नरसंहार होते हैं, फिर उसपर राजनीति और उस राजनीति के गर्भ से एक नए नरसंहार की भूमिका तैयार होती है. लेकिन इन सबके बीच बच्चों का बचपन बिखर जाता है. उसके कोमल मन पर नरसंहार की क्रूरता की ऐसी छाप पड़ती है कि उसका बचपन छिन्न-भिन्न हो जाता है. सेनारी नरसंहार के समय ऐसा ही हुआ. पढ़िए रिम्मी शर्मा की ज़ुबानी सेनारी के खोये हुए बचपन की कहानी-


सेनारी नरसंहार को 17 साल बीत चुके हैं. मामले में 45 आरोपियों में से 16 को सजा भी सुना दी गई. इन 17 सालों में सभी का जीवन बदल चुका है. बहुत आगे बढ़ चुका है. एक पूरी नई पीढ़ी तैयार हो गई है. यहां तक की मेरे गांव सेनारी की तस्वीर भी बदल चुकी है. पहले जहां हमारे गांव में बिजली के सिर्फ खंभे दिखाई दिया करते थे. अब बिजली भी 18 घंटे रहने लगी है. पहले जहां हम उपहारा से सेनारी तक के 3 कोस का सफर पैदल या बैलगाड़ी से पूरा किया करते थे अब वहां पक्की सड़कें दिखाई देती हैं. कच्ची मिट्टी के मकानों की जगह पक्के सीमेंट के घर हैं, गलियों में खड़न्जा (ईंटे) बिछ गई हैं, पानी के लिए अब लोग चापाकल पर निर्भर नहीं हैं बल्कि अब मोटर लग गए हैं. एक लाइन में कहूं तो सुविधाएं आ गई हैं. पर ज़िंदगी नहीं है. वो रौनक नहीं है. वो प्यार और वो गांव की सोंधी खुशबू कहीं खो सी गयी है. गांव की महक में अब वो मिठास नहीं है. गांव जाओ तो वो खुशी, वो उत्साह नहीं दिखता जो पहले थी. क्योंकि गांव में अब लोग रह ही नहीं गए हैं. और जो हैं अब अपनी ज़िंदगी में मस्त हैं.

पहले गांव में घुसने से 2 किलोमीटर पहले ही सारे गांव के बच्चे आपको लेने और कन्या (मम्मी) का सामान उठाने आ जाते थे. अब घर में बैठकर भी कोई पूछने वाला नहीं रह गया. गांव में हमारा घर दक्षिण की तरफ है. मेरे परबाबा (दादा जी के पिताजी) ने हमारे घर के सामने की हमारी जमीन में छोटी जाति के कुछ लोगों को बसाया था. उन्होंने सोचा था कि ये घर के सामने रहेंगे तो खेत खलिहान के काम में दिक्कत नहीं आएगी. उस दौर में किसी को भी गांव में जाना होता था तो हमारे द्वार से होकर ही जाता था. गांव में आने वाला कोई भी मेहमान पहले हमारे दूरा पर बैठाया जाता, शर्बत-चाय से उनका स्वागत होता फिर वो अपने कुटुम्ब के घर जाते. दिनभर हमारे दूरा पर लोगों का रेला लगा रहता. रौनक इतनी, की लगता कोई त्योहार है. हमारे चापाकल का पानी सबसे मीठा आता था, और अधिकतर लोगों के घर में तब चापाकल होता भी नहीं था. इस कारण हमारा दूरा-दलान लोगों से भरा पड़ा होता था. ताश और शतरंज की बाजियां सजी होतीं थी. सुबह 8 बजे से रात के 8 बजे तक यही रेला लगा होता. हम बच्चों के लिए गर्मी छुट्टी का वो मजा ही कुछ और था.

हर साल स्कूल के गर्मियों की छुट्टी में हमारा दादी घर मतलब सेनारी जाना तय होता था. सर्दियों की छुट्टियों में नानी घर छतियाना जाते थे. गर्मी की छुट्टी का पूरा 50 दिन हमारे लिए पार्टी टाइम होता था. गांव की गलियों को छान मारते और दिनभर तितली की तरह उड़ते रहते. ये और बात है कि घर वापस आते ही चप्पलों और घूंसों से आरती उतारी जाती थी! मेरा कुनबा बहुत बड़ा है. मेरे दादाजी 5 भाई थे तो कुल मेरे 23 चाचा- बुआ हैं. इतने बड़े खानदान में बच्चों की कोई कमी तो होनी नहीं थी सो हमारे लिए खूब स्पेस था. पापा अपने भाईओं के साथ दूरा पर शतरंज की बाजियों में रमे रहते, मम्मी, फुआ सब खाना बनाने में बिजी रहती और मैं बहनों के पीछे-पीछे घूमती रहती. सुबह आंख खुलती और शोभा दी के गोद में. वो मुझे एक किनारे बिठाकर खुद अपनी उम्र की सहेलियों में बिजी हो जाती. पर मैं इसी में खुश रहती की उसके पास रहने से खाने-पीने को खूब मिलता और वो जहां जाती मुझे टांग कर ले जाती. जब शोभा दी के पास से बोर हो जाती तो मैं, मेरा छोटा भाई तन्नू, रोजी, कुंदन (नरसंहार में इसे भी अकाल मौत मिली), छोटू, मुरली, नन्हे सभी भाई-बहन खेतों की ओर चल पड़ते. वहां अपने आम के बगीचे में आम के पेड़ों पर का हमारा फेवरेट गेम होता था डोल-पत्ता, उसको खेलते. फिर अपने बोरिंग पर जाकर नहाते और तब दोपहर को वापस घर मार खाने आ जाते!

थोड़ी कुटाई होती फिर खाने के लिए मिलता और उसके बाद रामनाथ काका की कड़कती आवाज में आदेश आता की- सूतले रे लइकन! (सोए या नहीं बच्चों). उनका खौफ ऐसा की सोने का बहाना करते करते सो भी जाते. रामनाथ काका का खौफ ऐसा था कि बच्चे ही नहीं बच्चों की मम्मियां यानि उनकी भाभियां तक उनसे खौफ खातीं थी! रामनाथ काका ने मेरे दूरा पर नारियल का एक पेड़ लगाया था. जब हम छुट्टियों में घर जाते तो वो मुझे पकड़ कर उस नारियल पेड़ के पत्तों से झाड़ू बनवाते. मैं रुंआसी होती तो कहते- तोरा दालमोट खियएबऊ (तुम्हें मिक्सचर खिलाउंगा)! इस घूस के आगे मैं पूरी सुबह अपनी झाड़ू बनाने में बर्बाद करती. बदले में दालमोट मिलता जो मेरे लिए एक Priced possession होता था क्योंकि मैंने अपने ‘दुश्मन’ से खरीदवाया था!

नरसंहार ने कुछ किया या नहीं हमारे बाद के बच्चों से ये बचपन छीन लिया. बचपन की ये खट्टी-मिट्ठी यादें, काका-फुआ का प्यार दुलार, मार-कुटाई, भाई-बहनों की जुत्तमम्-पैजार सब खत्म हो गए. हम सब अपने-अपने घरों में सिमट कर रह गए. गांव जाना बंद हो गया. जो गांव में रहते वो पलायन कर गया, जहानाबाद या पटना की तरफ निकल गए. हम एक बड़ा खानदान से टूटा हुआ परिवार बन गए. अब हालात ये हैं कि हम अपने ही रिश्तदारों को भूलने लगे हैं. हमारे बाद की पीढ़ी के बच्चे अब हमें पहचानते तक नहीं, ना ही हम उन्हें पहचानते हैं. गर्मियों की छुट्टियां या तो नानी के यहां, या फिर रामगढ़ में ही बीतने लगी. कल एक और अभियुक्त को सेनारी नरसंहार के लिए फांसी की सजा तो सुना दी गई, पर क्या इससे हमारा वो खोया बचपन हमें वापस मिल जाएगा?

 ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र

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