Pushpam Priya Choudhary

प्लूरल्स पार्टी बनाकर बिहार की राजनीति में स्थापित राजनेताओं और पार्टियों को चुनौती देने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी का कहना है कि बिहार के मुख्यमंत्री राहत कोष में दान देना व्यर्थ है क्योंकि इन पैसों का कभी इस्तेमाल ही नहीं होता. कोरोना के आफत के बीच मुख्यमंत्री राहत कोष में पैसा जमा करने की फिर से बिहार सरकार फिर भावुक अपील कर रहा है. लेकिन इन पैसों का सदुपयोग होता है? पुष्पम प्रिया चौधरी की बिहार डायरी . पढ़िए –

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राहत कोष के पैसों का क्या होता है?

मुख्यमंत्री राहत कोष के पैसों का इस्तेमाल सिफर

कुछ लोग कोरोना जैसी आपदा के समय मुख्यमंत्री राहत कोष में दान को लेकर बड़े ही उत्साही हैं और मुझसे भी दान देने को कह रहे हैं। मैं आपको बता दूँ कि मैं ऐसे दान के सख़्त ख़िलाफ़ हूँ क्योंकि यह सिर्फ़ सरकार के प्रोपगंडा का हिस्सा है। ऐसी दानपेटियों को विपदा से समय खोलकर सिर्फ़ लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल किया जाता है। सरकार को ऐसे पैसों की न तो जरुरत होती है और न ही इसका कुछ सदुपयोग होता है। जैसे बिहार के मुख्यमंत्री राहत कोष में पहले ₹25-50 करोड़ होते थे जो अब विपदाओं में लोगों से ले-लेकर ₹800 करोड़ से ज़्यादा हो चुके हैं, लेकिन ख़र्च उसकी तुलना में सिफ़र है।

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सिर्फ़ दुर्घटनाओं में मृत्यु के मुआवज़े को छोड़ दें तो बड़े ख़र्च के नाम पर बस विभागों में पैसे हस्तांतरित होते हैं जिसका कोई फलाफल शायद ही हो। 2008 की कोसी बाढ़ में ₹200 करोड़ से ज़्यादा जमा किए गए। मुख्यमंत्री जी ने ‘घोषणा’ की कि 100 जगहों पर पक्के और बड़े-बड़े बाढ़ आश्रय के भवन बनाए जाएँगें। इस बार की तरह ही आपदा विभाग को इसके लिए ₹100 करोड़ रूपये ‘हस्तांतरित’ किए गए। साहब, 2008 के बाद कितने बाढ़ आश्रय भवन बन गए हैं, बताएँगे क्या?

बाढ़ के नाम पर लिए पैसों का क्या हुआ ?

पिछले साल भी बाढ़ के नाम पर कुछ ₹100 करोड़ से ज़्यादा पैसे दान में मिलने की बात आयी। उन पैसों का क्या हुआ? और ये दान पेटी को छोड़िए, ये बताएँ कि लोगों के टैक्स के पैसे का क्या होता है? वर्ष 2019-20 का स्वास्थ्य का बजट ₹10,314 करोड़ का था। वो पैसे खर्च हो गए? और हो गए तो सरकारी अस्पतालों में दवाईयाँ, किट, बेड और सफ़ाई क्यों नहीं हैं? सरकार के कामकाज का हिसाब ये है कि अभी-अभी महालेखाकर ने बताया है कि वर्ष 2017-18 में अठारह विभागों के कुल ₹25,197 करोड़ खर्च में ₹19,664 करोड़ अंतिम तिमाही में और ₹18,549 करोड़ तो अंतिम मार्च महीने में खर्च किए गए। सबको पता है कि ये ‘खर्च’ भी कुछ और नहीं एक खाते से दूसरे खाते में बस ट्रान्स्फ़र होते हैं।

क़िल्लत पैसे की नहीं, सरकार के नीयत की होती है

लोगों की भावुकता का फ़ायदा उठाना बंद कीजिए। लोगों ने आपको चुना है, टैक्स के पैसे दिए हैं, प्रोफ़ेशनली काम कीजिए। क़िल्लत पैसे की नहीं, सरकार के नीयत की होती है। और लोगों को भी इन सब जालसाजियों से बचने की ज़रूरत है अगर बिहार को सच में ‘नो नॉन्सेन्स’ तरीक़े से आगे बढ़ना है तो। चैरिटी करना ही है तो अपने स्तर से कीजिए या किसी ज़िम्मेदार संस्था को दीजिए। #प्रगतिशीलबिहार2020 #पॉज़िटिवपॉलिटिक्स2020

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