न्याय की कसौटी पर देर से आया फैसला भी अन्याय सा ही प्रतीत होता है.सेनारी मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. 17साल बाद फैसला आया और वो भी आधा-अधूरा.ज्यादातर आरोपी बरी हो गए.सिर्फ 15 को माननीय न्यायालय ने दोषी पाया.उसमें भी दो आरोपी फरार हैं जिनका पता पुलिस आजतक नहीं लगा पायी.
बहरहाल इस आधे अधूरे फैसले में कोर्ट ने सेनारी में मारे गए सभी मृतक के परिजनों को पांच-पांच लाख रुपये देने का निर्देश सरकार को दिया.कोर्ट ने कहा कि जिला विधिक सेवा प्राधिकार के खाते में सरकार राशि जमा करे.प्राधिकार मृतक के परिजनों को यह राशि मुहैया कराएगा. घायलों को भी एक-एक लाख मुआवजा देने का आदेश दिया गया.
लेकिन सवाल उठता है कि 17साल बाद न्याय का मरहम तो ठीक से नहीं लग सका, कम -से – कम वित्तीय सहायता के नाम पर बर्बाद हुए परिवारों को यथोचित रकम का तो बंदोबस्त होता. सिर्फ पांच की राशि भीख नहीं लगती?
पांच लाख की इतनी कम राशि लेकर पीड़ित किसान परिवार अपनी बर्बाद जिंदगी को कैसे खुशहाल बना पायेंगे जज साहब? 17 साल बाद कम-से-कम 17 लाख भी तो देते. हर साल का कम -से – कम एक लाख! सरकार वे किसी सड़क दुर्घटना में नहीं मारे गए थे.प्रशासन की सरपरस्ती में उन्हें घेर कर बेरहमी से मारा गया था माईलोर्ड. न्याय के लिए भी क्या अब भीख मांगनी होगी???

 

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