नक्सली मुख्यधारा से दूर भटके हुए लोगों का ऐसा उग्रवादी संगठन है जो देश की सवैधानिक व्यवस्था पर हिंसक तरीके से चोट करने का हर मौका ढूँढता रहता है. इसके लिए राष्ट्रद्रोहियों और देश के दुश्मनों से भी हाथ मिलाने से इन्हें गुरेज नहीं.
न्यायसंगत व्यवस्था की हवाबाजी करने वाले लाल सलाम दरअसल किसान और मजदूरों के दुश्मन होते हैं. इसका प्रमाण 18 मार्च 1999 को प्रतिबंधित नक्सली संगठन एमसीसी ने जहानाबाद जिले के सेनारी गाँव में दिया था जब 500-600 की संख्या में आए हथियारबंद नक्सलियों ने गांव को घेर लिया और फिर 34 किसानों की निर्मम हत्या कर दी.
हत्या का तरीका इतना वीभत्स था कि रूह अबतक चीत्कार करती है.इस हत्याकांड से पूरे देश में हाहाकार मच गया.लेकिन लाल सलाम वाले वामपंथियों की ज़बान नहीं खुली.
बहरहाल गाँव में लाशों का ढेर लग गया और आँख के आंसू भी पत्थर बन गए.प्रशासन के हाथ-पाँव फूल गए और स्थिति नियंत्रण के बाहर जाती प्रतीत होने लगी तब केंद्र सरकार में बतौर मंत्री जार्ज फर्नाडींस, नीतीश कुमार और यशवंत सिन्हा ने सेनारी का दौरा किया था और इन नेताओं के आने के बाद हीं शवों को उठाया गया था.
दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा भी मिला था.लेकिन जब हिंसा सत्ता प्रायोजित हो तो सजा भला किसे मिले? मौत के असली सौदागर तो वो हैं जिनके इशारे पर एक खास समुदाय के लोगों का मनोबल तोड़ने के इरादे से मानवता को कलंकित करने वाली ऐसी घटना को करवाया गया.
आज जार्ज फर्नाडींस और यशवंत सिन्हा हाशिए पर हैं और नीतिश ने उन्हीं से हाथ मिला लिया जो ऐसे नरसंहारों के असली दोषी हैं.अफ़सोस. (जानकारी का स्रोत द ट्रिब्यून,प्रभात खबर)




