anant singh
कुख्यात अपराधी और लालू प्रसाद यादव के खासमख़ास ‘शहाबुद्दीन’ की रिहाई का नज़ारा तो आपको याद होगा ही. शहाबुद्दीन ने रिहा होते ही पूरे बिहार को एक तरह से भयाक्रांत कर दिया. जेल से बाहर आते ही बयान दिया और गठबंधन की सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर प्रहार किया. लंबे-चौड़े काफिले से सीवान पहुंचा और टोल टैक्स पर टैक्स चुकता नहीं किया. उसके पहले पत्रकार की हत्या करवाने का मामला तो हो ही चुका था. बस फिर क्या था सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया ने कुछ ऐसा बैंड बजाया कि शहाबुद्दीन चंद दिनों में ही वापस सलाखों के पीछे फिर वापस पहुँच गया. उसे दिखावा महंगा पड़ गया. 
आशंका जाहिर की जा रही थी कि अनंत सिंह की रिहाई के समय भी कुछ ऐसा ही नज़ारा न पेश हो जाए. लेकिन अनंत सिंह और उनके समर्थकों ने सूझबूझ का परिचय देते हुए ऐसा कुछ भी नहीं किया. न कोई शोर-शराबा हुआ और न लंबी-चौड़ी गाड़ियों का काफिला निकला. शनिवार दोपहर 3 बजे बगैर किसी तामझाम के अनंत सिंह बेऊर जेल से निकले और तेजी से अपनी लक्जरी गाड़ी में सवार होकर रवाना हो गए. जेल के गेट पर भी उनका स्वागत के लिए चंद समर्थक ही मौजूद थे. वहां भी कोई नारेबाजी नहीं हुई. 
मीडिया के साथ बातचीत में भी अनंत सिंह ने बड़बोलापन की बजाए संयम दिखाया. विवादस्पद बयान से बचे और सिर्फ क्षेत्र की जनता को याद किया.बाद में बड़हिया गए, माता का आशीर्वाद लिया और फिर मोकामा के लिए रवाना हो गए. यानी रिहाई के बाद अनंत सिंह पहली परीक्षा में खरे उतरे. उनके संतुलित व्यवहार ने मीडिया और नेताओं को उनपर निशाना साधने का कोई मौका नहीं दिया. आगे भी वे ऐसा ही संयम दिखाते हुए राजनीति में अपनी चुनौती पेश करते हैं तो जल्द ही लालू-नीतीश के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर सकते हैं. उम्मीद है वे अब भगवान परशुराम के रास्ते पर चलकर अपने धन और बल का प्रयोग कमजोरों की रक्षा के लिए करेंगे. इससे लोकप्रियता के बाद उन्हें यश भी मिलेगा.

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