अजीत अंजुम,वरिष्ठ पत्रकार –

कुछ साथियों ने कमेंट में और इनबॉक्स में पूछा है कि मुझे राजपूतों से क्या दिक्कत है कि मैं इतना लिखता हूं . मुझे किसी राजपूत या किसी भी जाति या किसी भी धर्म से कोई दिक्कत नहीं . मैं सिर्फ चंद राजपूत नेताओं की दादागीरी के खिलाफ लिख रहा हूं , जो खुद को देश के कायदे -कानून से ऊपर समझते हैं . अगर ऐसे लोग मेरी जाति के होते तो भी लिखता और शायद ज्यादा तल्ख लिखता क्योंकि तब मुझे ऐसे सवालों की चिंता नहीं होती . इस शहर में मेरे जो सबसे करीबी हैं , वो राजपूत हैं . मेरे कई दोस्त राजपूत हैं . मैं तो कई बार उन्हें भी अब करणी सैनिक कहकर चिढ़ाता हूं . 
सवाल यहां राजपूत का है ही नहीं . सवाल उस स्वांग का है , जो कुछ लोग रच रहे हैं. पद्मावती के विरोध के नाम पर अपनी दुकानें चमका रहे हैं . देश के सिस्टम को ऐसे ललकार रहे हैं , जैसे उनकी तलवार और ताकत के दम पर ही देश चल रहा हो . इन सबको क्या किसी ने हर रोज बलात्कार का शिकार होने वाली बेटियों -बहनों को बचाने के लिए कोई आंदोलन या मुहिम चलाते देखा है ? जिस हरियाणा से ये फर्जी योद्दा ललकार रहे हैं , वहीं रोज मासूम बच्चियों से बलात्कार हो रहा है . जिस एमपी में ये सिनेमा हॉल फूंकने की धमकी दे रहे हैं , वो बलात्कार के मामले में टॉप पर है . राजस्थान का हाल भी छिपा नहीं हैं . ये सब किस दड़बे में रहते हैं कि कभी बहू -बेटियों की आबरू बचाने के लिए कभी सड़क पर नहीं आते लेकिन अभी पब्लिसिटी के लिए और कैमरों के सामने चमकने के लिए मूछों पर ताव दे रहे हैं . तलवारें चमका रहे हैं .