भिलाई। हाल ही में महेंद्रगिरी के पर्वत पर एक धनुष मिला था। उस धनुष का वजन नब्बे किलो था। किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ये धनुष किसका। वो कौन होगा जो नब्बे किलो का धनुष अपने कंधे पर लेकर चलता होगा।
पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरी पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी। इसलिए बात सहज गले से उतरने लगी कि शायद धनुष परशुराम का ही होगा।
परशुराम इस धरती पर ऐसे महापुरुष हुए हैं जिनकी धनुर्विद्या की कोई पौराणिक मिसाल नहीं है। पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य और खुद कर्ण ने भी परशुराम से ही धनुर्विद्या की शिक्षा ली थी। बेशक इस मामले में कर्ण थोड़े अभागे रहे थे। क्योंकि अंत में परशुराम ने उनसे ब्रह्मास्त्र ज्ञान वापस ले लिया था।
महाभारत के मुताबिक अर्जुन धनुर्विद्या में प्रखर थे। अर्जुन साधना के बल पर पानी में देखकर घूमती हुई मछली की आंख को वेध दिया था।
शास्त्रों के अनुसार चार वेद हैं और तरह चार उपवेद हैं। इन उपवेदों में पहला आयुर्वेद है। दूसरा शिल्प वेद है। तीसरा गंधर्व वेद और चौथा धनुर्वेद है। इस धनुर्वेद में धनुर्विद्या का सारा रहस्य मौजूद है। ये अलग बात है कि अब ये धनुर्वेद अपने मूल स्वरुप में कहीं नहीं है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि धनुर्वेद इस देश से खत्म हो गई है। राजा दशरथ से धनुर्विद्या के प्रयोग से ही श्रवण कुमार का वध किया था।
साभार – आईबीएन



