Rajeev Kumar

” कौन सुनेगा,किसको सुनाएँ,इसीलिए चुप रहते हैं !
हमसे अपने रूठ न जाएँ इसीलिए चुप रहते हैं ! ”

भूमिहार समाज के युवा एवं बुद्धिजीवियों के मन को कचोटती उनकी अन्तर्व्यथा एवं उनके दिल से निकलती आवाज पर ब्रम्हर्षि चिंतक व विचारक ” राजीव कुमार ” के व्यक्तिगत शोध पर आधारित प्रस्तुति

1990 का दशक हिंदी फिल्मों के लिए म्यूजिकल बोनान्जा के दौर के रूप में याद किया जाएगा । ये वही दौर था जब हम लोग बाल्यावस्था से यौवनावस्था में प्रवेश कर रहे थे । मुझे इस बात का आजीवन गर्व रहेगा कि जिस दौर में हमने बाल्यावस्था से युवावस्था में प्रवेश किया उस दौर में हिंदी फिल्मों में शानदार गानों की धूम मची थी । एक से बढ़कर एक गाने और उन गानों को शानदार संगीत के धुनों से सजाने वाले एक से बढ़कर एक संगीतकार भी उसी दौर में पैदा हुए । उस स्वर्णिम दौर की सबसे खूबी यह रही कि जितने भी गीतकार थे जो फिल्मों के गीत लिखते थे उन सबों ने मनुष्य की जिंदगी और सामाजिक ताने बाने के इर्द गिर्द ही गानों की रचना की । हर गाने का मनुष्य की जिंदगी से गहरा रिश्ता होता था जिसकी वजह से वो गाने हर मनुष्य के दिल को छू जाती थी एवं उसको अंदर तक झकझोरती थी और इसी खूबसूरती की वजह से उन गानों को आज के इस भागमभाग वाले अत्याधुनिक दौर में melodious song के रूप में याद किया जाता है और खूब सुना जाता है ।

कारण भी है कि बात हम चाहे कितनी भी विकास और आधुनिकता की कर लें लेकिन हम यथार्थ को भूल नहीं सकते । भारत की सभ्यता और संस्कृति हमें सदैव यथार्थवादी बनाए रखने को प्रेरित करती है जो कि भारतीय संस्कृति की सबसे बहुमूल्य खूबी एवं धरोहर है । उसी दौर में उपर्लिखित गाना आया था जिसे जबरदस्त पसंद किया गया क्योंकि इस गाने के मार्फ़त भी गीतकार ने मनुष्य की वेदना को प्रकट किया था ।आज उस गाने की प्रासंगिकता पर चर्चा करते वक्त और इस लेख को लिखते वक्त मेरा मन भी भाव विभोर हो रहा है और मेरे मन के भीतर भी आंसुओं का मानो जैसे सैलाब सा उमड़ रहा है । मेरे मन में उमड़ रहे इस भाव को कोई साहित्यकार अथवा लेखक ही समझ सकता है ।

आज के समय में गानों में न तो वो भाव है , न वो तेज है , न कोई सन्देश है और न ही किसी प्रकार की खुशबु या जज्बातों की अभिव्यक्ति , कुलमिलाकर केवल और केवल खानापूर्ति के नाम पर गीत और संगीत को आज के अत्याधुनिक बाजार में बेरहमी से अश्लीलता पूर्वक पड़ोसा जा रहा है जिससे हमारा मन और मष्तिष्क बुरी तरह प्रभावित हो चुका है और हम अपने उचित निर्णय लेने की क्षमता को भी खो चुके हैं और फलस्वरूप हम लोकतंत्र में विधायिका के संचालन हेतु अपना बहुमूल्य वोट भी बाजारू एवं छलिया तथा अपराधी चरित्र के लोगों को दे देते हैं या क्षणिक/निजी स्वार्थ/लोभ वश बेच देते हैं ।

कहने को तो हम आज के अत्याधुनिक युग में हर बात को कुछ भी गैर तार्किक ढंग से एक थोंथि दलील देकर काट देते हैं लेकिन जीवन की सच्चाई से भाग नहीं सकते ।आज देश में राजनीति अपने न्यूनतम स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ समाज नेता वैसे व्यक्ति को चुनता है जो आपराधिक छवि का हो , जो व्यवसायी हो , जिसके पास पैसों का चकाचौंध हो , जो जात- पात , धर्म- सम्प्रदाय की गोल- गोल एवं फरेबी बातों को करता हो , जो समाज में अश्पृश्यता फैलाता हो , जो अराजकता फैलाता हो ।

वर्तमान में किसी भी नेता में ये जीवटता नहीं है कि वो सच्चे मन से अपने जनप्रतिनिधि होने के उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा एवं ईमानदारी से करे. देश में विधायिका को न्यायपालिका के ही समतुल्य संविधान प्रदत्त अधिकार दिए गए हैं जिसका सदुपयोग हमारे पहले के नेतागण किया करते थे ।कोई भी व्यक्ति नेताजी के पास किसी सरकारी कार्य से पहले जाते थे तो उनके मामले को merit के हिसाब से त्वरित निष्पादन किया जाता था खासकर रोजी रोजगार जैसे अहम् मुद्दों पर ।

परंतु 1990 के बाद जबसे जातिगत राजनीति की शुरुआत ( मंडल की राजनीति के तहत शुरू हुई ) तबसे राजनीति में स्वच्छ एवं न्यायप्रिय लोगों के लिए तो जैसे छलपूर्वक राजनीति में प्रवेश के द्वार बंद कर दिए गए ।जिसका नतीजा यह हुआ कि हर सुलझे हुए इंसान को अपने उचित कार्य के लिए दर दर की ठोकर खानी पड़ रही है ।
आज मुझे एक और गाना याद आ रहा है जिसके बोल कुछ यूँ थे कि ” राम चंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा हँस चुगेगा दाना और कौवा मोती खाएगा ” ।

कल एक भूमिपुत्री अर्चना सिंह ने भूमंत्र पर अपने पति के साथ हुए अन्याय की अंतर्व्यथा को समस्त भूमिहार समाज के समक्ष रखा जो कि न्यायोचित मामला है और यदि उस मामले में भूमिहार समाज के नेतागण गंभीरता पूर्वक संज्ञान लेते और अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का सदुपयोग करते तो उस मामले का निष्पादन हो गया होता । परंतु केवल दिखावा और खानापूर्ति के लिए सभी भूमिहार नेताओं ने ( जिनके पास उन्होंने न्याय के लिए दरवाजा खटखटाया ) एक महज पत्र लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली । मैं उन नेतागण से पूछना चाहता हूँ कि क्या यही न्याय है ? क्या यही परशुराम वंशजों का चरित्र है ? क्या इसी व्यव्हार के लिए हम दिनकर , बिनोबा भावे , राजनारायण , स्वामी सहजानंद जैसे विभूतियों के वंशज होने का दम्भ भरते हैं ?

भूमिपुत्री अर्चना सिंह के पति की अंतर्व्यथा केवल एकमात्र उदाहरण नहीं है । उन्हीं के समतुल्य एक अंतर्व्यथा से मैं भी जूझ रहा हूँ । मैंने भी अपने समाज के विभिन्न मंत्रियों सी पी ठाकुर , मनोज सिन्हा , अखिलेश सिंह इत्यादि से अपने एक न्यायोचित कार्य के लिए याचना की , परंतु मेरी भी न्यायोचित माँग को इन लोगों ने अनसुना कर दिया ।
अब सवाल यह उठता है कि हम जाएँ तो कहाँ जाएँ ।

जहाँ तक न्यायपालिका का सम्बन्ध है अथवा न्यायपालिका की बात है तो न्यायपालिका में पहले से ही अनेकों आपराधिक मामले सुनवाई हेतु लंबित हैं जिनका निष्पादन होना बाकि है और न्यायपालिका से न्याय लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि न्याय लेते लेते किसी व्यक्ति की जिंदगी ख़त्म हो जाती है ।

वैसे भी जब विधायिका को संविधान प्रदत्त अधिकार दिया गया है तो इस प्रकार के सरकारी मामलों में हमारे जनप्रतिनिधियों को गंभीर पहल करनी ही चाहिए और उन्हें हर व्यक्ति को उसके हक़ को दिलवाना चाहिए क्योंकि इसी कार्य के लिए ही तो हम अपना जनप्रतिनिधि चुनते भी हैं ताकि वो हमें हमारा हक़ दिलवा सकें ।

परंतु आपराधिक और दलाल प्रवृति के लोगों के राजनैतिक उदय ने विधायिका की मर्यादा को तार तार कर दिया ।
मैं बार बार कहता हूँ एवं सामाजिक अपील भी करता हूँ कि अच्छे लोगों से अच्छी पार्टी अथवा अच्छी विचारधारा का उदय होता है ना कि हमें किसी पार्टी के चक्कर में पड़कर गलत चरित्र के लोगों को अपना बहुमूल्य वोट दे देना चाहिए ।

वैसे भी दलगत राजनीति ने अपराधियों के लिए भी पैसों के सहारे राजनीति में प्रवेश के द्वार खोल रखे हैं ,इसलिए हमें वोट देते वक्त अपने नेताओं के चरित्र एवं उनकी छवि तथा सामाजिक पृष्ठभूमि को देखकर वोट देना चाहिए ना कि किसी पार्टी विशेष की भावना से प्रेरित होकर अपना बहुमुल्य वोट देना चाहिए । जो जितने बड़े लूटेरे हैं वो उतने बड़े धनकुबेर हैं और वो लोग आसानी से राजनीति में प्रवेश कर पूरे देश एवं समाज को लूट रहे हैं ।आज स्थिति इतनी दुसह्य हो चुकी है कि आखिर हम जाएँ तो जाएँ कहाँ , कौन सुनेगा किसको सुनायें , इसीलिए चुप रहते हैं ।

2 COMMENTS

  1. जब तक हम अपराध कर्मियों में आदर्श खोजेंगे तब तक भुमि हाथों का भला नहीं कर पाएंगे।

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