मनोज सिन्हा मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए और ये सिर्फ मीडिया का शिगूफा नहीं था. इसके पीछे सच्चाई भी थी. लेकिन सूत्रों की माने तो अंतिम समय में उनका रास्ता आरआरएसएस ने काट दिया और वे मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गए.यही वजह रही कि आज वे शपथ ग्रहण समारोह में भी नज़र नहीं आये और एक तरह से उन्होंने उसका मौन बहिष्कार कर दिया और गाजीपुर में ही जमे रहे.
आजतक की माने तो केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा पिछले छह महीने से यूपी के सीएम पद के लिए प्रबल दावेदार माने जा रहे थे. पीएम नरेंद्र मोदी के करीबी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी चाहते थे कि वह यूपी के सीएम बन जाएं, लेकिन ऐन वक्त पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरफ से लाल झंडी मिलने के बाद उनका नाम काट कर योगी के सिर पर ताज पहना दिया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स की माने तो होली के बाद आरएसएस और बीजेपी के शीर्ष नेताओं की बैठक में उनके पर विचार किया गया, लेकिन आरएसएस उन्हें सीएम नहीं बनाना चाहता था.आरएसएस और बीजेपी के बीच समन्वय का काम करने वाले ज्वाइंट सेक्रेटरी ‘कृष्ण गोपाल’ सीएम पद के लिए मनोज सिन्हा के नाम के खिलाफ थे. 90 के दौर में कृष्ण गोपाल जब पूर्वांचल में आरएसएस के प्रचारक थे, उस वक्त भी मनोज सिन्हा सांसद थे. वैचारिक स्तर पर दोनों के बीच रस्साकसी चलती रहती थी.
बताया जा रहा है कि अंतिम समय तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह मनोज सिन्हा के पक्ष में ही थे. उन्हें संकेत भी दे दिया गया था. यही वजह है कि वह शपथ ग्रहण के दो दिन पहले ही अपने गृहनगर आ गए थे. उस वक्त ये भी कहा गया कि वह वाराणसी में काल भैरव और बाबा विश्वनाथ का दर्शन करने के बाद अपने पैतृक नगर में कुल देवता का आशीर्वाद लेंगे और 19 मार्च को सीएम पद की शपथ लेंगे, लेकिन 18 मार्च को पूरी कहानी बदल गई. आरएसएस के दखल के बाद पीएम मोदी ने खुद योगी के नाम को आगे बढ़ा दिया. (स्रोत-आजतक/विविध)
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