ब्रहमेश्वर मुखिया के शहादत दिवस पर बौद्धिक नक्सलियों को आपत्ति
नक्सलियों के खिलाफ देश के सबसे बड़े रणनीतिकार बाबा ब्रह्मेश्वर मुखिया की पुण्यतिथि पर हर साल उनकी याद में शहादत दिवस मनाया जाता है. 1 जून 2012 को ही उनकी कायरों ने छुपकर हत्या कर दी थी. तबसे अखिल भारतीय किसान संगठन हर साल उनकी याद में पटना में कार्यक्रम आयोजित करता है. लेकिन जैसे ही इस कार्यक्रम की तिथि नजदीक आती है बौद्धिक नक्सली बाबा ब्रह्मेश्वर को याद कर दर्द से बिलबिलाने लगते हैं. उन्हें काल के गाल में समा चुके अपने देशद्रोही नक्सली भाई जो याद आ जाते हैं.
फिर क्या वे बौद्धिक आतंकवाद मचाने में लग जाते हैं. सबसे ज्यादा उन्हें आपत्ति ‘शहादत’ दिवस नाम से होती है. उसे लेकर वे खूब हंगामा मचाते हैं. कहते हैं कि दलितों के हत्यारों को शहीद कैसे कह सकते हैं? लेकिन पगलेटों तुम जिसे जाति के चाशनी में डुबोकर दलित कह रहे हो, वो खूंखार और देशद्रोही नक्सली थे. ऐसे ही नक्सली सुकमा में हमारे सैनिकों की हत्या करते हैं. इन्ही नक्सलियों को बाबा ब्रह्मेश्वर ने बाहुबली बनकर धूल चटायी और अंततः लड़ते-लड़ते अपनी जान दे दी. फिर उनकी मौत को शहादत दिवस क्यों न कहे?
बहरहाल बौद्धिक नक्सलियों का अपना एजेंडा है और वे अपने एजेंडे पर ही चलते रहेंगे. लेकिन इस बार उन्हें और चिढाना है और बाबा ब्रह्मेश्वर के शहादत दिवस का खूब प्रचार-प्रसार करना है और इसे भव्य से भव्य बनाने की कोशिश करनी है ताकि नक्सलियों को ज्यादा से ज्यादा मिर्ची लगे. इसलिए आमन्त्रण पत्र को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये. बौद्धिक नक्सलियों तक जरुर पहुंचाएं. कार्यक्रम में भारी संख्या में पहुंचे और कार्यक्रम की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पाट दे. बहरहाल पढ़िए बौद्धिक नक्सली ‘दिलीप मंडल’ का एक पुराना स्टैटस जिसे ऊपर वाले पेपर कटिंग के साथ शेयर 2015 में शेयर किया गया था.
Dilip C Mandal 4 June 2015 · – दलितों-ओबीसी का सबसे खूंखार हत्यारा अब मीडिया की नजर में “अमर शहीद” है! क्या हरिवंश जी? आपके अखबार में बरमेश्वर को “अमर शहीद” ब्रह्मेश्वर मुखिया लिखा जाएगा? शहादत दिवस मनाया जाएगा? इसके बाद तो उसे भारत रत्न देने की मांग करना ही बाकी रह गया है. वो भी करवा ही दीजिए. प्रेस रिलीज भेजने वाले ने अगर अमर शहीद लिख भी दिय़ा था, तो क्या डेस्क पर कैप्शन यानी फोटो परिचय लिखने के लिए रणबीर सेना के लोग बैठे हैं? जो नहीं जानते हैं, उनके लिए जानकारी यह है कि बरमेश्वर बिहार में भूमिहार भूस्वामियों की कुख्यात रणबीर सेना का मुखिया था. कई दलितों और ओबीसी की सामूहिक हत्याकांडो का खूंखार आरोपी. बरसों जेल में रहा. बाहर आने के बाद फायरिंग की एक वारदात में मारा गया. संपादक हरिवंश अब जेडी-यू के टिकट पर राज्य सभा के सांसद हैं. किसी दौर में आंदोलनकारी पत्रकार थे.




