी बेइज्जत किया। चंद्रशेखर को भी न छोड़ा। इसी का नाम राजनीति है,जिसका पहुंचा पकड़कर आगे बढ़ते हैं, सबसे पहले उसी डाल कै नुकसान पहुंचाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी का ताजा उदाहरण सामने है। आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी के समय में नरेंद्र मोदी को हर समय बचाया, लेकिन जब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनने की बात आई तो मोदी ने आडवाणी को हर समय बेइज्जत किया। यह सर्वविदित हो चुका है। यहाँ कोई किसी को आगे बढ़ते देखना नहीं चाहता, चेहरों के पीछे कई चेहरे छुपे होते हैं। हालांकि, आडवाणी ने पाकिस्तान जाकर करोड़ों हिंदुओं की हत्या के जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर चादर चढ़ाकर उसे धर्मनिरपेक्ष बताकर खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। इसके बावजूद उन्होंने जिस तरह भाजपा को आगे बढ़ाया, उसे सींचा इसे देखते हुए राष्ट्रपति का पद तो बनता ही था।मोदी ने उन्हें राष्ट्रपति न बनाकर ऐतिहासिक गलती की,देश इस गलती के लिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह को कभी माफ नहीं करने वाला।

एक कमजोर व्यक्ति जब सत्ता पर आसीन होता है तो इसे बचाए रखने के लिए वह तमाम कुकर्मों को नजरअंदाज करने लगता है। इसी का लाभ लेकर अपराधियों ने राजनीति में थोक मात्रा में प्रवेश किया। इससे पहले इनमें से अधिकांश अपराधी अपने क्षेत्र के नेताओं के लिए बूथ छापने और विरोधियों को निपटाने यानी हत्या का काम करते थे। बदले में सरकारी विभागों की ठेकेदारी से लेकर रंगदारी वसूलने की छूट मिलती थी। जब इन अपराधियों ने देखा कि हमारे ही कारण ऐसे लोग नेता बनते हैं, तो हम ही क्यों न नेता बन जाएं। फिर,क्या था?बिहार में एके-47 और अन्य घातक हथियारों का पदार्पण हो गया। एक-दूसरे को जमकर निपटाया गया।
राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बद से बदतर हो चुकी थी। कब किसका अपहरण हो जाए और किसे गोलियों से भून दिया जाए, कोई नहीं जानता था। इस बीच शिक्षकों, चिकित्सकों, प्रोफेसरों से लेकर छोटे-बड़े व्यावसायियों की जान सांसत में आ चुकी थी। जरूरी नहीं कि पैसा देने के बाद भी जान सुरक्षित रहे। कितने चिकित्सकों और प्रोफेसरों को जान से हाथ धोना पड़ा। कितनों ने हमले के बाद सदा-सदा के लिए बिहार छोड़ दिया। ऐसे लोग आज राजधानी दिल्ली सहित आसपास के इलाकों में फैले हैं। यहाँ भी इन सब पर खूब हमले हुए, लेकिन बिहार वाली बात नहीं रही। यहाँ अपराधियों को भी जान से हाथ धोना पड़ा।

बिहार की शिक्षा, चिकित्सा, सड़क,बिजली-पानी आदि मूलभूत सुविधाओं की बर्बादी के पीछे मुख्य तौर पर कोई जिम्मेदार है तो वह लालू प्रसाद यादव ही हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक हितों के लिए आंख मूंद लिया।
आज अपने पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीतिक तौर पर स्थापित करने के लिए लालू प्रसाद यादव फूंक-फूंक कर कदम रख रहे। उन्हें पता है कि एक बार अगर हमने कन्हैया का समर्थन कर दिया तो वो हमारे लालटेन की रोशनी सदा-सदा के लिए बुझा देगा। अपनी राजनीति के लिए जो इंसान ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का न सिर्फ नारा लगाता हो,बल्कि नारा लगाने वालों का समर्थन भी करता हो वह अपनी राजनीति के लिए किसी भी स्तर तक जा सकता है।

कन्हैया इस बात को भलीभांति जानता है कि शहाबुद्दीन ने जेएनयू के छात्र नेता चंद्रशेखर उर्फ चंदू की दिनदहाड़े हत्या की वारदात को अंजाम दिया और लालू प्रसाद यादव सदैव शहाबुद्दीन को बचाते रहे,लेकिन उसने एक बार भी अपने वरिष्ठ छात्रनेता चंद्रशेखर की हत्या को लेकर आवाज नहीं उठाई। पूरा बिहार जानता है कि शहाबुद्दीन,तस्लीमुद्दीन जैसों को आगे करके ही लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति की है। मुस्लिम तुष्टिकरण और छद्मधर्मनिरपेक्षता की नींव को खादपानी मुहैया कराया है।
लालू प्रसाद यादव को अच्छी तरह से मालूम है कि वो अब जीवन के संध्याकाल में हैं।तेजस्वी यादव एक बार लुढ़के तो फिर सबदिन के लिए लुढ़क जाएंगे।

ये तो नीतीश कुमार के कारण राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को संजीवनी मिल गई,वरना पिछले विधानसभा चुनाव में ही पार्टी अपनी गति को प्राप्त कर जाता और दस विधायक भी न जीतते। प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले नीतीश कुमार ने एक ही झटके में भाजपा से 17साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया, वरना राजद का कोई नामलेवा भी न होता। महागठबंधन बनने के बाद लालू प्रसाद यादव ने भरी जनसभाओं में पुरानी गलतियों को न दोहराने की कसम खाई,लेकिन जब सत्तारूढ़ हो गए तो फिर से शहाबुद्दीन और अन्य अपराधियों को खुली छूट देने लगे,नतीजा इन सबकी पौ-बारह होने लगी। सिवान जेल में बिहार सरकार के चार-चार मंत्री शहाबुद्दीन से मिलने जाने लगे,वह जेल में दरबार सजाने लगा। अपने अहंकारवश उसने सिवान के दैनिक हिन्दुस्तान समाचारपत्र ब्यूरो के प्रमुख राजदेव रंजन को गोली मरवा दिया। उसे शक था कि जेल में मंत्रियों के संग बैठक की तस्वीर इसी ने बाहर की है। हर चीज की इंतहा होती है। राजदेव रंजन की हत्या के बाद बिहार में राजनीतिक समीकरण एक बार फिर तेजी से बदला और महागठबंधन टूट गया। अवॉर्ड रिटर्न गिरोह को इससे काफी धक्का लगा। हालांकि, इसके टूटने के पीछे लालू प्रसाद यादव का शहाबुद्दीन जैसे दुर्दांत अपराधियों को खुली छूट देना और शहाबुद्दीन द्वारा नीतीश कुमार को नेता न मानना भी रहा।

फिर,क्या था लालू खेमे की ओर से नीतीश कुमार के पेट में भी दांत होने का मुहावरा आया, तो नीतीश कुमार की ओर से चंदन विष व्यापय नहीं लटके रहे भुजंग को उछाला गया। इस बीच नीतीश कुमार को आभास हो गया था कि वर्तमान दशा में प्रधानमंत्री नहीं बन सकते हैं और जब मुख्यमंत्री ही रहना है तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी से लाख गुना बेहतर भाजपा है,क्योंकि वहाँ सब अपने मन से फैसले लेते थे और यहाँ तो नौवीं फेल तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव सहित लालू प्रसाद यादव के पूरे परिवार का दबदबा है।

हालत यह हो गई थी कि नीतीश कुमार बगैर पूछे एक भी निर्णय नहीं कर पा रहे थे। लालू प्रसाद यादव ने भले ही कम सीटें (राजद 80और जदयू 75) मिलने के बावजूद पूर्व की घोषणाओं के अनुसार, नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना दिया था,लेकिन सत्ता की असली चाबी अपने पास ही रखी थी और ऊपर से राबड़ी देवी के बयान -‘तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनते देखना’ ने आग में घी का काम किया। ढ़ाई-ढ़ाई साल मुख्यमंत्री बने रहने की बात भी मीडिया में उछाला गया। इन सभी बातों के मद्देनजर नीतीश कुमार ने हारकर अपने पुराने विश्वसनीय साथी की शरण में आना ही उचित समझा। इसकी शुरुआत पटना साहिब में सिखों के प्रकाश पर्व के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान लालू प्रसाद यादव के परिवार को मंच पर सीट न देकर संकेत दे दिया गया। बाद बाकी सबको पता है।
(लेखक के एफबी वॉल से साभार)

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