कर्नल मुनींद्र नाथ राय की जाबांजी की कथा, 27 जनवरी 2015 को शहादत।।
कर्नल मुनींद्र नाथ राय ये नाम जाबांजी की एक ऐसी कहानी बन गया है युद्ध सेवा मेडल से शुरू होती है और शहादत पर खत्म होती है. 24 घंटे की इस कहानी भारतीय सेना की बेमिसाल ताकत है, एक पुलिस वाले का आतंकवादी बेटा है और एक नापाक धोखे और खून से रंगी हुई दास्तान है.
राष्ट्रीय राइफल्स के कर्नल मुनींद्रनाथ राय को उनके बेमिसाल नेतृत्व के लिए युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया जाता है. बटालियन ने उनकी अगुवाई में हिजबुल मुजाहिदीन के चार खुंखार आतंकवादियों का खात्मा किया, 9 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया और उनके दो ठिकानों को तबाह कर दिया. कर्नल मुनींद्रनाथ राय की अगुवाई में आतंकवाद से जूझ रहे त्राल में सेना का दबदबा कायम हो गया है और श्री अमरनाथ यात्रा का रास्ता अब पूरी तरह सुरक्षित हो गया है.26 जनवरी को भारत के राष्ट्रपति भवन ने कर्नल मुनींद्र नाथ राय की असाधारण वीरता की ये कहानी सुनाते हुए उन्हें युद्ध सेवा मेडल से सम्मानित किया था. और महज 24 घंटे बाद 27 जनवरी को कश्मीर के उसी त्राल इलाके में जिस शहीद का सम्मान किया जा रहा था उसके शहीद होने की खबर आई.
श्रीनगर से महज 36 किलोमीटर दूर त्राल इलाके में कर्नल मुनींद्र दो साल से तैनात थे. उन्हें खबर मिली की यहां के हंडूरा गांव के एक घर पर कुछ आतंकवादियों ने कब्जा कर लिया है. ये सुन कर राष्ट्रीय रायफल्स में तैनात कर्नल मुनींद्र ने 9 जवानों की टीम बनाई इसमें राष्ट्रीय रायफल्स और सीआरपीएफ के जवान थे. ये टीम त्राल पहुंची और हंडूरा गांव में आतंकियों ने जिस घर को ठिकाना बनाया था उसे घेर लिया.
जम्मू कश्मीर के पुलवामा में स्थित त्राल और आसपास के कई गांवों के युवा हिजबुल मुजाहिदीन के संपर्क में रहते हैं. जो दो आतंकवादी त्राल के हंडूरा गांव में छिपे थे वो भी हिजबुल मुजाहिदीन से नाता रखते थे और उनमें से एक का घर हंडूरा गांव में था. फिरदौस उर्फ आबिद खान के घर में उसके साथ पिछले ही साल हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हुआ सिराज खान मौजूद था . यहीं पर मुनींद्र 27 जनवरी को ऑपरेशन के लिए पहुंचे थे.
खुद को घिरा हुआ देखकर आतंकवादियों ने चाल चली. हंडूरा के इस घर में एक बुजुर्ग शख्स जो कि एक आतंकी का पिता था बाहर आया. उसने कर्नल मुनींद्र से कहा कि वो गोलियां ना चलाएं क्योंकि दोनों आतंकी खुद को सेना के हवाले करने को तैयार हैं. चंद पलों बाद आतंकी आबिद खान का एक भाई भी बाहर आ गया और उसने भी यही कहा.
आतंकवादियों ने चारों ओर से घिरे होने के कारण धोखे का सहारा लिया. आतंकी आबिद खान के पिता और भाई कर्नल मुनींद्र से बात ही कर रहे थे कि अंदर के दोनों आतंकी ताबड़तोड़ गोलियां बरसाते हुए बाहर आ गए. आत्मसमर्पण की बात झूठी थी.
मुनींद्र नाथ राय ने मौका नहीं गंवाया. दोनों तरफ से गोलियां बरसने लगीं और चंद पलों में आतंकी आबिद खान और सिराज खान मारे गए. मुनींद्र ने ये सावधानी भी बरती कि आसपास मौजूद आतंकी के पिता और भाई को गोली ना लगे लेकिन खुद उनका सीना आतंकियों की गोली से नहीं बच पाया.
आतंकियों के धोखे ने मुनींद्र नाथ राय की जान ले ली. आप शायद ये जानकर चौंक जाएं कि आत्मसमर्पण की खबर लेकर आए आतंकी आबिद के पिता हेड कांस्टेबल हैं और उन्होंने ही आतंकियों की धोखा देने में मदद की थी. मुनींद्र नाथ राय की शहादत के पीछे हेडकांस्टेबल पिता और आतंकी बेटे की साजिश थी.
42 राष्ट्रीय रायफल्स के मुनींद्र नाथ राय के साथ-साथ उनकी टीम में शामिल सीआरपीएफ के हे़ड कांस्टेबल संजीव सिंह भी शहीद हो गए. लेकिन अपनी जान देने से पहले उन्होंने दो आतंकियों का सफाया कर दिया. जाबांजी कहानी की एक और पहलू भी है. नागेंद्र प्रसाद राय जो कि मुनींद्र के पिता हैं और शहीद मुनींद्र की मां शिव दुलारी राय।
देश की सुरक्षा के लिए खून की होली खेलने वाले बेटे ने इन्हें महज 24 घंटे पहले मेडल जीतने की खुशखबरी दी होगी और 24 घंटे बाद मातम में डूबो देने वाली खबर आई है. कर्नल मुनींद्र उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले थे. उनके पिता गाजीपुर की चंदनगर कालोनी में रिटायर्ड जिंदगी जी रहे हैं. वो इससे पहले दार्जिलिंग में प्रिंसिपल थे.
कर्नल मुनींद्र का जन्म भी गाजीपुर के डेढ़गांवा गांव में हुआ था.शहीद मुनेद्र नाथ राय तीन भाइयो में सबसे छोटे थे. इनकी पढाई लिखाई हाई स्कूल से इंटर तक दार्जलिंग में हुई क्योंकि इनके पिता दार्जलिंग में ही हायर सेकेंडरी स्कूल में प्रिंसिपल थे. उसके बाद इंटर के बाद इलाहबाद में तैयारी करते हुए इनके बड़े भाई धीरेन्द्र नाथ राय सेना में चले गए. अपने बड़े भाई से प्रेरित होकर छोटे भाई भी सेना में सेवा करने के लिए भर्ती हो गया. जिसमे शहीद मुनींद्र नाथ राय के बड़े भाई धीरेन्द्र नाथ राय कोलकाता में कर्नल सीओ तो इनके दुसरे भाई यतेन्द्र नाथ राय सीआरपीएफ मिजोरम में डीआईजी के पद पर हैं.गाजीपुर में भी कर्नल मुनींद्र की शहादत की खबर ने सबको झकझोर कर रख दिया है.
कर्नल मुनींद्र ने सेना की नौकरी की शुरुआत गोरखा रायफल्स से की थी. लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था. दो साल पहले उन्हें 42 राष्ट्रीय रायफल्स में डेपुटेशन पर भेज दिया गया और मकसद था जम्मू कश्मीर में आतंक से जूझ रहे पुलवामा में आतंकियों का सफाया. मुनींद्र पुलवामा के ही त्राल गांव में शहीद हुए.मुनींद्र का आखिरी संदेश भी आया है. मुनींद्र ने सोशल मीडिया व्हाट्सएप पर 48 दिन पहले एक संदेश भेजा था.
‘जिंदगी में अपनी भूमिका इस जुनून के साथ जियो कि पर्दा भी गिर जाए तब भी तालियों की गड़गड़ाहट कम ना हो. ये मेरा कर्तव्य है कि मैं दुश्मन को मार दूं और मुझे इसका अफसोस नहीं होता. मुझे अफसोस तब होता है जब मैं सैनिकों, दोस्तों और निर्दोष लोगों को बचा नहीं पाता.’
कर्नल मुनींद्र का ये जज्बा त्राल में उनकी पोस्टिंग के दौरान भी महसूस किया गया था. उन्हें दुनिया के इस दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र के तिरंगे से कितना प्यार था ये खुद सेना के अधिकारी बताते हैं जिस बारूद ने मुनींद्र की जिंदगी खत्म कर दी वो उस बारूद को आखिरी हथियार नहीं मानते थे. वो त्राल ये युवाओं को नई जिंदगी का सपना भी दिखा रहे थे.
मुनींद्र की नजर में सिर्फ दुश्मन नहीं हुआ करते थे वो आम भारतीय भी थे जिनके लिए वो कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते थे,लेकिन सवाल ये है कि आखिर कब तक आतंक की भेंट चढ़ती रहेंगी हमारी जिंदगियां – हमारे जाबांजों की जिंदगियां। आतंक के खिलाफ मजबूत लड़ाई की मिसाल हैं मुनींद्र. जिसे पूरा देश सलाम करता है. (एबीपी न्यूज़ से साभार)