मोदी ने मनोज सिन्हा को मंत्री नहीं बनाया, शायद गाजीपुर से उनकी हार का असर था कि दूसरी बार वो मंत्री पद की शपथ नहीं ले पाये। गाजीपुर की पहचान पहली बार भारतीय संसद में इस रूप में हुई थी कि वहां लोग गोबर में से अनाज निकालकर धोकर खाते हैं, उस गाजीपुर को मनोज सिन्हा ने बहुत कुछ दिया। वो रेलवे राज्य मंत्री थे और गाजीपुर को उन्होंने रेलवे के नक्शे पर महत्वपूर्ण बना दिया। सिर्फ लाइनों का दोहरीकरण, विद्युतीकरण ही नहीं करवाया बल्कि लोको शेड और डेमू मेन्टनेन्स कारखाना भी गाजीपुर लेकर गये।
मैं गाजीपुर तो नहीं गया कभी लेकिन जितना कुछ मैंने देखा सुना है उससे मुताबिक मनोज सिन्हा ने इतना काम कर दिया है कि अब कम से कम वहां गोबर में से अनाज निकालकर खाने वाली कहानी कभी संसद में नहीं कही जाएगी। लेकिन किसी समाज के दिमाग में ही जातिवाद का गोबर भर गया हो तो उसे कौन बाहर निकालेगा?
इसी गोबर का असर था कि जाति के गणित में मनोज सिन्हा गाजीपुर हार गये। उन्होंने विकास से अपने समर्थक तैयार किये लेकिन इतने नहीं कर पाये कि वो संसद पहुंच पाते। लेकिन मनोज सिन्हा की हार सिर्फ मनोज सिन्हा की हार नहीं है। पूर्वांचल में रेलवे के विकास की संभावनाओं की भी हार है। कम से कम रेलवे में अब इतना क्रांतिकारी पहल करनेवाला कोई नहीं है जितना मनोज सिन्हा पूर्वांचल के लिए कर गये। उनके द्वारा शुरु करवायी गयी परियोजनाएं अधूरी हैं। पता नहीं कब पूरी होंगी। पूरी होंगी भी या अधूरी ही रह जाएंगी। (वरिष्ठ पत्रकार संजय तिवारी के एफबी वॉल से साभार)
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