विवादों का अखाड़ा बन चुके भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) मामले में सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला आया है जिसके तहत कोर्ट ने बीसीसीआई को चलाने वाली 4 सदसीय प्रशासनिक कमिटी का गठन कर दिया है.इस कमिटी का अध्यक्ष भूमिपुत्र और पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी विनोद राय को बनाया गया है.उनके अलावा इतिहासकार रामचंद्र गुहा, आईडीएफसी के अधिकारी विक्रम लिमये और पूर्व महिला क्रिकेट कप्तान डायना एडुजी को भी कमिटी में जगह दी गयी है. 
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा समिति की सिफारिशों को लागू नहीं करने पर अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई के अध्यक्ष पद और अजय शिर्के को सचिव पद से हटा दिया था.इस संबंध में अनुराग ठाकुर को अवमानना का नोटिस भी दिया गया था. 
विनोद राय वही शख्स हैं जिन्होंने यूपीए सरकार के दौरान कई घोटालों का पर्दाफाश किया था. वे कैग के चीफ रह चुके हैं. उन्होंने यूपीए- 2 की सरकार के दौरान कोयला घोटाले और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को उजागर किया था. 68 वर्षीय विनोद राय का जन्म उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में जन्म हुआ, उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर डिग्री हासिल की है. 
पढ़िए विनोद राय के बारें में विकिपीडिया पर क्या लिखा है – 
विनोद राय (जन्म: 23 मई 1948) भारत के ११वें नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक थे। इस पद पर वे 7 जनवरी 2008 से २२ मई २०१३ तक थे। यूपीए सरकार द्वारा किये गये लाखों करोड़ रुपये के टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला एवं कोयला घोटाला की सनसनीखेज रिपोर्टों के कारण वे चर्चा में आये थे। सम्प्रति वे संयुक्त राष्ट्र के बाहरी लेखापरीक्षकों के अध्यक्ष हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से अर्थशास्त्र में एम०ए० हैं इसके अतिरिक्त उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लोक प्रशासन में स्नातकोत्तर की उपाधि भी प्राप्त कर रखी है। १९७२ बैच के आई०ए०एस० अधिकारी रहे विनोद राय इससे पूर्व कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। जब प्रधानमन्त्री कार्यालय के राज्य मन्त्री वी० नारायणसामी ने सार्वजनिक रूप से मीडिया के सामने यह बयान दिया कि “सीएजी को सरकारी स्कीमों में हो रहे स्कैमों पर अपनी टिप्पणी देने का कोई अधिकार ही नहीं है, इससे भारत के नियन्त्रक एवं महालेखाकार की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगता है।”[1] तो विनोद राय को स्वयं अपने बचाव में कहना पड़ा कि सीएजी का यह मूलभूत और नैतिक दायित्व है कि वह सरकार के कामकाज में दखल न देते हुए भी आर्थिक मामलों में पायी गयी अनियमितताएँ उसे बताये ताकि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की रक्षा की जा सके और सरकार पर नियन्त्रण बना रहे। यदि ऐसा नहीं किया गया तो यह देश की जनता के साथ विश्वासघात होगा।[2].

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