कहते हैं कि सेनारी नरसंहार सत्ता प्रायोजित था और मकसद सवर्ण किसानों का मनोबल तोड़ना था. लेकिन क्या लालू-राबड़ी सरकार अपने मकसद में कामयाब हुए? निष्पक्ष रूप से देखिये तो ये मानने में कोई शक नहीं कि आंशिक रूप से ही सही, लेकिन उन्हें सफलता जरूर मिली और साथ में बोनस के रूप में पिछडों का उनका वोट बैंक भी और अधिक सुदृढ़ हुआ.
दूसरी तरफ सेनारी की प्रतिक्रिया में स्वतंत्र किसानों द्वारा कार्रवाई तो हुई, लेकिन सेनारी गाँव में जो भय का वातावरण पसरा, वो सत्रह साल से आज भी बदस्तूर कायम है. इसकी गवाही गाँव का वो मंदिर दे रहा है जिसमें सत्रह साल पहले बहुचर्चित सेनारी हत्याकांड हुआ था. भगवान के मंदिर में रक्तपात करके मंदिर को अपवित्र किया गया था. तब से ये मंदिर जीर्ण-शीर्ण हालत में बंद है. कोई यहाँ पूजा नहीं करता. भगवान की अराधना नहीं होती. मानो भगवन भी किसी श्राप की सजा काट रहे हैं.
लेकिन आप दूसरे नजरिये से देखिये तो ये भय का प्रतीक भी है. कमजोर मनोबल का परिचायक भी है. मानते हैं कि जहाँ 34 लोगों की एक साथ नृशंस हत्या कर दी गयी हो, वहां पैर रखते ही रूह तो कांपेगी ही. अपनों की याद आएगी ही और खौफ़जदा करने वाला नज़ारा भी सामने आएगा.
लेकिन ये जरूरी है कि भावनाओं को नियंत्रित कर मंदिर में पुनः भगवान की स्थापना की जाए. और सेनारी के उस मंदिर में भी दीया जलाना चाहिए जहां सत्रह साल पहले 34 लोगों की बलि दी गयी थी.इस रौशनी से भू-समाज जगमगा उठेगा.
भू-मंत्र का मानना है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार करके फिर से इसमें पूजा शुरू होनी चाहिए।।यह भू-समाज ही नहीं तमाम किसानों के मनोबल का प्रतीक बनेगा और नरपिशाच नक्सलियों के खिलाफ किसानों के युद्ध का एलान होगा. #BhuMantra



