ravish kumar nitish kumar
एनडीटीवी इंडिया के प्रख्यात पत्रकार रवीश कुमार ने 2015 में बिहार चुनाव की कवरेज करने गए थे. 
चुनाव प्रचार में जातिगत राजनीति और उसके केंद्र में भूमिहारों को रखकर अपने-अपने मतलब से 
इस्तेमाल करने पर उन्होंने अपने ब्लॉग पर एक लेख लिखा था. लेख का शीर्षक 'यादव या भूमिहार: 
ये क्या बिहार' था. उसी लेख को रवीश के ब्लॉग से लेकर साभार हम यहाँ पेश कर रहे हैं.(मॉडरेटर)

यादव या भूमिहार: ये क्या बिहार

संजय को मैं किशोर उम्र से जानता हूँ । दिल्ली में मेरे साथ भी रहा लेकिन कभी उसे जात-पात करते नहीं देखा । खुली सोच वाला और ईमानदारी से काम करने वाला संजय पटना आकर वकालत करने लगा है । अलग अलग मुद्दों पर उसकी अपनी राय होती है और अगर उसे धक्का न दिया जाए तो अपनी राय बदलने के लिए तैयार भी रहता है । हर बार संजय की राय ही होती है न कि संजय की जाति की। बिहार चुनाव को लेकर संजय की चिन्ता इतनी है कि कहीं फिर से नब्बे के दशक की तरह रंगदारी शुरू न हो जाए । दुकानें बंद होने लगे और पटना से फिर बाहर न जाना पड़े । संजय की यह राय कई लोगों से मेल खाती है और इसका अपना आधार भी है । संजय को यह आशंका लालू यादव के उस दौर को लेकर है । मैंने जैसे ही यह बात किसी से कही कि ऐसी चिन्ताओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए उसने तुरंत जवाब दिया कि भूमिहार है क्या ? हाँ है लेकिन मैं मान नहीं सकता कि उसकी यह राय जाति के कारण है । लेकिन जिनसे ये बात कही वो मानने के लिए तैयार नहीं थे ।

पटना में ही एक मित्र के साथ रिक्शे से जा रहा था । मेरे पूछने पर कहने लगा कि बीजेपी के पास चुनाव लड़ने के लिए इतना पैसा कहाँ से आ गया । उसका कुछ पैसा हम गरीब लोगों को ही दे देता । प्रधानमंत्री को इतनी रैली करने की क्या ज़रूरत है । देश कौन चलाएगा । चुनाव जीतना है जीतो लेकिन हिन्दू मुस्लिम क्यों कराते हो । रिक्शावाला अपनी बात कह ही रहा था तभी मेरे मित्र ने टोक दिया कि आप यादव हैं क्या? उसका जवाब आया जी न मालिक, हम ग़रीब हैं और दूसर जात है । संजय और रिक्शेवाले की चिन्ता अपनी अपनी जगह पर जायज़ है । मेरे लिए संजय कभी भूमिहार रहा ही नहीं लेकिन आज उसे भूमिहार कहा जा रहा है । उसकी जाति ही उसकी राय है । उसी तरह रिक्शेवाले को यादव जाति का बना दिया जाता है । इस बात के बावजूद कि संजय की चिन्ता किसी रिक्शेवाले की भी हो सकती है और किसी रिक्शेवाले का सवाल संजय का भी हो सकता है ।

लेकिन बिहार चुनाव ने हर राय को जाति में बाँट दिया है । जो नहीं बँटा है उसे भी बँटा हुआ मान लिया गया है । बिहार चुनाव में राजनीतिक दलों, मीडिया और चर्चाकारों ने भूमिहार और यादव जाति का एक दानवी चित्रण किया है । किसी समाजशास्त्री का इन दो जातियों की चुनावी छवि का विश्लेषण करना चाहिए । इन दोनों के बहाने अलग अलग खेमों में ध्रुवीकरण किया जा रहा है । भूमिहार चढ़ जाएगा तो यादव सब चढ़ जाएगा इस तरह के जुमले इन दो जातियों के लोग भी एक दूसरे के ख़िलाफ़ कर रहे हैं । प्रेस पंडित तो कर ही रहे हैं । जातिगत शोषण और सोच की कहानी तो दोनों तरफ है और क्या इन्हीं दोनों तक सीमित है ? लेकिन जिस तरह से इन दो जातियों का चित्रण हुआ है हमें सोचना चाहिए कि बच्चों और परिवारों के भीतर क्या असर पड़ा होगा । क्या ऐसा कभी हो सकता है कि सारे भूमिहार एक जैसे सोचते हों या सारे यादव एक जैसे । लोकसभा चुनाव में तो ये एक जैसे नहीं सोच रहे थे फिर विधानसभा चुनावों में कैसे सोचने लगे ? डेढ़ साल पहले क्या वे अपनी जाति भूल गए थे ? आखिर सवर्णों में या मीडिया में यादवों से इतनी नफरत क्यों हैं ? उसी तरह से भूमिहारों से इतना ख़ौफ़ क्यों हैं ? क्या कोई और कारण है । इन दोनों ही जातियों में प्रगति, नेटवर्क और शिक्षा को लेकर किसी को तुलनात्मक सामाजिक राजनीतिक अध्ययन करना चाहिए ।

हिन्दू मुसलमान की तरह भूमिहार यादव बनाने का प्रयास हुआ है । किसने पहले किया यह सवाल नहीं है । हम सब अपनी आँखों से देख रहे हैं कि बाद वाले ने भी इसका लाभ उठाया और जमकर खेल खेला । बीजेपी की रणनीति यादवों को तोड़ने की रही तो राजद की रणनीति भूमिहारों को टारगेट कर यादवों या पिछड़ों को एकजुट करने की रही । पूरे चुनाव के कवरेज में इन्हीं दो खाँचों को मज़बूत किया जाता रहा । क्या सारे यादव दुकान लूटने वाले होते हैं ? क्या सारे भूमिहार दबंग होते हैं ? क्या सारे भूमिहार रणवीर सेना में शामिल थे या सारे यादव साधु यादव हो गए थे ? सामंती और जातिगत शोषण सच्चाई है लेकिन उनके लिए क्या कोई जगह बची है जो अपनी जात बिरादरी के भीतर इस सोच से लड़ रहे हैं ? क्या उनकी राय को जाति से जोड़ कर हम फिर से उन्हें जाति के खाँचे में धकेल नहीं रहे ।

बिहार चुनाव ने पूरे जनमत को जाति के फ़्रेम में क़ैद कर दिया है । यादव कहीं नहीं जाएगा, कुशवाहा आधा आधा हो गया, राजपूत उधर होगा तो भूमिहार इधर ही होगा । यह एक दुखद चुनाव है । जहाँ हर मत का अपना एक अलग जात है । चश्मे का पावर फिक्स है । यह चुनाव चर्चाकारों के लिए जात पात चुनाव का है । जात पात से आगे किसी ने संजय और उस रिक्शेवाले से बात ही नहीं की । मेरे लिए संजय संजय रहेगा । अभय यादव अभय ही रहेगा । जाति के सवाल महत्वपूर्ण हैं लेकिन जो बोल रहा है हमेशा ही उसकी जाति बोलेगी यह भी ठीक नहीं है । ऐसा करके हम एक दूसरे पर बोलने की जगह गँवा देंगे । दिन के वक्त जून के जैसी गर्मी है बिहार में और शाम होते ही अक्तूबर की नरमी चुपचाप उतरती है । एक जुनून सा जो दिन भर तारी रहता है वो शाम होते ही ढलता है । सिहरन सी होती है । चुनाव की रिपोर्टिंग से मन उखड़ गया है । हर बार चुनावी कवरेज से कुछ न कुछ लेकर लौटता था । इस बार ख़ाली होकर लौट रहा हूँ ।

ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र

2 COMMENTS

  1. ravish be practical chalie maan lia sanjay bhumiyaar hone k bawajood jaat paat nahi krte h par aap yaha sabhi logo k mansikta ko nhi badal sakte h aap jo yaha bhawook ho kar likh die kinhi ek ka pakshpaat krenge jaat ke ground pr toh lagega jaise pure jaat ko defend kr re h har lpg el trh k nahi hote pr haa kuch log rakchas pravirti k hote h jinki mansikta tatti k trh h aur jab tk unlov samajhdaar nhi bnege tb tk unka fayda uthaya jaaega

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here