– शायक आलोक
भूमिहार क्यूरोसिटी वोट : यदि राजद ने वाकई तनवीर हसन को बेगूसराय का प्रत्याशी बना लिया है तो कन्हैयालाल के लिए यह कठिन घड़ी है. पिछले कथित मोदी लहर में भी तीन लाख से अधिक मत तनवीर हसन को गिरे थे लेकिन चार लाख मत के दम पर भोला सिंह जीत गए थे. तीन और चार का अनुपात है. चार विधानसभाओं में भूमिहार प्रबल हैं, तीन विधानसभाओं में अन्य.
बेगूसराय सहित बिहार की वस्तुस्थिति यह रही है कि जातिवादी पार्टियों ने कम्युनिस्ट पार्टियों के गरीब-पिछड़े वोट बैंक को जाति में बांटकर अपने साथ लगा लिया और ये मुंह देखते रह गए. दिल्ली के हैबिटेट सेंटर में बैठ ये विचारधारा की जितनी शेखी बघारें, इन्होंने एक के बाद एक चुनावी दुरभिसंधियाँ की. चोर पाकेटमार अपराधी पूंजीपति जमींदार सबके साथ ये लाल झंडा लिए दौड़े कि गठबंधन की एक दो सीटें इन्हें मिल जाए. सीताराम केसरी के कांग्रेसी गणित में एक बहुत बड़ा वोट बैंक समता और भाजपा की ओर मुड़ गया.
आशय यह कि सीपीआई अपीलिंग नहीं है, कन्हैया है. कन्हैया की जीत भाजपा-जदयू को नहीं पड़ने वाले मत प्लस कम्युनिस्ट कैडर मत प्लस ‘भूमिहार क्यूरोसिटी वोट’ से ही हो सकती है.
बेगूसराय में भूमिहार मतों के तीन-चार सेंध हैं. एक एक हिस्सा भाजपा कांगेस और सीपीआई-सीपीएम का कैडर मत है. ‘भूमिहार क्यूरोसिटी वोट’ पदावली मैंने ही गढ़ी है. इसमें दो तरह के मत शामिल हैं – पहला, जिसके जीतने की हवा हो, उसे पड़ेगा. ये मत भूमिहार महिलाओं और कमजोर प्रत्याशियों के समर्थकों की ओर से गिरते हैं. दूसरा, न्याय का मत. भूमिहार अपने मने बड़े न्यायप्रिय हैं. महिला, मुसलमान, देश, सुशासन, अमेरिका, इटली – किसी भी आधार पर यदि उन्हें लगे कि न्याय का दारोमदार उनके कंधों पर है तो वे सारे खाँचे तोड़ उस आधार पर वोट करते हैं.
अब जैसे न्याय के लिए ही मैं यहाँ गिरिराज सिंह का नाम लिखूंगा. देश उन्हें उनके विवादास्पद वक्तव्यों के लिए जानता है और मैंने करीब से उनकी नम्य नम्रता को देखा है.
अब जैसे न्याय के लिए यह कहूँगा कि कन्हैया देश के युवा प्रतिरोध का प्रतीक है, यदि कन्हैया पर भी आप एकमत नहीं हो सकते तो लानत इस विपक्ष पर.
(लेखक के एफबी वॉल से साभार)




