ram padarath babu great bhumihar

गया बाबू का जन्म और प्रारम्भिक शिक्षा

हजारीबाग शहर से 25 किलोमीटर की दूरी (दक्षिणी-पश्चिमी छोर) पर अवस्थित कर्णपुरा परगना(प्रखंड बड़कागांव, टन्डवा, केरेडारी) के गांव की गलियों में निर्भीक विचरण करने वाले गया बाबू का जन्म बुकरू ग्राम में 10 फरवरी सन 1945 को एक किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही पढ़ाई के प्रति विशेष अभिरुचि को देखते हुए इन्हें पिता का भरपूर सहयोग मिला। उन दिनों जब इक्का दुक्का लोग सातवीं या मैट्रिक पास कर फुले नहीं समाते थे वे हजारीबाग, रांची के बाद पटना बी0 एन0 कॉलेज तक का सफर तय किया। आगे चलकर इन्होंने एम0 ए0 बी0 एल0 की डिग्री ली। वैसे कर्णपुरा के भूगर्भ में छुपे अकूत कोयले की खानें यथा- अम्रपाली, मगध, पिपरवार, वृंदा कोल प्रोजेक्ट आदि के कारण ह0 बाग/चतरा जिले का यह इलाका झारखण्ड राज्य सहित सम्पूर्ण एशिया महादेश के पटल पर छाया हुआ है, पर कम लोगों को शायद यह जानकारी रही है कि आजादी के बाद एकीकृत बिहार सरकार में राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने में छोटानागपुर उपेक्षित रहा करता था तब कर्णपुरा की गोद के छोटे से गांव वृंदा (टन्डवा) से निकलकर श्री कृष्ण बल्लब सहाय राज्य के चौथे मुख्यमंत्री बन क्षेत्र को गौरवान्वित किया। उसी टंडवा केरेडारी बड़कागांव सिमरिया के गांव की गलियां दिन दोपहर गया बाबू की चहलकदमी से गुलजार हुआ करती थी। प्रखंड प्रमुख होने के कारण प्रमुख साहब के नाम से प्रसिद्ध रहे परम् आदरणीय गया प्रसाद सिंह आज नहीं हैं पर समाज के प्रति इनके समर्पण की चर्चा चहुओर सुनी जा सकती है। स्वभावतः ऊंच नीच,छुआ छूत, जाति सम्प्रदाय के भेदभाव से निर्लिप्त रहे गया बाबू सभी के दिलों पर समान रूप से राज करते थे। जीवन यात्रा के अंतिम तीन वर्षों तक मस्तिष्क रोग से पीड़ित हो इलाजरत रहे गया बाबू की निश्छल आत्मा 74 वर्ष की आयु पार कर 18 फरवरी 2018 को नश्वर शरीर का परित्याग किया। सादगी और भाईचारगी के संवाहक ऐसे समाज सेवक जिन्हें याद कर आज भी क्षेत्र के लोगों की आंखे नम हो जाया करती हैं।

संगी साथी, घर -परिवार और समाजसेवा व राजनीति

60 के दशक में बी.एन.कॉलेज पटना के विद्यार्थी रहे गया बाबू की शैक्षणिक योग्यता एम. ए. बी. एल. थी। बरमसिया (गिरिडीह) निवासी एवं राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री *नारायण राय, पूर्व डी. जी .पी. ज्योति कुमार, राजनेता यशवंत सिन्हा सहित प्रशासनिक और न्यायिक सेवाओं से जुड़े कई ऊँचाधिकारी व राजनेता अध्ययन के समय में इनके सहपाठी रहे हैं।अध्ययन काल में पडोस के वृंदा (टंडवा) निवासी व बिहार के चतुर्थ मुख्यमंत्री श्री कृष्ण बल्लभ सहाय पटना में इनके स्थानीय अभिभावक हुआ करते थे। कानून की पढ़ाई पुरी कर इन्होंने हजारीबाग स्थित मुख्य पथ पर निर्मित अपने घर में रहकर जिला कोर्ट में वकालत का काम करना प्रारम्भ किया। सुदूर क्षेत्रों में बैरिस्टर साहब के नाम से सम्बोधित होने वाले गया बाबू का मन वकालती पेशे में ज्यादा दिन तक नहीं लगा और राजनीति में अपने कैरियर की तलाश करनी शुरू कर दी। राजनीति में प्रवेश कर ऊंचाइयों को छुने की पिता की बलवती इच्छा को देखते हुए इन्होंने सर्व प्रथम अपने गांव के पंचायत धनगडा के मुखिया तब बने जब इनके पिता अशेश्वर सिंह बगल पंचायत मिश्रौल के मुखिया निर्विरोध चुने गए अर्थात पिता पुत्र दोनों का एक साथ अगल बगल पंचायत का मुखिया बनना तब के लिए अपने आप में एक अनोखी घटना रही थी।

ईश्वर की मर्जी और थी पिता का कैंसर बीमारी से ग्रसित होना, लंबी-चौड़ी गृहस्थी की देखरेख और पिता का इकलौता पुत्र होने की बाध्यता के कारण इन्हें वकालती पेशा बीच मे छोड़कर गांव लौटना पड़ा। आगे चलकर कांग्रेस की विचारधारा से प्रभावित होकर ये राजनीति में प्रवेश कर ता उम्र मुखिया रहे ही वर्ष 1980 में प्रखंड के प्रमुख बने। चतरा जिले का दोनो विधानसभा का sc के लिए सुरक्षित क्षेत्र होने से राजनीति में इनका निखार योग्यता के अनुकूल भले नहीं हो पाया हो, पर हजारीबाग प्रमंडल के सभी सीटों पर कांग्रेस में इनकी मर्जी के विरुद्ध प्रत्याशी का चयन नहीं किया जाता था। आगे चलकर ये कांग्रेस के हजारीबाग जिला महासचिव तथा चतरा जिला के अध्यक्ष भी बने।

एक वाक्या ऐसा भी हुआ जब इन्हें बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी बनाये जाने के पश्चात कम्युनिस्ट पार्टी के स्वजातीय उम्मीदवार रमेन्द्र कुमार के सम्मान तथा समाज के गणमान्य लोगों के अनुरोध पर अपनी उम्मीदवारी वापस लेनी पड़ी! जिस कारण दल में इनकी निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह तो खड़ा किया गया ही लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस के साथ साथ केंद्रीय नेतृत्व तक की उदासीनता का डंस झेलना पड़ता रहा।इनकी इस सरलता और सामाजिक उदारता ने इन्हें राजनीति में काफी क्षति पहुंचाई।

सामाजिक योगदान

हवन पूजन, शादी विवाह या श्राद्ध आदि कार्यक्रमों में वैदिक कर्मकाण्ड के मर्मज्ञ रहे गया बाबू का सामाजिक क्षेत्रों में भी काफी कुछ योगदान है।70 के दशक में सर्व प्रथम इन्हीं के नेतृत्व में चतरा स्थित सिमरिया के शिक्षक प्रशि0 महाविद्यालय के प्रांगण में तब के दक्षिण बिहार के भूमिहारों का सम्मेलन किया गया।उक्त सम्मेलन ने छोटानागपुर क्षेत्र में निवास करने वाले भूमिहार ब्राह्मणों को बिहार की राजनीति में नई ऊर्जा तो दी ही सामाजिक आर्थिक मजबूती सहित भौगोलिक रूप से देश के अन्य क्षेत्रों में एक पहचान दिलाई। उच्च विद्यालय मिश्रोल, वनांचल कॉलेज टंडवा की स्थापना तथा विद्युत और परिवहन का सुदृढ़ीकरण भी इन्ही के प्रयास का प्रतिफल है। कांग्रेसी सरकारों के कार्यकाल में समाज के प्रत्येक वर्ग के स्थानीय युवकों को रोजगार उपलब्ध कराने में इनकी भूमिका की आज भी चहुंओर प्रशंसा होती है। समाज का हर एक व्यक्ति के निमंत्रण पर सम्बंधित तक पहुंचना इनके आदत का प्रमुख हिस्सा हुआ करता था।

90 के दशक में जब समाज बिहार सरकार की उदासीनता और हिंसक वामपंथ विचार धारा के उदय के कारण अपनी जिंदगी और स्मिता की रक्षा के लिए मरने-मारने या पलायन के घुमावदार मोड़ पर अनिर्णय की स्थिति में खड़ा था,,, तब गाँव की गलियों में घूम-घूमकर इन्होंने संक्रमित हवा के तेज वेग की ओर पीठ कर अहिंसक भाव में खड़ा हो अनुकूल समय लौटने की प्रतीक्षा तक समाज का पीठ सहलाते रहे। इस कारण अनेक लोग का घर और परिवार उजड़ने से बच गया। एक दौर ऐसा भी आया जब इन्हें गाँव छोड़ना पड़ा, पर शीघ्र ही लोगों का भ्रम दूर हुआ और अहिंसा के इस पुजारी की ससम्मान गांव वापसी बाद आमजन के सुखदुःख में मिलने जुलने का सिलसिला जारी रहा।

सुबह चाय की चुस्की के साथ अंग्रेजी अखबार/ मैंगजिन से दिन की शुरुआत इनके दिनचर्या की प्रथम कड़ी थी। सबों के लिए सुलभ उपलब्ध रहने वाले गया बाबू आजीवन समाज और राष्ट्र को ऊंचा स्थान दिया। अपने से बड़े उम्र के लोगों को हजारों की भीड़ में चरण छूकर आशीर्वाद लेने में इन्हें तनिक संकोच नहीं होती थी। इनका कथन था समाज के लाठी (समाज के नजर से गिरना) के मार में आवाज नहीं है पर चोट असहनीय होती है।

कहा जाता है कि अपने उत्कर्ष काल में इनके द्वारा सामाजिक अदालत लगा कर एक दिन में 5 से 7 मसलों का सौहार्दपूर्ण हल पंचायत के माध्यम से किया जाता था, जिसे पक्ष विपक्ष सहर्ष स्वीकार करते थे। लोग कोर्ट से अधिक गया बाबू के इंसाफ पर विश्वास करते थे। ऊँचे आदर्श के बल पर समाज के सभी वर्गों में लोकप्रिय रहे गया बाबू के विरुद्ध कोई प्रतिकूल टिप्पणियां नहीं के बराबर है। जिंदगी में सादगी और ऊंचे विचार हो तो गया बाबू की तरह। इनकी मृत्यु समाज और क्षेत्र और राष्ट्र की अपूरणीय क्षति है। समाज के इस पुरोधा को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.

राम पदारथ सिंह के फ़ेसबुक पेज से प्राप्त..!!

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