GIRIRAJ SINGH
किसान नेता और नक्सलियों के खिलाफ अपने वक़्त के सबसे बड़े रणनीतिकार ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया का 1 जून को शहादत दिवस मनाया गया तब समाज के कई नेताओं ने अपने आप को इससे बिलकुल दूर रखा. यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर भी दो शब्द लिखने से वे चूक गए जिससे पूरा भूमिहार ब्राहमण समाज उबल पड़ा. भूमिहार ब्राहमण समाज के बौद्धिक वर्ग द्वारा इसका पुरजोर विरोध हुआ. सोशल मीडिया पर बड़े नेताओं की खूब फजीहत हुई. ट्विटर और फेसबुक पर नेताओं से सवाल पूछा गया कि तुच्छ राजनीति के दवाब में क्या आप समाज के महापुरुषों को भी भूला देंगे. श्रद्धांजलि का एक ट्वीट तक नहीं करेंगे? इस मसले पर मुख्यतः चार नेता निशाने पर रहे जिनके नाम हैं गिरिराज सिंह, डॉ.अरुण कुमार, अखिलेश प्रसाद सिंह और सीपी ठाकुर. यहाँ हम बात गिरिराज सिंह की कर रहे हैं.
गिरिराज सिंह की भी ट्विटर पर काफी लानत-मलानत हुई कि हर विषय पर मुखरता से ट्विट करने वाले गिरिराज सिंह बाबा ब्रह्मेश्वर को नमन करना क्यों भूल गए. एक ट्वीट तक नहीं किया. गौरतलब है कि कभी उन्होंने बाबा ब्रह्मेश्वर को गांधीवादी और किसानों का नेता भी कहा था. पूरा मामला यही से आकर शुरू होता है. दरअसल गिरिराज सिंह की चुप्पी के पीछे एक दवाब है जिसके आगे वे अपने आपको मजबूर समझते हैं. ब्रह्मेश्वर मुखिया की जब धोखे से हत्या हुई थी तब जनाक्रोश फूटा था.उस वक़्त टीवी पर मुखर होकर गिरिराज सिंह ने बयान दिया था जिसपर काफी बवाल हुआ.उस वक़्त वे बिहार सरकार में पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री हुआ करते थे.उन्होंने किसी दवाब की परवाह किए बिना बाबा ब्रह्मेश्वर के गांव खोपिरा जाकर उन्हें गांधीवादी बताते हुए श्रद्दांजलि भी दी थी. उसके बाद खूब बवाल मचा और वे मीडिया और सियासतदानों के निशाने पर आ गए. भागलपुर न्यायालय में उनके खिलाफ एक याचिका भी दाखिल हुई थी.
मोदी सरकार में जब वे मंत्री बने तब उनका रास्ता काटने की विपक्षियों द्वारा साजिश रची गयी और उसी के तहत गिरिराज सिंह और रणवीर सेना के बीच के संबंध का मामला उछाला गया और उसे साबित करने की पुरजोर कोशिश की गयी.बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग के पुलिस अधीक्षक (एसपी) अमिताभ कुमार दास ने ने गिरिराज को मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिलने के एक दिन बाद विशेष शाखा के महानिरीक्षक ज़े एस़ गंगवार को एक रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें कहा गया था कि गिरिराज सिंह का संबंध जातीय संगठन रणवीर सेना से है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि एक जून 2012 को रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या के बाद गिरिराज ने संवेदना प्रकट करते हुए मीडिया को दिए बयान में ब्रह्मेश्वर को ‘गांधीवादी’ बताया था और श्रद्धांजलि देने उनके गांव भी गए थे. एसपी की रिपोर्ट पर राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) बिलाल नजाकी ने दास को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि उन्होंने किस अधिकार से विशेष शाखा के पुलिस महानिरीक्षक को रिपोर्ट सौंपी. भाजपा के नेताओं ने भी इस रिपोर्ट का विरोध किया था. पार्टी नेताओं ने दास को ‘विवादास्पद अधिकारी’ बताते हुए उन्हें निलंबित करने की मांग की थी. हालाँकि उसके बाद अमिताभ कुमार दास का तबादला कर दिया गया. लेकिन तबतक ये मामला मीडिया में भी खूब उछला और इसे बवंडर बनाकर उसमें गिरिराज सिंह के मंत्री पद को उड़ाने की कोशिश की गयी. हालांकि नरेंद्र मोदी का समर्थन होने के कारण उस वक़्त कुछ नहीं हुआ,लेकिन गिरिराज सिंह बैकफूट पर जरुर चले गए और तभी से बाबा ब्रह्मेश्वर का नाम लेने से सार्वजनिक तौर पर परहेज करने लग गए. क्योंकि ब्रह्मेश्वर मुखिया का नाम लेने का मतलब है रणवीर सेना से संबंध को प्रमाणित करना.बस इसी लिए वे ब्रह्मेश्वर मुखिया की पुण्यतिथि पर चुप्पी मार जाते हैं. लेकिन उन्हें सोंचना चाहिए भूमिहार कोटे से मंत्री बना आदमी यदि अपने जातीय स्वाभिमान के लिए नहीं लड़ेगा तो उसका हिन्दुत्व भी खिसक जाएगा. अपनी ज़मीन किसी के भी दवाब में नहीं छोडनी चाहिए क्योंकि वही  से खाद पानी मिलता है.

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