प्रमोद तिवारी: भोजपुरी – हिंदी के महत्वपूर्ण रचनाकार और अनेक विधाओं को सहजता से साधने वाले डॉ. विवेकी राय नहीं रहे। 1924 में जन्मे विवेकी राय को स्वनिर्मित व्यक्तित्व कहा जा सकता है। शरीर नहीं रहा पर उनकी किताबें हमारे बीच हैं और रहेंगी।
Bidesia Rang : बीएचयू से निकलनेवाली एक पत्रिका को इस बार डॉ विवेकी राय पर निकलना था. उस पत्रिका के संपादक अपने भाई धीरेंद्र राय ने पिछले कई दिनों से डॉ विवेकी राय पर एक आलेख की मांग की थी. अभी उनके भोजपुरी पक्ष पर आलेख लिखने बैठा ही था कि Pramod भइया के वाल से सूचना मिली कि वे नहीं रहे. भोजपुरी हिंदी में डॉ विवेकी राय ने जो अहम काम किये हैं, वह हमेशा महत्वपूर्ण रहेगा. हिंदी के मठ—सठ ऐसे लोगों को अपने समय में ज्यादा महत्व नहीं देते जो हिंदी के साथ लोकभाषाओं की दुनिया को भी समृद्ध करते चलते हैं. डॉ विवेकी राय उनमें एक महत्वपूर्ण स्तंभ थे, दुर्लभ भी…उन्हें नमन, विनम्र श्रद्धांजली
कुछ और प्रतिक्रियाएं –
पंकज सिंह टाइगर : साहित्य के क्षितिज पर अपना अमिट हस्ताक्षर बनाने वाले “यश भारती ” तथा “गाजीपुर गौरव” से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ•विवेकी राय जी के निधन से स्तब्ध हूँ तथा काफी गहरा आघात पहुँचा है ।डाॅ• विवेकी राय जी का निधन हम सबके लिए ,साहित्यिक समाज और पूरे देश के लिए अपूरणीय क्षति है। महान आत्मा की शान्ति के लिए मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ तथा परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना प्रकट करता हूँ ।
Shiva Wavalkar : ‘सोनामाटी’ और ‘लोकऋण’ इन महत्त्वपूर्ण उपन्यासों के लेखक विवेकी राय नहीं रहें। उन्होंने आंचलिक उपन्यासों की सर्जना करते हुए ग्रामीण जीवन के यथार्थ को बड़ी सामाजिकता के साथ उभारा है। उन्हें सादर नमन।
Kanwal Bharti : मैं विवेकी राय जी को धर्मयुग में पढ़ा करता था और उनसे मिलने की तमन्ना पाले हुए था. मेरी यह तमन्ना १९७४ में पूरी हुई, जब मैं प्रगति प्रकाशन आगरा के प्रतिनिधि के तौर पर पूर्वांचल के दौरे पर था और जब मैं गाजीपुर पहुंचा तो खोजते हुए उनके घर पर जाकर उनसे मिला था. तब बड़े लेखकों से मिलने का जूनून था मुझमें. उसके बाद उनसे फिर कभी मुलाकात नहीं हुई. आज उनके निधन की खबर फेसबुक पर पढ़ी, तो बहुत दुख हुआ. उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि.
Tauseef Goyaa : किसान लेखक का जाना! विवेकी राय का निधन पूरब की माटी से साहित्य को सोना बनाने वाले एक कीमियागर का खो जाना है। हिंदी अदब में जब भी गाँव, किसान, खेत, लोक और प्रकृति की खोज होगी, निबंधकार-कथाकार विवेकी राय की रचनाएं विश्वनीय और अनुभव सिद्ध जीवन के साथ हमें मुकम्मल राह दिखाएंगी। उन्हें अंतिम लोकांजलि!
Satish Pancham : – मेरे प्रिय लेखक विवेकी राय जी नहीं रहे 🙁 हाय रे परान, कालातीत, गँवईं गंध गुलाब, आदमी का पईया….सर्कस….तू क्यूं सोया…..कालचक्र……मनबोध मास्टर की डायरी…..मंगल भवन ! विनम्र श्रद्धांजली !
Sushil Singh: नहीं मिलेगी माटी की महक।हिंदी साहित्य के दूसरे प्रेमचंद डॉ विवेकी राय की सांसे टूटी।
सन्तोष कुमार राय : साहित्यकार विवेकी राय जी नहीं रहे। हिंदी साहित्य में गंवई गंध के महानतम रचनाकार विवेकी राय ने अपने विपुल सर्जना में गांव की माटी को जैसी जगह दी वह अन्यत्र दुर्लभ है। विवेकी राय जी हमारे समय के उन लेखकों में से थे जिन्होंने देश को आजाद होते हुए और उसके बाद के उपेक्षित गांव की बुझती हुई आवाज बने। ह्रदय से अपने मनीषी को नमन करता हूँ और श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।।
Gyanendra Rai : करयिल माटी की सोंधी महक के कुछ अनूठे सन्दर्भ आज डा.विवेकी राय जी के साथ ही अधूरे रह गये………..
रोहित मिश्र : साहित्यकार विवेकी राय जी नहीं रहे। हिंदी साहित्य में गंवई गंध के महानतम रचनाकार विवेकी राय ने अपने विपुल सर्जना में गांव की माटी को जैसी जगह दी वह अन्यत्र दुर्लभ है। विवेकी राय जी हमारे समय के उन लेखकों में से थे जिन्होंने देश को आजाद होते हुए और उसके बाद के उपेक्षित गांव की बुझती हुई आवाज बने। ह्रदय से अपने मनीषी को नमन करता हूँ और श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।।



