-आनंद प्रकाश-
सेनारी हत्याकांड पर जहानाबाद से आनंद प्रकाश की रिपोर्ट
सेनारी नरसंहार राबड़ी देवी के शासनकाल में हुआ. त्रासदी है कि अब जब फैसला आया तब एक बार फिर लालू यादव एंड कंपनी सत्ता में है. यानी सत्रह साल बाद भी कुछ नहीं बदला तो उस इलाके की तकदीर कैसे बदलेगी? सरकार ने सबूत नहीं पेश किये और हत्यारे छूट गए. सरकार तब भी उनके साथ थी और आज भी उनके साथ है. सवर्ण किसानों का वजूद कल भी संकट में था और आज भी है. पढ़िए जहानाबाद से आनंद प्रकाश की रिपोर्ट (भू-मंत्र)-
अखबार की हेडलाइन देखकर पैरों तले ज़मीन खिसक गयी
उस समय मेरी उम्र कोई उन्नीस-बीस साल की थी, पटना के मुस्सलहपुर हाट के पास एक लॉज में रहता था । हर सुबह की तरह उस सुबह भी पास के चाय दुकान पर चाय पीने गया, चाय के साथ अख़बार पढ़ने की भी आदत थी. लेकिन अख़बार के अलग-अलग पन्ने अलग-अलग लोगों के हाथ में थे.
उस समय मेरी उम्र कोई उन्नीस-बीस साल की थी, पटना के मुस्सलहपुर हाट के पास एक लॉज में रहता था । हर सुबह की तरह उस सुबह भी पास के चाय दुकान पर चाय पीने गया, चाय के साथ अख़बार पढ़ने की भी आदत थी. लेकिन अख़बार के अलग-अलग पन्ने अलग-अलग लोगों के हाथ में थे.
खैर इंतज़ार करने लगा….. कभी खेल का पन्ना हाथ लगता तो कभी संपादकीय वाला पन्ना. फिर आख़िरकार पहला पन्ना हाथ लगा लेकिन पहले पन्ने पर नजर पड़ते ही पैरों तले जमीन खिसकने लगी…….वहां मोटे अक्षरों में छपा था –
‘जहानाबाद के सेनारी गाँव में पैंतीस किसानों की गला रेतकर हत्या’…….
किसानों का दोष बस इतना कि वे भूमिहार थे
किसानों का दोष बस इतना कि वे भूमिहार थे
सेनारी गाँव के बारे में मालूम था ही और किसान शब्द लिखा देखकर समझ में पूरी तरह आ गया कि अपने पैंतीस भाइयों को बड़ी बेदर्दी से मारा गया है । धीरे-धीरे बोझिल क़दमों से लॉज वापस आया और अपने दोस्त जो साथ में रहता था, उसे पूरी बात बतायी । फिर हमलोग पास के सैदपुर हॉस्टल गए…… वहां एकदम अजीब सा और मातमी सन्नाटा पसरा था, सबों के चेहरे बस अपने अस्तित्व को अपनी आँखों के सामने मिटते देख रहे थे ।
दोपहर बाद हमलोग जहानाबाद आ गए ताकि इस क्रूरतम नरसंहार के बारे में ज्यादा जानकारी मिले । पता चलते गया कि कैसे सब की हत्या हुई, दस साल से लेकर पचास साल तक के निर्दोषों को लाइन में लगाकर गर्दन काट दिया गया । इन सबों का दोष बस यही था कि ये भूमिहार थे ।
किसानों का मनोबल तोड़ने की सरकारी साजिश
ये कोई पहली बार नही था जब मेहनती किसानों का इस तरह कत्लेआम हुआ था, सेनारी से सात साल पहले बारा में भी ठीक इसी तरह हुआ था, मरने वालों की संख्या भी इतनी ही थी और मारने वाले भी वही लोग थे.
लेकिन फर्क ये था कि बारा के बाद हमारा मनोबल कमजोर हुआ था वहीँ सेनारी के बाद हम अपने अपना अस्तित्व बचाने के लिए कुछ भी करने को तैयार हो गए था…… परिणाम भी साल भर में ही मिल गया जब असली दोषियों को उनके घर में ही ढेर कर दिया गया ।
राबड़ी देवी ने कहा था कि ‘हम क्यों सेनारी जाएँ, वो लोग हमको वोट थोड़े दिया था’
सेनारी और बारा सिर्फ कुछ गिरोहों का कारनामा नही था बल्कि ये पूर्ण सत्ता प्रायोजित था, हम सब को ये याद होगा कि सेनारी कांड के बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि ‘हम क्यों सेनारी जाएँ, वो लोग हमको वोट थोड़े दिया था’....मतलब ये उनका प्लान था कि इन्हें मारो भी और इनका मनोबल भी तोड़ डालो ।
सेनारी और बारा सिर्फ कुछ गिरोहों का कारनामा नही था बल्कि ये पूर्ण सत्ता प्रायोजित था, हम सब को ये याद होगा कि सेनारी कांड के बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि ‘हम क्यों सेनारी जाएँ, वो लोग हमको वोट थोड़े दिया था’....मतलब ये उनका प्लान था कि इन्हें मारो भी और इनका मनोबल भी तोड़ डालो ।
आज अदालत का फैसला आया है….. कि मारने वाले सिर्फ पंद्रह थे और अगर रिहा होने वालों के नाम देखा जाए तो ये स्पष्ट है कि असली दोषियों को छोड़ दिया गया । इसमें आश्चर्य की बात भी नही है क्योंकि आज वही लोग सत्ता में हैं जिन्होंने इस क्रूरता को अंजाम दिया था ।



