Manoj Sinha Ghazipur

– समीर कुमार राय

सुबह से ही नज़रें ग़ाज़ीपुर लोकसभा सीट पर टिकी हुई थी। बार-बार वाट्सएप के ग्रुप्स चेक करता था, चुनाव आयोग की वेबसाईट टटोलता था, लोगों को फ़ोन और मैसेज करके ग़ाज़ीपुर की हालात से दिन भर लगातार जुड़ा रहा यहाँ तक कि इस बीच अपनी बलिया सीट भी याद नहीं आयी लेकिन मनोज सिन्हा पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गये। इस बीच एक-दो बार वो आगे बढ़े लेकिन रफ़्तार नहीं पकड़ सके फिर भी दिल को यक़ीन नहीं होता था कि यार ऐसा कैसे हो सकता है। दिन भर ख़ुद को ढांढ़स देता रहा कि आख़िर में जाकर जीतना तो मनोज सिन्हा को ही है लेकिन वो उम्मीद अब टूटती दिख रही है हाँलाकि वोटों की गिनती ज़ारी है पर अब कोई मोजज़ा ही सिन्हा जी को जिता सकता है।

मुझे हैरत होती है कि मनोज सिन्हा जैसा इंसान भला चुनाव कैसे हार सकता है। उन्होंने ग़ाज़ीपुर के लिए जितना किया है उतना प्रदेश के किसी भी सांसद ने अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए नहीं किया होगा। प्रदेश के बाक़ी जगहों पर लोगों ने जातिवादी लोगों को उनका असली रास्ता दिखा दिया पर ग़ाज़ीपुर ने आज अपने मुँह पर ख़ुद कालिख पोत ली है। आज का दिन ज़िले के लिए काला दिन है यहाँ के लोग अपनी इस ग़लती पर बरसों तक रोएंगे और आने वाली नस्लें उन्हें इस ग़लती के लिए हरगिज़ माफ़ नहीं करेंगी। ग़ाज़ीपुर के लोगों से ये उम्मीद तो कतई नहीं थी इतने बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों को पैदा करने वाले ग़ाज़ीपुर ने कैसे लोगों को पैदा कर दिया है अब तो ख़ुद को यहाँ का वासी कहने में भी झिझक महसूस होगी। यहाँ के लोगों ने विकास को ठुकराकर जाति को चुना है छी-छी कितने शर्म की बात है। जाति के नाम पर वोट देने वाले यहाँ के मतदाता जातिवाद की गंदगी में ही सड़ते-सड़ते एक रोज़ मर जाएंगे। जो लोग जाति के नाम पर वोट नहीं देते वो शिक्षित हैं और वो इस ज़िले से एक दिन पलायन कर जायेंगे क्योंकि आने वाले वक़्त में यहाँ रहने लायक रह ही नहीं जाएगा न यहाँ रोज़गार के साधन रहेंगे और न ही सुकून भरा माहौल मिलेगा जिसमें शरीफ़ इंसान अपनी ज़िन्दगी बसर कर सके।

         समीर कुमार

ग़ाज़ीपुर से मनोज सिन्हा के हारने का मतलब है कि इस ज़िले सहित पूरे पूर्वांचल के विकास के दरवाज़े पर ताला लग गया। अब सैकड़ों साल तक यहाँ एक धेले का भी काम नहीं हो सकता क्योंकि नेताओं की आने वाली नस्लें आज ये पाठ याद कर लेंगी कि ग़ाज़ीपुर के गँवार जातिवादी लोग विकास नहीं सिर्फ़ जाति को देखकर वोट देते हैं। विकास पुरूष आप इसलिए हार गए क्योंकि आप सवर्ण बिरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं और उसमें भी भूमिहार ब्राह्मण जाति से आते हैं। जातिवादियों की इस भीड़ में आप अल्पसंख्यक हैं लेकिन अफ़सोस कि आप चाहकर भी अपने नाम के साथ जुड़े इस भूमिहार शब्द को नहीं हटा सकते क्योंकि जाति तो जन्म से ही मिल जाती है उसे कमाया नहीं जाता और ताउम्र उसे छोड़ा भी नहीं जा सकता। इसी भूमिहार ने आपको प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया और आज इसी ने आपको ग़ाज़ीपुर का सांसद नहीं बनने दिया जबकि हक़ीक़त ये है कि आपने सिर्फ़ भूमिहार के लिए आज तक एक पैसा का भी काम नहीं किया आपकी नज़रों में समाज का हर वर्ग बराबर है लेकिन इन गँवारों की भीड़ में आपकी ये ईमानदारी भी किस काम आयी।

मनोज सिन्हा ने आज कुछ नहीं खोया है काफ़ी हद तक मुमकिन है कि वो राज्यसभा के रास्ते होकर एक बार फिर मंत्रीमंडल तक पहुँचेंगे लेकिन ग़ाज़ीपुर और पूर्वांचल ने तो आज अपना भविष्य ही खो दिया। जाति के नाम पर वोट देने वाले ग़ाज़ीपुर के जातिवादियों तुम्हें तुम्हारी अंतरात्मा ख़ुद कभी माफ़ नहीं करेगी तुमने क्या खोया है इसका अंदाजा तुम्हें अभी तो नहीं है लेकिन इसका अंजाम नर्क के समान ही होगा। मनोज सिन्हा जैसे नेता को हराने के लिए ग़ाज़ीपुर के लोगों को जितना भी धिक्कारा जाय कम होगा इतिहास ऐसे लोगों को कभी माफ़ नहीं कर सकता।

 

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