बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ.श्रीकृष्ण सिंह थे जो सवर्ण जाति (भूमिहार) से थे. उनका प्रभाव और कद ऐसा था कि उनके जीवनकाल में उन्हें कोई राजनैतिक चुनौती तक पेश नहीं कर पाया.लेकिन आज के हालात में ये सोंच भी कल्पना से बाहर है कि कोई सवर्ण और उसमें भी भूमिहार ब्राहमण चीफ मिनिस्टर बन सकता है.हालिया लोकसभा और विधानसभा चुनाव में तो भूमिहार बिलकुल हाशिए पर चले गए.लालू प्रसाद यादव की पार्टी ने तो विधानसभा चुनाव में एक भी भूमिहार को सीट नहीं दिया तो दूसरी भूमिहारों का सबसे ज्यादा समर्थन पाने वाली भाजपा ने भी भूमिहार प्रत्याशियों को लेकर उतनी उदारता दिखाई.मिला-जुलाकर राजनीति में भूमिहारों की स्थिति दयनीय है और इसके लिए वे खुद जिम्मेवार है.एक तो आपसी कलह और ऊपर से नेता के नाम पर ऐसा कोई नहीं है जिसकी स्वीकार्यता पूरे समाज में हैं.गिरिराज मतलबी हैं तो अनंत बाहुबली हैं,अरुण सिंह और अखिलेश सिंह दलबदलू हैं तो सीपी सिंह रिटायरमेंट की तरफ अग्रसर हैं. ऐसे में बड़ी संकटप्रद स्थिति है. इसी मुद्दे पर भू-समाज के वरिष्ठ सदस्य महादेव सिंह सोशल मीडिया पर लिखते हैं –
महादेव सिंह: दोस्तों हमारे समाज का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। आज हम दोराहे पर बिखराव की स्थिति में है। वोट की राजनीति ने हमें हाशिये पर धकेल दिया है क्योकि हमारी जनसंख्या बहुत मामूली है। हममे एकता की कमी है। हम प्रायः आपस में लड़ते रहते हैं। जहा हमारी स्थिति बेहतर है वह भी हम आपस में लड़कर हासिये पर चले जाते हैं। हम अपनों को सलाम नहीं करेगे पर दूसरी जातिवालों को जरूर करेगे चाहे वे हमसे बहुत निचली कटेगरी के हो। आज आपलोगो से निवेदन है की इस बारे में सोचे और एक स्वयं निर्णय ले की जहा भी बिरादरी का कोई कैंडिडेट हो हम उसे ही वरीयता दे। जहा अपने बिरादरी का वर्चस्व हो वह एक ही  कैंडिडेट खड़ा करे। 
महादेव सिंह के इसी स्टेटस पर बहस को नया आयाम देते हुए संजय शर्मा लिखते हैं –

संजय शर्मा:जब हमारा वोट चुप था या एकमुश्त था हम मजबूत थे ! तब हम जातिगत थे पार्टीगत नहीं ! अब पार्टीगत हो गए तो जाति छुटती गई ! बिहार से लेकर पूर्बी यूपी तक की दशा दुर्दशा एक सी है ! इन सभी क्षेत्रों में जातिगत लगाव का क्षरण हुआ है ! मतलब थोड़ा बहुत संस्कार डोला है ! एक उदाहरण : विवेक के भूमिहार ग्रुप पर बड़ी संख्या में भूमिहारों ने बनारस वाले अजय राय जी जो जमकर गालियां इसलिए दे रहे थे क्योंकि वे मोदी के सामने कांग्रेसी उम्मीदवार के रूप में खड़े थे ! केजरीवाल बनिया तेली होकर ये एलान कर सकता है कि मैं खदेड़कर लडूँगा [मतलब मोदी जहाँ से खड़े होंगे मैं उनसे लडूँगा ] तो भूमिहार अजय राय क्यों नहीं लड़ सकता ? आपत्ति क्यों है भाई ? पार्टी क्यों हावी है ,जाति क्यों नहीं ? अखिलेश प्रसाद सिंह राजद के टिकट पर मोतिहारी से जिताए गए एक एक भूमिहार वोट राजद को नहीं अखिलेश को गया ! राजद से भूमिहार का 36 का आकड़ा होते हुए भी ! अब जब राजद जिस भूमिहार को टिकट देगा उसकी पहले माँ बहन की जाती है अपनी जाति के द्वारा ! और आश्चर्य व्यक्त किया जाता है अरे इस बार लालू ने एक भी टिकट नहीं दिया ! मेरी राय में प्रयास ये हो कि अपने उम्मीदवार अगर जाति के वोट से बढ़त बनाने की स्थिति में हों तो पार्टीगत सिद्धान्त को ताख पर रखा जाय !

ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र

2 COMMENTS

  1. आपका लेख पढ़ा
    राजनीति और नेता से समाज का भला कभी नहीं हुआ . लालू ने यादव जाति की स्थिति नहीं बदल सके , मुलायम से भी नहीं हुआ
    अजित सिंह भी जाट का भला नहीं कर पाए
    ओबेसी भी मुस्लिम का कल्याण नहीं किया
    एक भी नेता बता दे साहिब जो जाति का कल्याण कर दिया हो … कोई नहीं .
    जबतक देश और राज्य सही दिशा नहीं चलेगा तबतक किसी जाति का कल्याण सम्भव नहीं .
    मुझे किसी नेता आशा नहीं पर उससे ज़रूर प्रभावित होता हूँ जो देश के लिए सोचता है . जाती समाज का एकल विकास तबतक सम्भव नहीं जबतक देश का विकास नहीं होगा .
    जातिगत नेता अपना और अपने चहेते का काम करते हैं

  2. Bhumihaar ko ab to kam se kam apni ek rastriye party banana he chahiye thaa. Agar aisa nhi hua to kya main ye samjhun ki ab koi astitb nhi raha humara es desh me .

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