Bhumihar Politician

विगत 28 सालों से राजनैतिक छद्म के शिकार भूमिहार ब्राम्हण समाज के मर्मों पर प्रकाश डालती एवं समाज के भीतर से वर्तमान में स्थापित अपने सभी राजनैतिक रहनुमाओं के खिलाफ निकलती आवाज पर ब्रम्हर्षि चिंतक व विचारक ” राजीव कुमार ” के व्यक्तिगत शोध पर आधारित प्रस्तुति

आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर वैसे तो हर वर्ग में एवं हर जगह चर्चा का बाजार गर्म हो चुका है । लेकिन भूमिहार ब्राम्हण जाति में इसबार इस चुनाव को लेकर चिंतन एवं मनन खूब जोर शोर से हो रहा है ।खासकर भूमिहार युवाओं में इस बार जोश ज्यादा ही उफान मार रहा है । इसके कारण भी हैं कि पिछले 28 वर्षों से भूमिहार समाज चुपचाप अपने हक़ की आहुति दे देश एवं समाज की भलाई हेतु चुपचाप देख रहा था परंतु इस समाज को सिवाय नुकसान के कुछ नहीं मिला ।

वैश्विक पटल पर आये आर्थिक परिवर्तन के इस दौर में भूमिहार समाज ने भी प्रतिस्पर्धात्मक रूप से अपने आप को बनाए रखने के लिए पारंपरिक पेशा को छोड़कर केवल और केवल शिक्षा पर ध्यान दिया । परंतु राजनैतिक छद्म और सरकारी सहयोग की नगण्यता ने इस सांस्कृतिक एवं वैचारिक रूप से सुसभ्य एवं जागरूक समाज के आगे बढ़ने के राह में बाधा उत्पन्न की और नतीजा पूरा समाज संघर्ष एवं त्याग के बावजूद भटकाव का शिकार हो गया ।

ऐसा भी नहीं था कि भूमिहारों की राह में अवरोध किसी अन्य ने उत्पन्न किया बल्कि भूमिहारों के भटकाव के पीछे इसी समाज के छद्मि राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ के लिए समस्त भूमिहार समाज को खाई की ओर धकेलने का षड्यंत्र किया ।

बहुतेरे ऐसे भूमिहार नेता थे जिन्होंने भूमिहारों का ही नुकसान करके अपनी राजनैतिक रोटी सेंकी और इस प्रकार नकारात्मक राजनीति के माध्यम से सुर्खियां बटोरकर सत्ता की मलाई खाई और खुद के लिए जमकर धनोपार्जन किया ।

ऐसे छद्मि भूमिहार नेताओं ने सत्ता का दुरूपयोग केवल और केवल अपने निजी स्वार्थ साधने एवं अपने सगे सम्बन्धियों को लाभ पहुँचाने तक ही किया एवं अपने भूमिहार समाज की सेवा से कोसों दूर रहे ।

स्थिति इतनी विपरीत हो चुकी है कि बिहार में 9964 पदों पर सिपाही भर्ती में भी जमकर हुई धांधली की खबर अख़बारों में छपी जिसमें भूमिहार समेत तमाम सवर्ण जाति के केवल 64 अभ्यर्थियों के चयन की बात सामने आई और एक सवर्ण नेता ने बिहार सरकार को इस मसले पर श्वेत पत्र जारी करने तक की चुनौती सदन के भीतर दे दी परंतु इस मसले पर भूमिहार समाज की नुमाइंदगी करने वाले एक भी नेता ने सरकार को इसपर घेरने और दूध का दूध और पानी का पानी करने का प्रयास नहीं किया यानि कुल-मिलाकर ढाक के तीन पात यानि अपने ही समाज के साथ विस्वासघात और इसका ही नुकसान । स्वाभाविक है कि इनकी मंशा बन चुकी है कि जब समाज में रोजी रोजगार की कमी होगी तो समाज में आर्थिक कमजोरी आएगी और गरीबी छायेगी और इस प्रकार समाज के सारे लोग दो जून की रोटी खातिर इन नेताओं की झंडाबरदारी करेंगे ।

आज जब बहुतेरे शिक्षित युवा उन स्थापित भूमिहार राजनैतिक रहनुमाओं से अपने हक़ की बात पूछ रहे हैं तो उन युवाओं को गुमराह करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि उनके हक़ की आवाज को बंद किया जा सके ।

आज चुनावों के वक्त युवाओं को उनके रोजी रोजगार के असल मुद्दे से भटकाकर उनको तथाकथित राष्ट्रवाद का झुनझुना पकड़ाया जा रहा है और उनको छद्मपूर्वक ये समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि देश खतरे में है ।

राष्ट्रवाद/हिन्दुत्ववाद एवं अन्य डपोरशंखी/फालतू के मुद्दों के सहारे एवं इनका झुनझुना थमाकर भूमिहार युवाओं के वाजिब हक़ की आवाज को दबाने का कुत्सित प्रयास हो रहा है जिसमें वर्तमान में स्थापित सारे भूमिहार नेता एवं उनके शागिर्द ( लग्गु-भग्गु ) ज़ोर शोर से लगे हुए हैं ताकि येन केन प्रकारेण समाज को गुमराह कर सत्ता फिर से प्राप्त कर खुद मलाई खा सकें ।

इन स्थापित राजनैतिक रहनुमाओं एवं उनके शागिर्दों की उछल कूद और उनकी बेचैनी हर जगह खुलेआम देखी जा सकती है चाहे वो कोई चौक चौराहा हो या सोशल मीडिया रुपी वैचारिक आदान प्रदान करने का आधुनिक मंच ।

हर जगह भूमिहार समाज के स्थापित नेताओं एवं उनके शागिर्दों की उपस्थिति साफ साफ दिखती है एवं उनके असफल योगदान की चर्चा करते ही मानों इनपर बिजली गिर जाती है और अपनी पोल खुलती देख ये अपने बचाव में हर हथगंडा अपनाकर लोगों को गुमराह कर उनका वोट बटोरना चाहते हैं ।

आज भूमिहार समाज को न तो भाजपा से कोई आपत्ति है और न ही कांग्रेस से ।
भूमिहार समाज को यदि आपत्ति है तो इन पार्टियों में भरे पड़े अपने पहले से स्थापित नेताओं से है जिन्होंने समाज का प्रतिनिधित्व करने का बीड़ा उठा रखा है परंतु समाज की भलाई हेतु सरकार एवं पार्टी के भीतर इसके हक़ एवं हुकूक की बात करने की भी इनके पास फुरसत नहीं और ना ही इनको इससे कोई मतलब है । इन स्थापित नेताओं को तो जैसे इतना से ही मतलब है कि किसी प्रकार समाज की सौदागिरी करके अपने लिए धन अर्जित करना यानि इनका तो बस यही लगता है सपना ,राम नाम जपना पराया माल अपना ।

बहुत दिनों से भूमिहार समाज की राजनैतिक नुमाइंदगी करने वाले इन नेताओं को सरकार एवं पार्टी से हर तरह की सुख सुविधा उपलब्ध कराइ जाती है परंतु उस सुख सुविधा के बावजूद राजशाही ठाट बाट से प्रेरित हो एवं अभिमान में इन भूमिहार नेताओं ने अपने समाज की समस्याओं से मुँह मोड़ते हुए खुद को किनारा कर लिया है ।इन स्थापित भूमिहार नेताओं की जमीनी सच्चाई यह है कि केवल चुनावों के वक्त ये अपने धनबल एवं छलबल के सहारे जनता के समक्ष हाजिर होते हैं एवं उनकी आँखों में धूल झोंककर उनसे वोट ठग चंपत हो जाते हैं ।
इन सभी भूमिहार नेताओं ने लोकतंत्र का माखौल बनाकर रख दिया है ।

आखिर लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि चुनने के क्या मायने हैं ? जब हमारी समस्याओं से किसी को सरोकार ही नहीं , हमारी कोई सुनने वाला ही नहीं , तो फिर चुनाव कराने की क्या जरूरत ?

सभी स्थापित नेताओं के पास सत्ता की ताकत होने के कारण पर्याप्त धनबल तो हो ही चुका है , वो खुद ही अपने आप को राजा घोषित कर दें ।आज लोकतंत्र का ऐसा मजाक बना कर रख दिया गया है कि लोगों को केवल पार्टियों के नाम पर भरमाया जाता है और उस तरफ मोड़ने का प्रयास किया जाता है ।धनबल के चकाचौंध ने दूरदर्शी एवं स्वच्छ, निष्ठावान तथा ईमानदार चरित्र के लोगों के चुनाव लड़ने एवं देश एवं समाज की सेवा करने का मार्ग ही जैसे बंद कर दिया । हर तरफ पैसों के बल पर केवल देश एवं समाज को छलने का कार्य चल रहा है । किसी भी नेता एवं पार्टी में देश की सेवा एवं विकास को लेकर गंभीरता एवं संजीदगी दिखाई नहीं दे रही है ।केवल झूठे प्रचार प्रसार के सहारे सत्ता प्राप्त करने का एक सुनियोजित एवं छद्म खेल चल रहा है ।
स्थिति इतनी जटिल एवं विकराल बनती जा रही है कि कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं है केवल अपनी सुनाना चाहता है ।

एक भूमिहार नेता जो खुद को हिंदुत्व के नाम पर झूठा मुखौटा लगाकर हिन्दू ह्रदय सम्राट के नाम पर समाज को बरगलाने का प्रयास कर रहे हैं , उन्होंने समाज के लोगों के सांकेतिक विरोध स्वरुप दिखाए जाने वाले काले झंडे को झेलना एवं उनसे बात करना तक उचित नहीं समझा एवं प्रश्न पूछने वाले एवं विरोध करने वाले से मिलने एवं बात करने के बजाए अपने पालतू गुंडों से उनपर दौड़ा दौड़ा डंडे से प्रहार करवाया और खुलेआम लोकतंत्र की मर्यादा को तार तार करते हुए अपने गुंडे स्वरूप का प्रदर्शन किया । मिडिया में आई इस खबर पर उनकी पार्टी ने भी शायद संज्ञान लेना उचित नहीं समझा और उस नेता पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई ।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर लोकतंत्र के क्या मायने और हम किस ओर इस लोकतंत्र को ले जाना चाहते हैं ।
क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर भी रोक लगाना चाहते हैं या सांकेतिक विरोध कर प्रश्न पूछने पर भी प्रतिबन्ध लगाना चाहते हैं ?

मुझे मालूम है कि मेरे इस लेख को पढ़कर शायद ऐसी कलुषित मानसिकता वाले छद्मि नेताओं एवं उनके शागिर्दों को कष्ट होगा लेकिन समाज के युवाओं में जो जागृति आ चुकी है वह एक शुभ एवं सकारात्मक संकेत है एवं मेरे इस लेख को पढ़ने से वोटों की गोलबंदी हेतु जो तमाम तरह के धकियानुषि अफवाह फैलाये जाते हैं उनको लेकर इन जागृत युवाओं के मन का संशय भी दूर होगा और इस प्रकार से यह कदम लोकतंत्र की मजबूती एवं इसकी साफ सफाई हेतु मील का पत्थर साबित होगा ।

बहुतेरे युवा एवं बुद्धिजीवी आज देश में चल रही प्रपंचकारी राजनीति से त्रस्त हो चुके हैं और वर्तमान सारे स्थापित राजनेताओं से इनका मोह भंग हो चूका है और भूमिहार भी इससे अछूता नहीं है ।
इस लोकसभा चुनाव में बहुतेरे भूमिहार युवाओं एवं बुद्धिजीवियों द्वारा प्रतिकार स्वरुप दिया जाने वाला NOTA रुपी मतादेश सभी दल विशेष का झंडा ढोने वाले जनप्रतिनिधियों को सन्मार्ग पर लाने हेतु बतौर शिक्षा एक जोरदार जनादेश साबित होने वाला है जो आने वाले समय में लोकतंत्र की सुचिता का मार्ग प्रशस्त करेगा ।