एक ज़माना पहले भूमिहार समाज और बिहार की राजनीति एक-दूसरे के पर्याय थे. लेकिन फिर एक आंधी आयी और उसमें सबकुछ उड़ता चला गया.जब गुबार छंटा तो भूमिहार ब्राह्मण राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे. जानिये ‘शैलेन्द्र’ की जुबानी पूरी कहानी (परशुराम)
1977 तक बिहार की राजनीति में भूमिहारों का वर्चस्व –
भूमिहार समाज आज राजनीति में हाशिये पर है.लेकिन एक वक़्त था जब भूमिहार ब्राह्मणों की राजनीति में तूती बोलती थी.भारत की आज़ादी के बाद बिहार जैसे प्रदेश में तो पूरी राजनीति ही भूमिहारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही . यही वजह रही कि बिहार की राजनीति में 1977 तक श्रीकृष्ण बाबू के रूप में सिर्फ एक मुख्यमंत्री बनने के बावजूद भूमिहार विधायकों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा रही.
भूमिहारों ने की ऐतिहासिक भूल –
लेकिन 1977 के बाद से स्थितियां बदलने लगी. बिहार की राजनीति बदलने लगी. भूमिहारों के खिलाफ कई दूसरी जातियां लामबंद होने लगी.फिर भी भूमिहार विधायकों की संख्या में कोई ख़ास कमी नहीं आयी. लेकिन इसी दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पूरी सियासत का रूख पलट दिया. भू-समाज ने एक ऐतिहासिक गलती की. 1992 में कांग्रेस को हराकर केंद्र में भाजपा और जनता दल की विश्वनाथ सिंह की सरकार बनी और उधर बिहार और यूपी में भी जनता दल सत्ता पर काबिज होने में सफल रही. इसमें भू-समाज ने भी अपना पूरा योगदान दिया और यही से पराभव की शुरुआत हुई. नयी सरकार ने यूपी और बिहार दोनों राज्यों में सवर्णों से सत्ता छीनकर यादवों के हाथ में थमा दी.
यादवों के निशाने पर भूमिहार –
फिर नया सिलसिला शुरू हुआ. सवर्णों के खिलाफ दूसरी जातियों को भड़काऊ भाषणों और दुष्प्रचार के जरिये लामबंद किया गया. दूसरी तरफ सवर्णों को अलग-थलग करने की राजनीति भी चलती रही. सवर्णों में भी सबसे ज्यादा टार्गेट भूमिहारों को किया गया क्योंकि सबसे ज्यादा खतरा इन्हीं से था. इसलिए मनोबल तोड़ने के लिए सुनियोजित तरीके से हमला करवाने का सिलसिला शुरू हुआ.
तख्ता पलट और भूमिहारों की राजनीति में वापसी-
लेकिन उसके बावजूद वे भूमिहारों का मनोबल तोड़ नहीं पाए. नेतृत्वविहीन होकर भी भू-समाज ने घुटने टेकने की बजाये संघर्ष का रास्ता चुना और उसी के परिणामस्वरूप 15 साल बाद लालू यादव सत्ता से बाहर हुए और नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार में गैर यादव सरकार बनी. राजनीति में भूमिहार फिर पटरी पर आने लगे.
पटरी से फिर उतरी भूमिहारों की गाड़ी –
लेकिन 2014 में फिर एक मोड़ आया जब मोदी लहर से आक्रांत नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक सिद्धांतों की बली चढ़ा लालू यादव से जा मिले. भाजपा और जदयू का गठबंधन टूट गया. नीतीश और लालू के राजनीतिक गठजोड़ के होते ही फिर से निशाने पर भूमिहार आ गए और समाज एक बार फिर राजनीतिक रसातल में जाने लगा. मीडिया की मदद से ‘ऑपरेशन भूमिहार’ जैसे पेड कार्यक्रम चले. लालू यादव की पार्टी ने एक भी भूमिहार को टिकट नहीं दिया. नीतिश – लालू गठबंधन की जीत. भाजपा हारा.
बेचारगी में भाजपा का समर्थन, लेकिन मिला क्या?
वर्तमान में भू-समाज के पास विकल्प सीमित है. फिलहाल भाजपा ही एकमात्र विकल्प बची है. यही वजह है कि भू-समाज बिना किसी शर्त के अपना वोट भाजपा को समर्पित करता आया है. भाजपा भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है और उसका नज़रंदाज़ करके उसका फायदा भी उठा रही है. यही कारण है कि मोदी सरकार बनने के बाद बिहार से एक भी भूमिहार को मंत्री नही बनाया गया,लेकिन जब विरोध के सुर उठने लगे तो गिरिराज सिंह को एक छोटे से मंत्रालय का राज्य मंत्री बनाकर भू-समाज को शांत कर दिया गया. बिहार प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी भी एक भूमिहार से छीनकर अहीर जाति के खाते में डाल दी गयी. भाजपा का संदेश साफ़ है कि उनके एजेंडे में अब भूमिहार नहीं.



Taiyar hy par unity kaha hy
sabse pehle bhumihar samaj ko jagrukh karna jaruri hai
Youths ko ikathe hona hoga kyu na social media pe se suru karke ek Naya aandolan khada kare kyuki agar abhi nahi to kabhi nahi
Sure it will effect to others ..
Yes bhumihar jo AK ho jaye to pure Bharat pe Raj kar sakata hai ,sirf akata ki kami hai . Bhumihar Ko apni party bana kar kuch mukha Shidhanto pe kam me lag Jana Cahiye .Ham v Rajniti to interest rakhate hai.
bhumihar population is under 5 percent population of bihar and all other caste of bihar hates bhumihar especially in bihar due to jealousy,forward caste also hates,there is no option to making self party but earily wo ruled in the politics of bihar since 1989 at the time when congress is strong in bihar and eastern up also we ruled, we ruled only on the basis of congress govt strong in bihar and up,wait and support congress and when congress gets strong then we will ruled in politics again
bhumihar ya kahe to swarn k liye kon si party behtar hai iska pata iss baat se bhi chalta hai ki kon party aapko election ka ticket deta hai ya apke party ka pradesh adhaksha kon hai bjp ka nityanand rai yadav aur congress ka brahmin madan mohan jha congress abhi bihar me kamjor hai isliye rjd se sath jauari hai aur jab congress apne traditional vote bank banakar bihar me majboot ho jayagi tub wo akele laregi isliye support congress.itihas gawah hai ki swarn congress k dum pe raj kiya hai.
Kyon na hum bjp ko v conditional support hi de
भूमिहार समाज में सभी को अपने आप में हम हम का दवा है उसके समाज में एकत्रित करता है सभा को तो सब सुनता है लेकिन हमारे समाज में सब अपने आप में जलन है जिसके वजह से ये असंभव है।
I m ready, any tym, any place..jai parashuram…
राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी की गठन
Bilkul sahi baat
Your thinking and socialism script is so nice and I am agree with you nice sir
Jai parsuram jai bhumihar
Bhumihar ko bhi ab apni party banani chahiye tabhi bhumihar ko samman milega or unka apna haque
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