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| प्रतिकाताम्क तस्वीर |
सेनारी ह्त्याकांड पर जब आज फैसला आया तो उन जख्मों पर हल्का मरहम लगा जो पिछले 17 साल से नासूर बना हुआ था. सेनारी गाँव के लोग सत्रह साल पहले की उस घटना को आजतक नहीं भूले जब उनके अजीज 34 लोगों को बड़ी बेरहमी से गाजर-मूली की तरह काट दिया गया. तब से ये लड़ाई लगातार न्यायालय में चल रही थी. इस दौरान कई गवाह भी चल बसे.लेकिन न्याय नहीं मिला.अब जब आंशिक न्याय मिला है तो उसे देखने इस केस के कई अहम गवाह जिंदा ही नहीं है.उन्हीं में से एक सबसे अहम गवाह हैं चिंता देवी.
दूसरे शब्दों में ये कहना ज्यादा सही होगा कि चिंता देवी ने ही सेनारी के कसाईयों की चिता सजायी और उसकी भूमिका कई साल पहले तैयार की.गौरतलब है कि सेनारी गाँव की चिंतामणि देवी ने ही थाने में शिकायत दर्ज करवाई थी और करपी थाने में 15 नामजद समेत चार-पांच सौ अज्ञात हमलावरों के खिलाफ एफआइआर दर्ज करायी थी. चिंता देवी के बयान पर गांव के 14 लोगों सहित कुल 70 नामजद लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इस हत्याकांड में चिंता देवी के पति अवध किशोर शर्मा व उनके बेटे मधुकर को भी कसाईयों ने मौत के घाट उतार दिया था.
लेकिन उसके बावजूद हिम्मत का परिचय देते हुए उन्होंने न केवल हत्यारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया बल्कि न्याय के दरवाजे तक खींच कर ले गयी जहाँ आखिरकार उनकी चिता सज गयी. आज सेनारी पर आए न्यायालय के फैसले को देखने के लिए चिंता देवी नहीं है.लेकिन उनकी रूह को जरूर सुकून मिल रहा होगा. भूमंत्र चिंता देवी को सलाम करता है. ऐसी बहादुर महिलायें जिस समाज में भी होगी,उस समाज के मनोबल को कोई डिगा नहीं सकता.





अभी फैसला सत्र न्यायालय से हुआ है। आगे फैसला बरकरार रहे इसके सचेत रहना होगा।कई बार ऐसा देखा गया है कि निचले अदालत द्वारा दिए गए फैसले को उच्चतर न्यायालय बदल देता है।
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