-सीताराम सिंह-

गुजरात का मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बन गया तो वामपंथ से लेकर कांग्रेस और तमाम सेक्युलरवाद की बत्ती लग गयी. सपने में भी उन्होंने ऐसा नहीं सोंचा था. इसलिए वे 2014 से गमगीन हैं और उस गम में घुले जा रहे हैं और इसलिए जब भी मौका मिलता है सांप्रदायिकता, फर्जी एनकाउंटर, छदम राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा आदि के मुद्दे पर प्रधानमंत्री को टारगेट करना नहीं भूलते. गम में आखिर करें भी तो क्या करें?

लेकिन ऐसा नहीं है कि पूरा देश ही इनके नक़्शे कदम पर चल रहा है. ये मुठ्ठी भर लोग हैं और बाकी देशवासी प्रधानमंत्री मोदी को दिलो-जान से चाहते हैं और उन्हें देखकर उनका सीना 56 इंच का हो जाता है. देशवासियों के अलावा सेना के जवानों और अधिकारियों का सीना भी प्रधानमंत्री मोदी को देखकर चौड़ा हो जाता है, बोले तो 56 इंच का हो जाता है. इसकी वजह बहुत सीधी, साफ़ और स्पष्ट है. सेना मनोबल से चलती है और सेना का मनोबल नरेंद्र मोदी किस तरह से बढ़ाते हैं, ये किसी से छुपा नहीं. अपने ओजस्वी भाषण में भारतीय सेना का जब भी मोदी उल्लेख करते हैं तो उनके चेहरे पर आए भाव को देखकर हर भारतीय सैनिक की छाती दुगुनी हो जाती है.

नरेंद्र मोदी से पहले ऐसा कोई प्रधानमंत्री नहीं हुआ जो अपना हर बड़ा उत्सव सैनिकों के साथ मनाता हो. उत्सव में उनके दुःख-सुख का साथी बनता हो. उन्हें ये एहसास दिलाता हो कि तुम अकेले नहीं, तुम्हारे पीछे किसी भी सर्जिकल स्ट्राइक की घड़ी में तुम्हारा प्रधानमंत्री तुम्हारे पीछे खड़ा है जो दुश्मन के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए तुम्हारे साथ हर कदम पर खड़ा है.फिर सेना का मनोबल क्यों न 56 इंच का हो.

इसी एहसास की वजह से शहीद की बेटी पीएम मोदी को अपने पिता के समतुल्य समझती है और सार्वजनिक रूप से आजतक पर उन्हें ये सम्मान देती है और सेना के साथ-साथ हम देशवासियों का सीना भी ऐसे महानायक पीएम को देखकर 56 इंच का हो जाता है.लेकिन आज जब वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर एक रिटायर्ड सैनिक ने कथित तौर पर जहर खाकर आत्महत्या कर ली तो विपक्ष जिस तरह उसकी आड़ में में सियासत कर रही है वो शर्मनाक है. विपक्ष का काम भी सिर्फ आलोचना करना नहीं . पता नहीं मिट्टी पलीद होने के बावजूद कांग्रेस इसे कब समझेगी. (लेखक सेवानिवृत सरकारी अधिकारी हैं)
ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र