Bhumihar Leaders

लोकसभा चुनावों को प्रजातंत्र का महापर्व कहा जाता है. इस महापर्व से यह निर्धारित होता है कि हमारे देश और समाज का नेतृत्व कौन करेगा? देश में फिर से एक बार इस महापर्व की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है. राजनीतिक दल प्रत्याशियों के सीटों का निर्धारण करने में लगी है. बिहार और उत्तरप्रदेश में भी कुछ ऐसा ही हाल है. यहाँ भी सीटों का बंटवारा करने में राजनीतिक दल लगी हुई. चुकी यहाँ पर सीटों के बंटवारे में जातीय समीकरण सबसे ज्यादा हावी रहते हैं, इसलिए जिसका पलड़ा भारी रहता है, आलाकमान उसे टिकट दे देती है. इस संदर्भ में भूमिहार ब्राहमण समाज के नेताओं की हालत अबकी कुछ ख़ास नहीं है. हिन्दुत्व के फायरब्रिगेड नेता ‘गिरिराज सिंह’ को नवादा सीट से भाजपा की तरफ से टिकट नहीं मिला. कहाँ से मिलेगा या  मिलेगा भी की नहीं, अभी रहस्य ही है. अपुष्ट ख़बरों के मुताबिक़ मनोज सिन्हा को भी गाजीपुर की जगह किसी दूसरी जगह से टिकट मिल सकता है. हालांकि इस खबर पर अभी संशय है. दूसरी तरफ डॉ. अरुण कुमार जैसे समाज के कुछ और भी नेता हैं जिन्हें स्वयं से निर्णय लेना है कि कहाँ से चुनाव लड़ेंगे. लेकिन विश्वास की कमी के वजह से वे अबतक ये निर्णय नहीं ले पाए हैं कि किस लोकसभा क्षेत्र से चुनावी ताल ठोके. ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर भूमिहार समाज के नेताओं की यह हालत कैसे हो गयी है कि हर तरह से काबिल होने के बावजूद उन्हें अपनी सीट बचाने या पाने के लिए मत्थे टेकना पड़ रहा है. इस मुद्दे पर सटीक विश्लेषण करते हुए समाजसेवी और भूमंत्र के प्रखर सदस्य अखिलेश सिंह लिखते हैं –

जड़ों से कट गए हैं समाज के नेता

– अखिलेश सिंह

समाज के नेताओं ने यदि 5 साल का सदुपयोग करके समाज के लिए आवाज उठायी होती तो आज उन्हें एक अदद लोकसभा टिकट के अलाकमान के सामने घुटने टेकने या अपनी मनपसंद सीट से समझौता करने की जरुरत नहीं पड़ती. भूमिहार समाज में अब भी इतना दम है कि वे निर्दलीय भी किसी प्रत्याशी को संसद तक पहुंचा सकते हैं.

भू-समाज का राजनीति से प्रगाढ़ संबंध रहा है और इस समाज से एक-से-बढ़कर एक प्रखर नेता निकले हैं जिनकी चमक से भारतीय राजनीति भी प्रकाशमान हुई है. इन नेताओं की खासियत रही है कि देश और राज्य के विकास के साथ-साथ उन्होंने अपने समाज के बारे में हमेशा सोंचा और उसकी प्रगति के लिए महत्वपूर्ण काम किया. यही वजह है वर्षों बीत जाने के बाद भी उन नेताओं का आज भी सम्मान किया जाता है और वे एक आदर्श की तरह स्थापित हैं. इसमें कोई शक नहीं कि अब देश और समाज की राजनीति बदल गयी है. लेकिन उसका मूल स्वरूप अब भी बरकरार है. कहने का मतलब है कि प्रत्याशियों को टिकट देने का मानदंड अब भी वही है कि आपको अपने समाज का कितना समर्थन हासिल है. लेकिन समाज के नेता इसे चुनावी जीत के बाद अगले पांच साल तक के लिए भूल जाते हैं और फिर उन्हें आलाकमान के सामने मत्था टेकना पड़ता है. इससे वे तो हाशिये पर जाते ही हैं , साथ ही साथ समाज की हैसियत को भी दांव पर लगा देते हैं.

भू-समाज के नेताओं की हालत कुछ ऐसी ही है. समाज ये नेता अपनी जड़ो से इस कदर कट गए कि पांच साल तक न समाज का कोई मुद्दा उठाया और न समाज के लिए कुछ करने की कोशिश की. विडंबना है कि चुनाव जितने के लिए इनकी पहली पसंद भूमिहार बहुल क्षेत्र होता है लेकिन चुनाव जीतते ही वे हिन्दुत्व का चोला पहन लेते हैं. हिन्दुत्व की बात करने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन जिस समाज ने आपको आवाज़ दी है , उससे किनारा करना कितना उचित है?  सीधी सी बात है कि जब आपको चुनाव जीतने के लिए अपने समाज की ज़मीन की ही जरुरत होती है तो फिर राजनीतिक दलों की चमचागिरी और चिरौरी करने का क्या मतलब? दूसरों की बजाए अपनी छाती 56 इंच की क्यों नहीं करते नेताजी?  #भूमंत्र

1 COMMENT

  1. कुछ बातों से सहमत हूँ लेकिन कुछ बातों से असमंजस कि स्थिति क्यों न लोकतांत्रिक व्यवस्था स्वच्छ की परिकल्पना किया जाए ?

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