arvind singh bhumihar

माध्यम वर्गीय परिवारों से अब राष्ट्रप्रेम का चबेना अब चबाया नहीं जाता। जैसे तैसे परिवार का भरण पोषण करने वाले इंजीनियरों तथा मार्केटिंग फैक्ट्री में काम करने वाले सुपरवाइजरों , माॅल ,सिनेमाघरों में काम करने वाले कामगारों कोचिंग,ट्यूशन छोटे प्राइवेट स्कूल में काम करने वाले शिक्षकों और कॉल सेंटरों में कार्यरत स्वपोषित पब्लिक रिलेशन ऑफिसर जैसे पदवी से विभूषित भूमिहार ब्राह्मणों के महानायकों जो 15000 से 30000 तक प्राइवेट सेक्टर में कमाते हैं और अपने सीमित संसाधनों में एक इज्जतदार छवि के अर्जित कर चुके हैं। ऐसा लगता है कि उनकी इज्जत तार तार होने वाला है। लॉकडाउन के प्रथम सोपान में अपनी सारी जमापूंजी के साथ अपनी प्रतिष्ठा और देशप्रेम को संजोए रखने के लिए सरकार के सभी निर्देशों को अमल में रखते हुए हर कर्तव्य का पालन इस उम्मीद में किया कि ये बादल थोड़े ही दिन में छंट जाएंगे । ऐसा हो भी सकता था इसमें संशय की गुंजाइश बहुत कम थी लेकिन देश सिर्फ इन जैसे देशप्रेमियों का थोड़े ही न है। देश तो 130 करोड़ देशवासियों का है जिसमें कुछ 5 -10 करोड़ ऐसे भी हैं जिन्होंने इस उम्मीद पर ऐसी कुठाराघात किया कि अब लॉकडाउन के नंबर लगने लगा फिलहाल लॉकडाउन 2 चल रहा है लेकिन दिल्ली में मरकज तथा यमुना किनारे , मुंबई में कूर्ला , सूरत और अहमदाबाद में जैसे भीड़ एकत्रित होकर इस उम्मीद को इस प्रकार लोलूप कर दिया कि पता नहीं चल रहा कि लॉकडाउन नंबर कितने चरण के बाद रुकेगा । यह भविष्य के गर्त में है और वर्तमान में आर्थिक बदहाली चरम पर है।

अब हालत यह है कि इनसे कहा भी नहीं जाता और रहा भी नहीं जाता। इसमें एक आग में घी डालने जैसे आडम्बर इन महानायकों और अपने परिवार वालों के द्वारा खुद रचा गया है। एक सच्चाई है अगर किसी प्रतिष्ठित संस्थान से कोई व्यवसायिक शिक्षा ग्रहण न किया गया है तो मुश्किल से 15000 से 25000 के बीच की कोई नौकरी मिल पाता है। 20000 कमाने वाले लोग अपने परिवार जनों से 30000 -35000 बोलते हैं अब अगर लड़का निकट भविष्य में शादी योग्य है तो गांव वालो को 3500 -50000 तक की रकम बताया जाता है। कुछ अति उत्साही करीबी रिश्तेदारों के द्वारा इसे 50000 से 65000 तक की रकम बताया जाता है। इस भारी भरकम सैलरी पैकेज की लबादा इस विषम परिस्थिति में एक अलग चुनौती देने के लिए तैयार है। अधिकांश लोगों की सैलरी मार्च की या तो मिली नहीं है या होल्ड पर है। आगे क्या होगा यह भविष्य के गर्त में है। नौकरी से सेवा समाप्ति की सूचना उनके वरीय सहयोगियों के द्वारा कई लोगों को भेजी जा चुकी है। अब भविष्य न सिर्फ धुंधली सी दिख रहा है बल्कि काली छाया में जाता हुआ दिख रहा है।

किंकर्तव्य की स्थिति को और ज्यादा भयावह उनलोंगो के लिए और ज्यादा है जो अपने जड़ों से अलग होकर शहरों की चकाचौंध में बसने के लिए जो कुछ भी जमीन जायदद था उसको बेचकर 45 से 60 स्क्वेयर फीट की विला खरीदने के लिए दांव पर लगा चुके हैं। एक यथार्थ सत्य आज भी है कि गांव में बिना पैसे खर्च किए एक दो सप्ताह आज भी मज़े में रह सकते हैं। लेकिन शहर में एक भी दिन ऐसा निकाल पाना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में समाज के लोगों के लिए अब राष्ट्र प्रेम का चना भला कब तक चबाया जा सकता है।

सरकार की पूरी तिजोरी समान्य दिनों में अमीर पूंजीपतियों के लिए और संकट के समय गरीबी के लिए खोल दी जाती है। माध्यम वर्गीय परिवारों के हितों की पूर्ति के लिए न तो पहले किसी ने कुछ किया न आज ही कोई ऐसा मेकनिजम दिखाई दे रहा है। अल्बता केंद्र और राज्य सरकारें इस संकट की घड़ी में आपसे ही उम्मीद लगाए बैठे हैं। अभी आप अपनी मर्जी से राहत कोष में जमा कीजिए बाद में जबरदस्ती अलग अलग सरचार्ज के रूप में वसूला जाएगा।

समय की पुकार है अभी भी समाज के लोगों को आडम्बर और दिखावे के लिए हो रहे अपव्यय को रोकने की जरूरत है और प्रतिद्वंदी बनकर नहीं अपनों के साथ कंधे से कंधे मिलाकर चलने से इस संकट का सामना किया जा सकता है। अपनी जड़ों में ही उद्योग स्थापित करने की जरूरत है। व्यवसायिक खेती करने की जरूरत है। किसी भी प्रकार के अनहोनी के लिए फसलों की वीमा कराने की जरूरत है। औषधि वाले फूलों फलों की खेती पर भरोसा किया जा सकता है। लैवेंडर के तेल 30000 रुपए किलो बिकता है। संवा जैसे दिखने वाले इटालियन ग्रेन किनूवा 1200 रुपए किलो बिक रहा है चावल के बदले उपयोग किया जाता है। सूची बहुत लम्बी है शुरुआत तो करें। गेंहू चावल सीमित मात्रा में उपजाएं और धन उपार्जन करने की कुछ युक्ति गांव में रहने वाले लोगों को स्वयं करना होगा जिससे उनके बाहर में कमाने वाले पुत्रों पर निर्भरता कम हो सके और संकट की ऐसी स्थिति में अपने चाहने वाले लोगों को नौकरी जाने जैसी स्थिति में मददगार साबित हो सके। आप सभी का तर्कपूर्ण आलोचना का स्वागत है।

आपका अपना ही चिंतक
अरविंद सिंह
(लेखक सोशल इश्यू को अन्य विषयों के साथ सिविल सेवा परीक्षा के लिए पढ़ाते रहें है।)

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