Kanhaiya

 

कन्हैया की ललकार, राजद परेशान
दिल्ली/बेगूसराय। लोकसभा चुनाव की घोषणा के बहुत पहले से ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार अबकी लोकसभा चुनाव में उतर सकते हैं। चुकी कन्हैया स्वयं बेगूसराय से हैं तो ये अनुमान भी पहले से ही था कि उनकी पार्टी उन्हें वही से चुनाव मैदान में उतार सकती है। वैसे भी लाल सलाम वाली राजनीति के लिए बेगूसराय काफी उर्वर जमीन है। यूं ही इसे बिहार में मिनी मास्को नहीं कहा जाता।

बहरहाल अब जब लोकसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है तो भाकपा ने भी अपने प्रत्याशी के रूप में कन्हैया की बेगूसराय से दावेदारी पेश कर दी है और कोशिश में है कि उसे महागठबंधन के समर्थन हासिल हो जाये। लेकिन ऐसा होता प्रतीत नहीं हो रहा है। कन्हैया के मार्ग की बाधा राजद बन रही है। वह अपना दावा पेश कर रही है और साथ ही ये भी कह रही है कि भाकपा का वहां कोई जनाधार नहीं।

लेकिन सच ये है कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाकपा प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे थे और उन्हें अच्छा-खासा वोट मिला था। इसलिए राजद का ये तर्क बचकाना ही लगता है। असल बात ये है कि कन्हैया की राष्ट्रीय राजनीति में उभार और बढ़ती लोकप्रियता से कई दलों में बेचैनी है। यदि आप भाजपा के बारे में सोंच रहे हैं तो गलत सोंच रहे हैं। बेचैनी राजद, जदयू, रालोसपा(कुशवाहा) और लोजपा सरीखे नेताओं में है। लालू यादव, रामविलास पासवान, तेजस्वी यादव आदि इन जैसे नेता परेशान है क्योंकि कन्हैया उस स्पेस में अपनी पैठ बना रहा है जिसकी जागीरदारी लालू यादव और उनके चुन्नू-मुन्नू अपनी समझते थे। दूसरी चुभन ये भी है कि कन्हैया सवर्ण जाति का होकर दलित राजनीति कैसे कर सकता है? कन्हैया को लालू अपने बेटे तेजस्वी के प्रतिद्वंदी के रूप में भी देख रहे होंगे। इसलिए नहीं चाहते होंगे कि कन्हैया बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करे। फिर दसवीं पास और पीएचडी होल्डर का अंतर भी …..! इस संदर्भ में जागरण की वेबसाइट पर दिलचस्प खबर छपी है जिसे यहां भूमंत्र के पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं –

तेजस्वी के चलते फंसती दिख रही कन्हैया की गाड़ी

पटना [अरविंद शर्मा]। भाकपा की बिहार शाखा ने कन्हैया कुमार को बेगूसराय से प्रत्याशी घोषित कर दिया है, लेकिन महागठबंधन में अभी तक सीटों के बंटवारे पर फैसला नहीं हो सका है। लालू प्रसाद यादव भाकपा से बिहार में तालमेल के पक्ष में नहीं हैं। माले के प्रति उनका नरम रुख है, लेकिन भाकपा-माकपा से गठबंधन के पक्ष में नहीं हैं। बेगूसराय के लिए राजद की ओर से तनवीर हसन को संकेत कर दिया गया है। बिहार की सियासत में इसके अलग मायने निकाले जा रहे हैं। कन्हैया की तुलना तेजस्वी से भी की जा रही है।

सीटों के मसले पर महागठबंधन के घटक दलों के झंझट की बातें जैसे-जैसे बाहर आ रही हैं, वैसे-वैसे दलों और दिलों के फासले के पर्दे भी खुलते जा रहे हैं। आपस में रस्साकशी की तीन बड़ी वजहें हैं। हैसियत से ज्यादा सीटों की आकांक्षा, दूसरे की फसल काटने की मशक्कत और पारिवारिक विरासत की हिफाजत। पहली और दूसरी वजहों की सियासी अहमियत और जरूरत हो सकती है, लेकिन तीसरी वजह के केंद्र में बिहार में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के उभरते नेता कन्हैया कुमार हैं, जो लालू प्रसाद के राजनीतिक उत्तराधिकारी की सियासत के लिए सटीक और संगत नहीं दिख रहे हैं। बिहार की सियासत की नई पीढ़ी में प्रमुख रूप से तीन नाम शीर्ष पर हैं। लालू परिवार और राजद के भविष्य तेजस्वी यादव, वामदलों की उम्मीद कन्हैया कुमार और रामविलास पासवान के कुल दीपक चिराग पासवान। तीनों की अलग-अलग पहचान और आधार है।

कन्हैया से कई खेमे परेशान

कन्हैया के तेज-तर्रार तेवर, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय प्रसिद्धि और कुशल संवाद शैली से सिर्फ भाजपा को ही परेशानी नहीं है, बल्कि उन्हें भी है, जो प्रत्यक्ष तौर पर अब तक उनके खेमे में खड़े दिखते हैं। तेजस्वी और कन्हैया की उम्र लगभग बराबर है। दोनों लगभग एक साथ राजनीति में सक्रिय हुए हैं। दोनों की राजनीति भी भाजपा के प्रबल विरोध और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना पर टिकी है। दोनों का मकसद भले एक हो सकता है, किंतु दोनों के बीच दीवार भी दिख रही है, जिसे खत्म करने की कोशिश कभी नहीं की गई। राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के लिए कन्हैया को बिहार में जिस जमीन की तलाश है, उस पर लालू यादव ने दावा ठोक रखा है। अपने गृह क्षेत्र बेगूसराय में सक्रिय होकर प्रचार अभियान में जुट चुके कन्हैया के लिए लालू सीट छोडऩे के पक्ष में नहीं हैं। बहाना है कि बिहार में भाकपा-माकपा का आधार नहीं है।

लालू के तर्क में कितना दम?

लालू के तर्क में कितना दम है, यह भविष्य तय करेगा, लेकिन अतीत बता रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाकपा को बेगूसराय में एक लाख 92 हजार वोट मिले थे और उसके प्रत्याशी राजेंद्र प्रसाद सिंह तीसरे नंबर पर थे। वैसे भी इस क्षेत्र को बिहार में मिनी मास्को के नाम से जाना जाता है। शायद इसलिए कि भाकपा का यहां प्रारंभ से ही दबदबा रहा है। पिछली बार करीब दो लाख वोट लाने वाले भाकपा को राजद की ओर से निराधार बताने के संकेत को समझा जा सकता है।

दोनों की अदावत नई नहीं है

गांधी मैदान में पिछले 25 अक्टूबर को सीपीआई की रैली से तेजस्वी ने दूरी बनाकर कन्हैया के साथ प्रतिद्वंद्विता का संकेत छोड़ दिया था। कन्हैया की कोशिशों से पटना में आयोजित जिस एकता रैली में कांग्रेस के कद्दावर नेता गुलाम नबी आजाद समेत कई दिग्गज आए थे, वहीं तेजस्वी पटना में रहते हुए भी जाना मुनासिब नहीं समझा था। कोरम पूरा करने के लिए राजद की ओर से प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे और बेगूसराय के संभावित प्रत्याशी तनवीर हसन को भेज दिया गया था। संदर्भ आया तो अतीत के पन्ने पलटे जा रहे हैं। तेजस्वी ने कन्हैया की उस वक्त भी खोज-खबर नहीं ली थी, जब पटना में एम्स के डॉक्टरों के साथ विवाद हुआ था। बेगूसराय में मारपीट की घटना पर भी राजद नेता मौन ही रहे थे।

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