
सवर्ण: शायद इसमे चार जाति आती है भूमिहार ब्राह्मण राजपूत और कायस्थ। लेकिन इन सबो में सबसे उतावली जाति अगर मेरे हिसाब से देखे तो भूमिहार ही है।जिनको अन्य जातियों में आजकल एक नया प्रचलन हुआ है बोलने का बिन पेंदी का लोटा।माफ करे अगर किसी को बुरा लगा हो।लेकिन यथार्थ यही है ।
कभी हम कांग्रेस का झोला ढोते थे । आज कतिपय कारणों से भाजपा का झोला ढो रहे हैं।क्योंकि कांग्रेस कालांतर में राजद सपा जैसी पार्टीयो का जोड़ीदार हो गई और हमे कांग्रेस से मोहभंग करना पड़ा।लेकिन आज भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी हमे तरिस्कृत कर रहा है। कांग्रेस तो कर ही चूंकि है ।
इस मुद्दे पर शायद कोई बन्धु बांधव अगर विवेचना किये हो तो कृप्या अपना बहुमुल्य सुझाव देना चाहेंगे।
सबसे बड़ी दिक्कत है कि हम एक नही है। उदाहरणार्थः एक मुखिया चुनाव को ही ले ले जिस पंचायत में भूमिहार मतों की संख्या अधिक है और अपने दम पर मुखिया जिताने की संख्याबल रखते हैं । लेकिन वहाँ भी क्या हाल है कोई कुर्मी कुशवाहा यादव जीत हासिल कर जा रहा है।
कारण एक ही कि वो मुखिया कैसे बनेगा ?
हम उसको हराकर दम लेंगे । इसी आपसी वैमनस्यता के कारण आज कोई भी राजनीतिक दल हमे तरजीह देने की सोचता भी नही है।कभी हम अटल बिहारी के नाम पर वोट करते है कभी मोदी के नाम पर क्योंकि देशप्रेम का ठेका जो भूमिहार समाज ने ले रखा है ।
लेकिन मिलता क्या है ?
मैंने अपने निजी जीवन मे कई राजपूत क्षत्रपों को देखा है कि वैशाली लोकसभा में रघुवंश प्रसाद (राजद) के लिए और सारण (छपरा ) लोकसभा के लिए राजीव प्रताप रूढ़ी ( भाजपा) के लिए वोट मांगते हुए ।
क्योंकि उनके लिए अपनी जाति महत्वपूर्ण है न कि पार्टी । इसकारण आज भी कोई भी पार्टी राजपूतों को नजरअंदाज नही करती है चाहे क्षेत्रीय दल हो या राष्ट्रीय दल।
लेकिन यहाँ क्या है हम अपने भाई ब्राह्मण से भी सामंजस्य बना के नही रखे हैं । जिस कारण ब्राह्मण समाज हमेशा से भूमिहार समाज के विपरीत वोट करता आया है ।
यह मेरा व्यक्तिगत मत है क्योंकि मैने नजदीक से मुखिया चुनाव विधायक चुनाव एवं सांसद चुनाव को देखा हूँ और सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया हूँ ।
अतः हमें अब नए सिरे से सोचना होगा कि हम राजनीतिक तौर पर क्या करे जिससे हमारी पहचान और कद्र सुरक्षित हो सके।
मेरा व्यक्तिगत मानना है कि वैसे उम्मीदवारों को हराने में अपना सर्वस्व लगा दे जिन्होंने sc/st बिल का समर्थन किया यथा राम विलास पासवान एवं वैसे उम्मीदवारों को भी जो हमारे प्रत्यक्ष विरोधी है जैसे नित्यानंद राय , राजद उम्मीदवार , उपेंद्र कुशवाहा इत्यादि।
जहाँ पर हमारे उम्मीदवार हो वहाँ अपने स्वजातीय उम्मीदवार को जिताने का प्रयत्न करें और जहाँ हमारे उम्मीदवार नही है वहाँ नोटा का प्रयोग करें ।
क्या सम्पूर्ण देश प्रेम का ठेका भूमिहार समाज ही ले रखा है? राष्ट्रहित से अन्य किसी जाति को कोई मतलब नही है क्या ?
आपसी सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है भूमिहार और ब्राह्मणों में नही तो दोनों का अस्तित्व मिट जाएगा।क्योंकि आज के तारीख में सवर्ण क्या अवर्ण क्या सभी लोग भूमिहार और ब्राह्मण को दुश्मन मानते हैं।
सोचे विचारे संगठित हो और अपना राय व्यक्त करें।
धन्यवाद



