मीडिया का नक्सलवाद किसी से छुपा नहीं है. वह एक खास एजेंडे से काम करता है जिसका काम देशहित के कामों में अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर रायता फैलाना है. नोटबंदी मसले पर भी ऐसा ही हुआ जब मोदी सरकार ने 500 और 1000 के नोट पर अचानक से पाबंदी लगा दी तो कालेधन वालों का मुंह वाकई में काला हो गया. कालेधन से चलने वाले और नक्सलियों और देशद्रोहियों का पक्षधर मीडिया भी इसका विरोधी हो गया और नोटबंदी के खिलाफ ख़बरें शुरू हो गयी. नीचता की हद तो तब हो गयी जब नक्सली मीडिया देश में हो रहे तमाम आत्महत्याओं को नोटबंदी से जोड़ कर दिखाने लगा. ये कितना हास्यापद लगता है कि लाइन में खड़े होने की वजह से किसी ने आत्महत्या कर ली. यदि ऐसा कोई करता है तो कोई शक नहीं कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं. एकाध वाकये सही हो भी सकते हैं. लेकिन हर आत्महत्या को एनडीटीवी और उस जैसे कई नक्सली मानसिकता वाले चैनलों द्वारा नोटबंदी से जोड़ देना घटियापन की परकाष्ठा है. 
हाल ही में जब एक चोर ने पकड़े जाने के भय से बैंक में आत्महत्या कर ली तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तत्काल ट्वीट करके इसे नोटबंदी से जोड़ दिया और सरकार पर हल्लाबोल कर दिया. नक्सली मीडिया भी उनके साथ हो लिया. लेकिन जब सच्चाई सामने आयी तो सबकी घिग्घी बंध गयी. दरअसल मीडिया के एक धड़े का ये नक्सल माइंडसेट है जिसकी वजह से वे नोटबंदी के खिलाफ हैं और उसे गलत साबित करने के लिए प्रोपगेंडा करते रहते हैं.कोई नक्सली मीडिया से पूछे कि अमुक आत्महत्या नोटबंदी की वजह से हुई है इसको वो कैसे प्रमाणित करेगा? कोई सबूत रहता ही या महज लफ्फाजी?

ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र