अजीत अंजुम,मैनेजिंग एडिटर,इंडिया टीवी


देश में जातिवाद के जहर की खेती लंबे समय से हो रही है और कथित प्रगतिशील वामपंथी इसके सबसे बड़े किसान है. ये फसल ऐसी है जिसकी कटाई आप सालोभर अपनी मनमर्जी से कर सकते हैं.मजेदार ये है कि बीजारोपण सिर्फ एक बार ही करना पड़ता है.सिर्फ बीच में थोड़ी बहुत सिंचाई कीजिये, फसल लहलहाती रहेगी. फिर आप जब चाहे इसे काट सकते हैं. समय-समय पर प्रगतिशील,बौद्धिक,सेक्युलर और राजनीतिक पार्टियां चुनावी मौसम में फसल काटती भी रहती है.ये नगदी फसल है.तुरंत प्रतिफल मिलता है और इसी पर कई राजनीतिक पार्टियों और प्रगतिशील बौद्धिकों का भविष्य खड़ा रहता है.ये बाते तो करते हैं जातिवाद को हटाने की,लेकिन मौका मिलने पर अपनी जात दिखाने से बाज नहीं आते और इसके शिकार ढ़ेरों लोग बनते हैं और इस चक्कर में कई प्रतिभाओं का भविष्य खतरे में पड़ जाता है. ऐसा ही एक किस्सा आज आपको बताने जा रहे हैं. 
ये किस्सा देश के बड़े पत्रकार और इंडिया टीवी के मैनेजिंग एडिटर अजीत अंजुम का है जिन्हें शुरूआती दौर में एक मीडिया संस्थान में सिर्फ इसलिए नौकरी नहीं मिली क्योंकि वे सवर्ण जाति यानी भूमिहार समुदाय से आते हैं.खुद उन्होंने ये बातें एक मीडिया पोर्टल से बातचीत में कही.उन्होंने अपने साक्षात्कार में इस किस्से को सुनाते हुए कहा – 
अजीत अंजुम,मैनेजिंग एडिटर,इंडिया टीवी
मुझे नौकरी की जरूरत थी,उन्हीं दिनों आज अखबार में कुछ लोगों की बहाली होने की सूचना मिली. ट्राई करने मैं भी पहुंचा। वहां पहुंचा तो जिन्होंने इंटरव्यू लिया उन्होंने केवल तीन सवाल पूछे- जाति क्या है, नाम क्या है, जिला कौन सा है. मेरा सेलेक्शन नहीं हुआ। दूसरे साथी को उन्होंने रख लिया. शायद उसकी जाति उन्हें सूट कर गई. बताया गया कि उन्हें भूमिहारों से चिढ़ है. मैं सोचता रहा कि उन्हें किसी एक भूमिहार से दिक्कत हुई तो सबको दुश्मन क्यों मान लिया? 
यह सवाल महतवपूर्ण है? बहुत सारी जाति के लोग अब भी इसी मानसिकता के साथ जी रहे हैं. लेकिन सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है. स्वयं भूमिहार जाति या उसका अतीत? ख़ैर वजह चाहे जो भी हो,इतना तो तय है कि जाति की दीवारें प्रतिभावान को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती.चाहे वो सवर्ण हो या फिर दलित.

ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र