चौहर नाम की कोई फिल्म आयी थी शायद. आपमें से ज्यादा लोगों ने इसे फेसबुक पर ही देखा होगा. बाकी तो इसका कोई नामलेवा भी नहीं. ये फिल्म बिहार के बाभनों के अहंकार का नाश करने आयी थी लेकिन उलटे फिल्म की ही बत्ती गुल हो गयी और पूरी सिनेमाई स्ट्रेटजी धरी की धरी रह गयी.
दरअसल जातीय वैमनस्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘चौहर’ नाम की फिल्म का निर्माण किया गया था जिसमें मनगढ़ंत प्रेम कहानी के माध्यम से ऊँची जाति की लड़की के साथ नीची जाति की प्रेम प्रसंग को दिखाया गया था. उकसाने वाले संवाद रखे गए और उसका खूब-प्रचार किया गया.
लेकिन भूमिहार ब्राहमण समाज इस पूरे स्ट्रेटजी को समझ गया कि निर्देशक विरोध के तवे पर अपनी फ़िल्मी रोटी सेंकना चाहता है. फिर क्या था लोगों ने बहिष्कार तो दूर की बात, उसपर चर्चा करना तक बंद कर दिया. इस तरह फिल्म आयी और चली गयी, किसी को पता तक नहीं चली और चौहर के चुहारों की सिनेमाई स्ट्रेटजी फेल हो गयी. इस तरह से पर्दे पर भारी पड़े बिहार के बाभन. इसे कहते चाणक्य नीति. तुम डाल-डाल तो बाभन पात-पात.




