स्वामी सहजानंद सरस्वती

आखिर स्वामी सहजानन्द को क्यों भूला दिया गया?

किसानों की बहुलता और आधुनिक भारत के निर्माण में अहम योगदान होने के बावजूद किसानों के राष्ट्रवाद का उल्लेख न के बराबर है। इसका बड़ा कारण है किसानों के प्रथम संगठनकर्ता ‘युग पुरुष’ स्वामी सहजानन्द सरस्वती को गुमनामी के अंधेरे में धकेल दिया जाना। पहली नजर में यह कौतूहल का विषय लगता है कि बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी स्वामी सहजानन्द सरस्वती को आखिर आधुनिक लेखन में उचित स्थान क्यों नहीं मिल पाया वह भी तब जब इस ‘युग पुरुष’ का धर्म‚ समाज सुधार और राजनीति को लेकर आधुनिक भारत के निर्माण में बराबर का योगदान है। धर्म और समाज सुधार के क्षेत्र में उनका योगदान वैसा ही है‚ जो दयानन्द और विवेकानन्द का है। समाज सुधार में सहजानन्द के अर्थपूर्ण हस्तक्षेप के लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने उन्हें ‘दलितों का सन्यासी’ कहा है। वहीं भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहजानन्द का योगदान गांधी‚ तिलक‚ नेहरु‚ बोस और पटेल सरीखे नेताओं से कमतर नहीं है॥। स्वामी सहजानंद सरस्वती के राजनीतिक कद को समझने के लिए सुभाष चंद्र बोस का यह कथन महत्वपूर्ण है कि ‘साबरमती आश्रम में मैंने खादी धोती पहने पूंजीपतियों के एक सन्यासी को देखा परंतु भारत का सच्चा सन्यासी मुझे पटना के सीताराम आश्रम (इसी आश्रम मेें सवामी सहजानंद रहते थे) में मिला। दरअसल‚ स्वामी सहजानंद ही वह व्यक्ति थे जो आजादी की अलख शहरों से निकालकर सुदूर गांवों तक ले गए। पांच हजार वर्ष के भारतीय इतिहास में उन्होंने पहली बार किसानों को संगठित कर उनमें राष्ट्रीयता का बीज बोया। किसान संगठन के बूते उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर काबिज करवाया था। १९३९ के रामगढÃ कांग्रेस अधिवेशन में स्वामी सहजानंद ने ही पहली बार ‘भारत छोडÃो’ का नारा दिया था। ॥ लेकिन किसानों के इस ‘शिखर गौरव पुरुष’ के बारे में उपरोक्त कार्यों का भारतीय इतिहास में कोई विशेष जिक्र नहीं मिलता है। स्वामी सहजानन्द सरस्वती और उनके किसान आंदोलन पर आधुनिक भारत का इतिहास पूरी तरह आंखे मूंदे हुए है। यही नहीं‚ भारतीय इतिहास में उपेक्षित रहने वाले स्वामी सहजानंद का मुख्य कार्यक्षेत्र बिहार के इतिहासकारों ने भी न्याययोचित स्थान नहीं दिया है। उदाहरण के तौर पर आजादी के बाद बिहार में १९५७ एवं १९७६ के बीच सरकारी स्तर पर तीन प्रतिष्ठित किताबें आइÈ– ‘फ्रीडम मूवमेंट इन बिहार’‚ ‘बिहार थ्रू दि एजेज’ और ‘कॉम्प्रीहेन्सिव हिस्ट्री ऑफ बिहार’ (दो खंड)। इन तीनों किताबों के हजारों पृष्ठों में मात्र छह पन्नों पर स्वामी सहजानन्द की चर्चा उपलब्ध है। सबसे दिलचस्प है ‘कॉम्प्रीहेन्सिव हिस्ट्री ऑफ बिहार’ में १९३० के दशक की वृहत चर्चा है जिस अवधि में सहजानंद बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका अदा कर रहे थे। परंतु यह विडंबना है कि इस खंड के किसी पृष्ठ पर स्वामी सहजानन्द की चर्चा नहीं है। सरकारी संरक्षण में लिखित इतिहास के अलावा विश्वविद्यालय स्तर पर भी जो शोध कार्य हुए उनमें असहयोग आंदोलन‚ सविनय अवज्ञा आंदोलन‚ भारत छोडÃो आंदोलन आदि में प्रमंडलीय या जिलास्तरीय आंदोलन का इतिहास तो है लेकिन किसान आंदोलन की बात बिरले देखने को मिलती है। वास्तव में‚ राष्ट्रवादी संघर्ष में किसानों का इस्तेमाल मध्यवर्गीय नेतृत्व ने अपने हित में किया‚ जिसे इतिहास में ‘कैनन–फॉडर थ्योरी’ कहते हैं। यह भी सच है कि किसानों ने जब भी किसी अन्य वर्ग के साथ मिलकर संघर्ष किया‚ वह छला गया। ॥ इन सबके बावजूद किसान आंदोलन ने राष्ट्रवाद को मजबूती प्रदान करने के अलावा राजनीतिक–समाजिक रुपांतरण की प्रक्रिया को धारदार बनाया जिस कारण आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन संभव हुआ। कम से कम जमींदारी उन्मूलन के लिए ही सही‚ स्वामी सहजानन्द को इतिहसकारों को याद कर लेना चाहिए। यदि जमींदारी उन्मूलन नहीं हुआ होता‚ तो समाज के उपेक्षित वर्ग आज भी सत्ता से दूर होते। यह इतिहसकारों का ही गुनाह है कि स्वामी सहजानंद सरस्वती को न तो गांधी‚ नेहरु‚ पटेल के मुकाबले की नेता की मान्यता मिली और न ही दयानन्द व विवेकानंद सरीखे धर्म प्रवर्तकों में उन्हें गिना जाता है। यहां तक कि इतिहासकार ही वह वजह हैं जिससे किसान भी यह बिसर चूके हैं कि उनका पहला नायक दंड धारण करने वाला सन्यासी स्वामी सहजानन्द सरस्वती था।