भूमिहार ब्राह्मण शब्द का उच्चारण के साथ बिहार की भूमि और भूमि पुत्रों का स्मरण होना स्वभाविक है। कहने को यू0पी0, एम0पी0 झारखण्ड, बंगाल, महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न राज्यों में भूमिहार कमोबेश निवास करते हैं पर देश स्तर पर नेतृत्व बिहार का ही कुबूल है। कभी देश व राज्य की सत्ता के शिखर को चूमती बिहार के भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीतिक गर्माहट से गौरवान्वित होने वाला यह समाज, आज आपसी द्वेष और नेतृत्व की धुंधली आभा के कारण संसद से कोसों दूर पंचायत की संकरी गलियों में भी उचित नेतृत्व देने से वंचित रह जा रहा है।
कांग्रेस काल और 90 के दशक से पूर्व बिहार की राजनीति में भूमिहार और ब्रह्मण राजनीति के धुरी हुआ करते थे! पर लालू यादव की जातिगत राजनीति की क्षद्म धारा से अनजान रही इन दो जातियों के स्वाभिमान की आपसी टकराहट और हर कोई में नेतृत्व पाने की बलवती इच्छा के कारण भूमिहारों में राजनीति प्रतिनिधित्व देने की ऊर्जा में क्षरण होता चला गया। 1990 से 2004 तक का दौर घोर राजनीतिक गिरावट के साथ-साथ सत्ता समर्थित उग्र वामपंथ विचारधारा के हिंसक उत्पीड़न में जातिय बहाव से डूबने और उबरने में धन जन की बड़ी कीमत चुकाई गई।
15 वर्षों की कड़ी मशक्कत बाद 2005 में सर्व प्रथम लोक जनशक्ति पार्टी के बैनर तले लड़ा गया विधान सभा चुनाव में 29 में से 19 एम0 एल0 ए0 के साथ “हम जीवित हैं” के रूप में राजनीति की शानदार पारी खेलकर राज्य से लेकर केंद्र तक को सकते में खड़ा कर डाला। एक दो चुनाव तक विधान सभा और संसद की सीटें भी अनुपातिक प्रतिनिधित्व देता चला गया। देश के अन्य राज्यों में बिहार की धमक के कारण भूमिहारों को उचित भागीदारी मिलती रही। लगा बिहार राजनीतिक ऊंचाइयों के अपने स्वर्णिम काल मे लौटने लगा है, पर ऐसा ज्यादा दिन तक नहीं चल सका। भाजपा+जदयू की युगल जोड़ी के प्रदेश के वर्तमान कप्तानों ने भूमिहारों का पर कतरना शुरू किया। पिछलग्गू और सत्तालोलुप्त नेता टिकट से चुनाव प्रचार तक एक दूसरे को मात देने में भागीदार बनने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
2016 के बिहार विधान सभा में भाजपा+ और महागठबंधन में मिली कुल सीटों में भूमिहार का प्रतिनिधित्व की जैसे तैसे खाना पूर्ति तो कर ली गई,,पर 2019 के लोकसभा चुनाव में पैतृक दल द्वारा टिकट वितरण की असमानता के कारण लोकसभा का प्रतिनिधित्व असंतोषजनक रहा। जहानाबाद, गाजीपुर, कोडरमा,मुजफ्फरपुर सहित कई संसदीय क्षेत्र छीन गई।
आज देश की बदलती राजनीतिक और सामाजिक परिस्थिति ज्यादा धमा चौकड़ी मचाने की भी नहीं रह गई है। राष्ट्रविरोधी शक्तियां व्यवस्था पर हावी हैं।भूमिहार राष्ट्रवादिता से समझौता कर नहीं सकता।ऐसी परिस्थिति में उचित प्रतिनिधित्व की पूर्ति के खातिर राष्ट्रहित के मुद्दों की बलि दी नहीं जा सकती।देश के अलग अलग राज्य बिहार की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।वोटों के सौदागर सत्ता हासिल करने के लिए लोकलुभावन नारे दे रहे हैं। निर्णय की घड़ी निकट है,अतः गुजरे समय की वेदना और पैतृक दल की उदासीनता के साथ साथ आये दिन की घटित घटनाओं के बीच किंकर्तव्य सी स्थिति में झूलता इस समाज की एकजुटता अनिवार्य है




