भूमिहार ब्राह्मण : उत्त्पति और विकास – एक परिचय
सौजन्य- संजय कुमार सिंह
वैसे तो भूमिहार वंश की उत्पत्ति के सबन्ध के इतिहास को प्राचीन किंवदन्तियों के आधार पर अनेक विद्वानों ने लिपिबद्ध करने का प्रयास किया है। ऎसा माना जाता है कि भगवान परशुराम जी ने क्षत्रियों को पराजित कर जो ज़मीन थी, उसे ब्राह्मणों को दे दिया, जिसके बाद ब्राह्मणों ने पूजा-पाठ का परम्परागत पेशा छोड़ जमींदारी शुरू कर दी और बाद में युद्ध में प्रवीनता भी हासिल कर ली थी। ये ब्राह्मण ही भूमिहार ब्राह्मण कहलाये। और तभी से परशुराम जी को भूमिहारो का जनक और भूमिहार-ब्राह्मण वंश का प्रथम सदस्य माना जाता है।
भूमिहार या बाभन (अयाचक ब्राह्मण) एक ऐसी सवर्ण जाति है जो अपने शौर्य, पराक्रम एवं बुद्धिमत्ता के लिये जानी जाती है। बिहार, पश्चिचमी उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में निवास करने वाले भूमिहार जाति अर्थात अयाचक ब्रहामणों को से जाना व पहचाना जाता हैं। मगध के महान पुष्य मित्र शुंग और कण्व वंश दोनों ही ब्राह्मण राजवंश भूमिहार ब्राह्मण (बाभन) के थे भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है
भूमिहार ब्राह्मण समाज में उपाधिय है भूमिहार, पाण्डेय, तिवारी/त्रिपाठी, मिश्र ,शुक्ल ,उपाध्यय ,शर्मा, ओझा ,दुबेद्विवेदी इसके अलावा राजपाट और ज़मींदारी के कारन एक बड़ा भाग भूमिहार ब्राह्मण का राय ,शाही ,सिंह, उत्तर प्रदेश में और शाही , सिंह (सिन्हा) , चौधरी (मैथिल से ) ,ठाकुर (मैथिल से ) बिहार में लिखने लगा
भूमिहार ब्राह्मण कुछ जगह प्राचीन समय से पुरोहिती करते चले आ रहे है अनुसंधान करने पर पता लगा कि प्रयाग की त्रिवेणी के सभी पंडे भूमिहार ही तो हैं।हजारीबाग के इटखोरी और चतरा थाने के 8-10 कोस में बहुत से भूमिहार ब्राह्मण, राजपूत,बंदौत , कायस्थ और माहुरी आदि की पुरोहिती सैकड़ों वर्ष से करते चले आ रहे हैं और गजरौला, ताँसीपुर के त्यागी राजपूतों की यही इनका पेशा है। गया के देव के सूर्यमंदिर के पुजारी भूमिहार ब्राह्मण ही मिले। हलाकि गया के देव के सूर्यमंदिर का बड़ा हिसा सकद्विपियो को बेचा जा चूका है
बनारस राज्य भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में 1725-1947 तक रहा | इसके अलावा कुछ अन्य बड़े राज्य बेतिया,हथुवा,टिकारी,तमकुही,लालगोला इत्यादि भी भूमिहार ब्राह्म्णों के अधिपत्य में रहे | बनारस के भूमिहार ब्राह्मण राजा ने अंग्रेज वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना की ईट से ईट बजा दी थी |
अनापुर राज अमावा राज. बभनगावां राज भरतपुरा धरहरा राज शिवहर मकसुदपुर राज औसानगंज राज नरहन स्टेट जोगनी एस्टेट पर्सागढ़ एस्टेट (छपरा ) गोरिया कोठी एस्टेट (सिवान ) रूपवाली एस्टेट जैतपुर एस्टेट हरदी एस्टेट ऐनखाओं जमींदारी ऐशगंज जमींदारी भेलावर गढ़ आगापुर स्टेट पैनाल गढ़ लट्टा गढ़ कयाल गढ़ रामनगर जमींदारी रोहुआ एस्टेट राजगोला जमींदारी पंडुई राज केवटगामा जमींदारी घोसी एस्टेट परिहंस एस्टेट धरहरा एस्टेट रंधर एस्टेट अनापुर एस्टेट ( इलाहाबाद) चैनपुर मंझा मकसूदपुर रुसी खैरअ मधुबनी नवगढ़ – भूमिहार से सम्बंधित है असुराह एस्टेट कयाल औरंगाबाद में बाबु अमौना तिलकपुर ,शेखपुरा स्टेट जहानाबाद में तुरुक तेलपा स्टेट क्षेओतर गया बारों एस्टेट (इलाहाबाद) पिपरा कोय्ही एस्टेट (मोतिहारी) इत्यादि ये सभी अब इतिहास के गोद में समां चुके है |
दंडी स्वामी सहजानंद सरस्वती (जुझौतिया ब्राह्मण,भूमिहार ब्राह्मण,किसान आंदोलन के जनक),बैकुन्ठ शुक्ल (१४ मई १९३४ को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा फासी),यमुना कर्जी,शील भद्र याजी ,मंगल पांडे १८५७ के क्रांति वीर,कर्यनन्द शर्मा,योगेन्द्र शुक्ल,चंद्रमा सिंह,राम बिनोद सिंह,राम नंदन मिश्र,यमुना प्रसाद त्रिपाठी, महावीर त्यागी,राज नरायण,रामवृक्ष बेनीपुरी,अलगू राय शास्त्री,राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर,राहुल सांस्कृत्यायन,बनारस के राजा चैत सिंह ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया वारेन हेस्टिंग और अंग्रेजी सेना को धूल चटाई ,देवीपद चौधरी,राज कुमार शुक्ल (चम्पारण आंदोलन कि शुरुवात की),फ़तेह बहादुर शाही हथुवा के राजा १८५७ में अंग्रेजो के खिलाफ सर्व प्रथम विद्रोह किया,काशी नरेश द्वारा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए कई हज़ार एक्कड़ का भूमि दान ,योगेंद्र नारायण राय लालगोला(मुर्शिदाबाद) के राजा अपने दान व परोपकारी कार्यो के लिए प्रसिद्ध, इत्यादि महान व्यक्तित्व भूमिहार ब्राह्मण से थे
भूमिहार ब्राह्मण भगवन परशुराम को प्राचीन समय से अपना मूल पुरुष और कुल गुरु मानते है-
१. एम.ए. शेरिंग ने १८७२ में अपनी पुस्तक Hindu Tribes & Cast में कहा है कि, “भूमिहार जाति के लोग हथियार उठाने वाले ब्राहमण हैं (सैनिक ब्राह्मण)।”
२. अंग्रेज विद्वान मि. बीन्स ने लिखा है – “भूमिहार एक अच्छी किस्म की बहादुर प्रजाति है, जिसमे आर्य जाति की सभी विशिष्टताएं विद्यमान है। ये स्वाभाव से निर्भीक व हावी होने वालें होते हैं।”
३. पंडित अयोध्या प्रसाद ने अपनी पुस्तक “वप्रोत्तम परिचय” में भूमिहार क- भूमि की माला या शोभा बढ़ाने वाला, अपने महत्वपूर्ण गुणों तथा लोकहितकारी कार्यों से भूमंडल को शुशोभित करने वाला, समाज के हृदयस्थल पर सदा विराजमान- सर्वप्रिय ब्राह्मण कहा है।
४. विद्वान योगेन्द्र नाथ भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक हिन्दू कास्ट & सेक्ट्स में लिखा है की भूमिहार ब्राह्मण की सामाजिक स्थिति का पता उनके नाम से ही लग जाता है, जिसका अर्थ है भूमिग्राही ब्राह्मण। पंडित नागानंद वात्स्यायन द्वारा लिखी गई पुस्तक – ” भूमिहार ब्राह्मण इतिहास के दर्पण में “
” भूमिहारो का संगठन जाति के रूप में “
भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत,महियल,सरयूपारी,मैथिल,चितपावन,कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए.मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए.
” भूमिहारो का संगठन जाति के रूप में “
भूमिहार ब्राह्मण जाति ब्राह्मणों के विभिन्न भेदों और शाखाओं के अयाचक लोगो का एक संगठन ही है. प्रारंभ में कान्यकुब्ज शाखा से निकले लोगो को भूमिहार ब्राह्मण कहा गया,उसके बाद सारस्वत,महियल,सरयूपारी,मैथिल,चितपावन,कन्नड़ आदि शाखाओं के अयाचक ब्राह्मण लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में इन लोगो से सम्बन्ध स्थापित कर भूमिहार ब्राह्मणों में मिलते गए.मगध के बाभनो और मिथिलांचल के पश्चिमा तथा प्रयाग के जमींदार ब्राह्मण भी अयाचक होने से भूमिहार ब्राह्मणों में ही सम्मिलित होते गए.
भूमिहार ब्राह्मण के कुछ मूलों ( कूरी ) के लोगो का भूमिहार ब्राह्मण में संगठित होने की एक सूची यहाँ दी जा रही है :
१. कान्यकुब्ज शाखा से :- दोनवार ,सकरवार,किन्वार, ततिहा , ननहुलिया, वंशवार के तिवारी, कुढ़ानिया, दसिकर, आदि.
२. सरयू नदी के तट पर बसने वाले से : – गौतम, कोल्हा (कश्यप), नैनीजोर के तिवारी , पूसारोड (दरभंगा) खीरी से आये पराशर गोत्री पांडे, मुजफ्फरपुर में मथुरापुर के गर्ग गोत्री शुक्ल, गाजीपुर के भारद्वाजी, मचियाओं और खोर के पांडे, म्लाओं के सांकृत गोत्री पांडे, इलाहबाद के वत्स गोत्री गाना मिश्र ,आदि.
३. मैथिल शाखा से : – मैथिल शाखा से बिहार में बसने वाले कई मूल के भूमिहार ब्राह्मण आये हैं.इनमे सवर्ण गोत्री बेमुवार और शांडिल्य गोत्री दिघवय – दिघ्वैत और दिघ्वय संदलपुर, बहादुरपुर के चौधरी प्रमुख है. (चौधरी, राय, ठाकुर, सिंह मुख्यतः मैथिल ही प्रयोग करते है )
४. महियालो से : – महियालो की बाली शाखा के पराशर गोत्री ब्राह्मण पंडित जगनाथ दीक्षित छपरा (बिहार) में एकसार स्थान पर बस गए. एकसार में प्रथम वास करने से वैशाली, मुजफ्फरपुर, चैनपुर, समस्तीपुर, छपरा, परसगढ़, सुरसंड, गौरैया कोठी, गमिरार, बहलालपुर , आदि गाँव में बसे हुए पराशर गोत्री एक्सरिया मूल के भूमिहार ब्राह्मण हो गए.
५. चित्पावन से : – न्याय भट्ट नामक चितपावन ब्राह्मण सपरिवार श्राध हेतु गया कभी पूर्व काल में आये थे.अयाचक ब्रह्मण होने से इन्होने अपनी पोती का विवाह मगध के इक्किल परगने में वत्स गोत्री दोनवार के पुत्र उदय भान पांडे से कर दिया और भूमिहार ब्राह्मण हो गए.पटना डाल्टनगंज रोड पर धरहरा,भरतपुर आदि कई गाँव में तथा दुमका,भोजपुर,रोहतास के कई गाँव में ये चित्पवानिया मूल के कौन्डिल्य गोत्री अथर्व भूमिहार ब्राह्मण रहते हैं
भूमिपति ब्राह्मणों के लिए पहले जमींदार ब्राह्मण शब्द का प्रयोग होता था..याचक ब्राह्मणों के एक दल ने ने विचार किया की जमींदार तो सभी जातियों को कह सकते हैं,फिर हममे और जमीन वाली जातियों में क्या फर्क रह जाएगा.काफी विचार विमर्श के बाद ” भूमिहार ” शब्द अस्तित्व में आया.” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द के प्रचलित होने की कथा भी बहुत रोचक है।
बनारस के महाराज ईश्वरी प्रसाद सिंह ने १८८५ में बिहार और उत्तर प्रदेश के जमींदार ब्राह्मणों की एक सभा बुलाकर प्रस्ताव रखा की हमारी एक जातीय सभा होनी चाहिए.सभा बनाने के प्रश्न पर सभी सहमत थे.परन्तु सभा का नाम क्या हो इस पर बहुत ही विवाद उत्पन्न हो गया.मगध के बाभनो ने जिनके नेता स्व.कालीचरण सिंह जी थे ,सभा का नाम ” बाभन सभा ” करने का प्रस्ताव रखा.स्वयं महराज “भूमिहार ब्राह्मण सभा ” के पक्ष में थे.बैठक मैं आम राय नहीं बन पाई,अतः नाम पर विचार करने हेतु एक उपसमिति गठित की गई.सात वर्षो के बाद समिति की सिफारिश पर ” भूमिहार ब्राह्मण ” शब्द को स्वीकृत किया गया और साथ ही साथ इस शब्द के प्रचार व् प्रसार का काम भी हाथ में लिया गया.इसी वर्ष महाराज बनारस तथा स्व.लंगट सिंह जी के सहयोग से मुजफ्फरपुर में एक कालेज खोला गया.बाद में तिरहुत कमिश्नरी के कमिश्नर का नाम जोड़कर इसे जी.बी.बी. कालेज के नाम से पुकारा गया.आज वही कालेज लंगट सिंह कालेज के नाम से प्रसिद्द है।
भूमिहार ब्राह्मणों के इतिहास को पढने से पता चलता है की अधिकांश समाजशास्त्रियों ने भूमिहार ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज की शाखा माना है.भूमिहार ब्राह्मन का मूलस्थान मदारपुर है जो कानपुर – फरूखाबाद की सीमा पर बिल्हौर स्टेशन के पास है..१५२८ में बाबर ने मदारपुर पर अचानक आक्रमण कर दिया.इस भीषण युद्ध में वहा के ब्राह्मणों सहित सबलोग मार डाले गए.इस हत्याकांड से किसी प्रकार अनंतराम ब्राह्मण की पत्नी बच निकली थी जो बाद में एक बालकजन्म दे कर इस लोक से चली गई.इस बालक का नाम गर्भू तेवारी रखा गया.गर्भू तेवारी के खानदान के लोग कान्यकुब्ज प्रदेश के अनेक गाँव में बसते है.कालांतर में इनके वंशज उत्तर प्रदेश तथा बिहार के विभिन्न गाँव में बस गए.गर्भू तेवारी के वंशज भूमिहार ब्रह्मण कहलाये .इनसे वैवाहिक संपर्क रखने वाले समस्त ब्राह्मण कालांतर में भूमिहार ब्राह्मण कहलाये
अंग्रेजो ने यहाँ के सामाजिक स्तर का गहन अध्ययन कर अपने गजेतिअरों एवं अन्य पुस्तकों में भूमिहारो के उपवर्गों का उल्लेख किया है गढ़वाल काल के बाद मुसलमानों से त्रस्त भूमिहार ब्राह्मन ने जब कान्यकुब्ज क्षेत्र से पूर्व की ओर पलायन प्रारंभ किया और अपनी सुविधानुसार यत्र तत्र बस गए तो अनेक उपवर्गों के नाम से संबोधित होने लगे,यथा – ड्रोनवार ,गौतम,कान्यकुब्ज,जेथारिया आदि.अनेक कारणों,अनेक रीतियों से उपवर्गों का नामकरण किया गया.कुछ लोगो ने अपने आदि पुरुष से अपना नामकरण किया और कुछ लोगो ने गोत्र से.कुछ का नामकरण उनके स्थान से हुवा जैसे – सोनभद्र नदी के किनारे रहने वालो का नाम सोन भरिया, सरस्वती नदी के किनारे वाले सर्वारिया,,सरयू नदी के पार वाले सरयूपारी,आदि.मूलडीह के नाम पर भी कुछ लोगो का नामकरण हुआ जैसे,जेथारिया,हीरापुर पण्डे,वेलौचे,मचैया पाण्डे,कुसुमि तेवरी,ब्र्हम्पुरिये ,दीक्षित ,जुझौतिया ,आदि।
पिपरा के मिसिर ,सोहगौरा के तिवारी ,हिरापुरी पांडे, घोर्नर के तिवारी ,माम्खोर के शुक्ल,भरसी मिश्र,हस्त्गामे के पांडे,नैनीजोर के तिवारी ,गाना के मिश्र ,मचैया के पांडे,दुमतिकार तिवारी ,आदि.भूमिहार ब्राह्मन में हैं. ” वे ही ब्राह्मण भूमि का मालिक होने से भूमिहार कहलाने लगे और भूमिहारों को अपने में लेते हुए भूमिहार लोग पूर्व में कनौजिया से मिल जाते हैं
भूमिहारो में आपसी भाईचारा और एकता होती है। भूमिहार अंतर्विवाही है और जाती में ही विवाह करते है। पहले वर्ष के अंत में माता काली की पूजा करना, गरीबों और शरणागतों को भोजन करना और वस्त्र बाटना भूमिहारो के बहुत से गावों में एक प्रथा थी। भूमिहार को भूमि दान में मिलती थी। और स्वयं भी तलवार के दम पर भूमिहारो ने भूमि अर्जित की है। कृषि कर्म भूमिहारो का पेशा था। आज भूमिहार हर क्षेत्र में अग्रणीय है। ब्राह्मण होने के कारण भूमिहार स्वयं हल नहीं जोतते है।
१. सर्वप्रथम १८८५ में ऋषिकुल भूषण काशी नरेश महाराज श्री इश्वरी प्रसाद सिंह जी ने वाराणसी में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा की स्थापना की.
२. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई.
३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई.
४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित
५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की.
६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की.
७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की.
८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया.
९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया.
१०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता डा.बी.एस.पूंजे (चित्पावन ब्राह्मण) ने की.
११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस ) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ.और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन पंडित अनंत शास्त्री फडके (चित्पावन ) की अध्यक्षता में हुआ.
१२. १९७५ में लक्नाऊ में भूमेश्वर समाज तथा कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना हुई.
१३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ.
१४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन
१५. २३ अक्टूबर १९८४ में गाजीपुर में प्रांतीय भुमेश्वर समाज का अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता श्री मथुरा राय ने की.डा.रघुनाथ सिंह जी ने इस सम्मलेन का उदघाटन किया.
१६. १८८९ में अल्लाहाबाद में भूमेश्वर समाज की स्थापना हुई.
२. १८८५ में अखिल भारतीय त्यागी महासभा की स्थापना मेरठ में हुई.
३. १८९० में मोहियल सभा की स्थापना हुई.
४. १९१३ में स्वामी सहजानंद जी ने बलिया में आयोजित
५. १९२६ में पटना में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासभा का अधिवेशन हुआ जिसकी अध्यक्षता चौधरी रघुवीर नारायण सिंह त्यागी ने की.
६. १९२७ में प्रथम याचक ब्राह्मण सम्मलेन की अध्यक्षता सर गणेश दत्त ने की.
७. १९२७ में मेरठ में ही अखिल भारतीय त्यागी महासभा की अध्यक्षता राय बहादुर जगदेव राय ने की.
८. १९२६-२७ में अपने अधिवेशन में कान्यकुब्ज ब्राह्मणों ने प्रस्ताव पारित कर भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग घोषित करते हुए अपने समाज के गठन में सम्मलित होने का निमंत्रण दिया.
९. १९२९ में सारस्वत ब्राह्मण महासभा ने भूमिहार ब्राह्मणों को अपना अंग मानते हुए अनेक प्रतिनिधियों को अपने संगठन का सदस्य बनाया.
१०. १९४५ में बेतिया (बिहार) में अखिल भारतीय भूमिहार ब्राह्मण महासम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता डा.बी.एस.पूंजे (चित्पावन ब्राह्मण) ने की.
११. १९६८ में श्री सूर्य नारायण सिंह (बनारस ) के प्रयास से ब्रहामर्शी सेवा समिति का गठन हुआ.और इश वर्ष रोहनिया में एक अधिवेशन पंडित अनंत शास्त्री फडके (चित्पावन ) की अध्यक्षता में हुआ.
१२. १९७५ में लक्नाऊ में भूमेश्वर समाज तथा कानपूर में भूमिहार ब्राह्मण समाज की स्थापना हुई.
१३. १९७९ में अखिल भारतीय ब्रह्मर्षि परिषद् का गठन हुआ.
१४. ८ मार्च १९८१ गोरखपुर में भूमिहार ब्राह्मण समाज का गठन
१५. २३ अक्टूबर १९८४ में गाजीपुर में प्रांतीय भुमेश्वर समाज का अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता श्री मथुरा राय ने की.डा.रघुनाथ सिंह जी ने इस सम्मलेन का उदघाटन किया.
१६. १८८९ में अल्लाहाबाद में भूमेश्वर समाज की स्थापना हुई.





बाभन समुदाय (भूमिहार ब्राह्मण)
बाभन के पर्यायवाची नाम:- अयाचक ब्राह्मण, भूमिहार ब्राह्मण, जमींदार ब्राह्मण, मगही ब्राह्मण, पश्चिमा ब्राह्मण, गृहस्त ब्राह्मण, मिलिट्री ब्राह्मण (military brahman)
उपाधियाँ:-
1) राजसी उपाधियाँ:- सिंह/सिन्हा, राय, शाही, ठाकुर, कुंवर, चौधरी
2) ब्राह्मणवादी उपाधियाँ:- शर्मा, पांडेय, शुक्ल, तिवारी, चौबे, मिश्रा, द्विवेदी, ओझा, दुबे, उपाध्याय, याजी, करजी
भूमिहार या बाभन, (Bhumihar or Babhan) पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार (झारखण्ड मिला कर) में पाई जाने वाली एक ब्राह्मण वर्ग की उपजाति है, जिसका पारंपरिक व्यवसाय भूमि धारण या भूमि आधिपत्य है | भूमिहार और बाभन एक ही जाति के दो प्रचलित नाम है जिसमे भूमिहार भू-स्वामी होने का सूचक है और बाभन जाति का बोधक है | भूमिहार या भौमिक शब्द जमींदार शब्द का समानार्थी है जिसका अर्थ भूस्वामी या भूमि का मालिक होना मात्र है| प्राचीन काल के सामंती व्यवस्था में भूमि शब्द का प्रयोग भूमि अनुदान के लिए किया गया है| राजपुताना गैज़ेटेर में भूमि शब्द का प्रयोग भूमि के अनुदान का बोधक है | भूमिहार वो लोग है जिन्होंने भूमि को या तो अनुदान से या सैन्य अभियान से प्राप्त किया| [1] प्रारम्भ में भूमिहार कोई जाति सूचक शब्द नहीं था ये बस भूस्वामी होने का परिचायक था | योगेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने लिखा है की भूमिहार ब्राह्मण वो ब्राह्मण हैं जो भूस्वामी हो गए| [1] भूमिहार लोग प्रायः राजसी उपाधिया लगते थे, जैसे राय, सिंह, शाही, ठाकुर, चौधरी और कुंवर|[2] ये राजसी उपाधिया बस भूस्वामी होने का बोधक था| १९वी और २०वी शताब्दी के प्रारम्भ तक भूमिहार शब्द कोई जाति सूचक शब्द न होकर भूमिपति होने का बोध करता था| १९ वी शताब्दी के अंत में (१८८५) जमींदार बाभनो की सभा ने बाभनो के लिए भूमिहार ब्राह्मण शब्द लाया | १९११ के जनगणना रिपोर्ट से पहले की जनगणना दस्तावेजों में बाभनो के लिए बस बाभन शब्द का ही प्रयोग हुआ है | बाभनो को ब्रिटिश जनगणना में सैन्य और प्रभावी समुदाय के वर्ग (military and dominant caste) में वर्गीकृत किया गया था | तागा (त्यागी) को भी इसी वर्ग में रखा गया था | १९वी शताब्दी में बाभनो के लिए कुछ जलनशील समुदाय द्वारा मिथ्या और कल्पित कथा लिखा गया जिसमे ये दिखाया गया की बाभन का मतलब गिरा हुआ या पतित ब्राह्मण होता है | इसके प्रतिउत्तर में भूस्वामी बाभनो ने एक सभा का निर्माण किया जिसे बाद में भूमिहार ब्राह्मण सभा का नाम दिया गया | बाभन अपने आपको श्रेष्ठ ब्राह्मण मानते है और परशुराम द्वारा क्षत्रियो को मारने के उपरांत भूमि मिलने के कारन भूमिहार कहते हैं. भूमिहार ब्राह्मण सभा ने १९११ में बंगाल और बिहार के जनगणना कार्यों के निदेशक (E A Gait) को कई अभ्यावेदन दायर किए, जिसमें तर्क दिया गया कि जनगणना के प्रयोजनों के लिए, “बाभन” शब्द का उपयोग उनका वर्णन करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए और इसके बजाय उन्हें भूमिहार या भूमिधारी ब्राह्मण बुलाया जाना चाहिए।[3][8] इस तरह १९२१ के जनगणना रिपोर्ट में बाभन के साथ भूमिहार ब्राह्मण शब्द जुड़ा और इस जाति को बाभन(भूमिहार ब्राह्मण) लिखा जाने लगा | आज के समय भूमिहार ब्राह्मण शब्द ही छोटा होकर केवल भूमिहार हो गया है | प्राचीन बाभन नाम केवल ब्रिटिश कालीन और उससे पहले के एतिहासिक दस्तबेजो में रह गया है | आज भी मगध के ग्रामीण क्षेत्रो में इस जाति को बाभन के नाम से ही बुलाया जाता है | भूमिहार ब्राह्मण सभा द्वारा प्राचीन बाभन नाम के बदले भूमिहार ब्राह्मण नाम प्रशिद्ध करने के लिए विद्यालय और विश्वविद्यालय का नाम भूमिहार ब्राह्मण रखे गए जैसे लंगट सिंह कॉलेज, भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज के नाम से खोला गया था | भूमिहार केवल बाभन समुदाय का भूस्वामी होने का बोध करने वाला शब्द था जो बाद में मुख्य नाम बन गया |
बाभन शब्द मौर्या शाषक अशोक के शिलालेखों में मिलता है जो मागधी ब्राह्मणो के लिए प्रयुक्त हुआ है | कुछ इतिहासकार इससे यह निष्कर्ष निकलते हैं की बाभन वे ब्राह्मण थे जो बुद्ध की सरण में चले गए और बाद में हिन्दू बन गए | अशोक के शिलालेखों में ऐसा कुछ प्रमाण नहीं मिलता | ये बस एक अनुमान है जिसका कोई ठोस साक्ष्य नहीं है | [4]
रिसले (H. H. Risley) एक विख्यात मानव-जाति विज्ञानविद् थे | उनके अनुशार बाभन दो भाग में बाटे हैं एक मूल और दूसरा गोत्र है | मूल बाभनो के प्राचीन उद्गम स्थान के नाम का बोधक है| गोत्र उस प्राचीन ऋषि के बारे में बताता है जिससे गोत्र धारी निकला है| गोत्र बाभनो और ब्राह्मणो के समान हैं| बाभनो में विवाह में प्रतिबन्ध के लिए गोत्र से ज्यादा मूल को ध्यान दिया जाता है| समान गोत्र वाले बाभन यदि भिन्न भिन्न मूल के हैं तो वैवाहिक प्रतिबन्ध नहीं होता| रिसले का मानना था की बाभनो के अलाबा ऐसी रचना राजपूत में होता है| योगेंद्र नाथ भट्टाचार्य ने ये बताया की मैथिलि और सारस्वत ब्राह्मणो में भी बाभनो जैसी रचना है|[2][1]
बाभन समुदाय की उत्पत्ति के बारे में सबसे विश्वसनीये व्याख्या रामप्रसाद चंद्र की पुस्तक में दी हुई है(Indo-Aryan races, A study of the origin of Indo-Aryan people and institutions by Chanda, Ramaprasad] [4]). बाभन मगध के प्राचीन ब्राह्मण हैं जो तीसरी ईशा पूर्व में ऐसी भाषा बोलते थे जिसमे ब्राह्मणो को बाभन कहा जाता था| इसलिए ये शब्द अशोक के शिलालेखों में मिलता है| मगध में मध्य और उत्तर पश्चिम भारत से बहुत सारे संस्कृत बोलने बाले ब्राह्मण आये जो ब्राह्मण के नाम से प्रशिद्ध हुए और स्थानीय पाली बोलने बाले ब्राह्मण कालांतर में बाभन कहे जाने लगे. मगध में बहुत सारे ब्राह्मण राजवंश हुए जैसे कण्व और शुंग ये स्थानीय ब्राह्मण बाभन नाम से ही जाने जाते थे और ये भूस्वामी भी थे. स्थानीय ब्राह्मणो का मगध शाषन में मुख्य भूमिका रहा है जो बाभन कहलाते थे. ये सभी अयाचक ब्राह्मण वर्ग बाभन थे जो सैन्य और प्रशाषन के कार्यो में भाग लेते थे. फा हियान, चीनी यात्री ने मगध के ब्राह्मणो को ज्ञान गुरु होने के बजाय भू-स्वामी बनने के बारे में लिखा है।
बहुत सारे अन्य ब्राह्मण वर्ग के लोग बाभन समुदाय में मिलते गए और बाभनो के अंग हो गए| कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, चितपावन (चितपोनिया बाभन जो मगध के नवादा में वास करते हैं) मोहयाल (सर गणेश दत्त ) ब्राह्मणो से बहुत सारे भूस्वामी वर्ग बाभनो में मिले और इसके हिस्सा हो गए| स्वयं कशी नरेश सरयूपारीण मूल के बाभन हैं|
संपूर्ण जनगणना के रिकॉर्ड के साथ-साथ जिलों के गजेटियर और अंग्रेजों के समय के मानव-जाति विज्ञान अध्ययन ने बाभन को भुइंहार (भूमिहार का विकृत बोलचाल का शब्द) का पर्याय के रूप में दिखाया है।बाभन शब्द का प्रयोग किसी ने भी उस काल में अन्य ब्राह्मणो के लिए नहीं किया| ब्रिटिश काल में भुइंहार (भूमिहार का विकृत बोलचाल शब्द ) शब्द को लेकर एक उलझन थी , यह शब्द बाभनो के अलावा कुछ पारम्परिक भूस्वामी आदिवासी भी छोटानागपुर में प्रयोग करते थे| भूमिहार शब्द से केवल भूमि का मालिक या भूमि का कारोबारी होने का बोध होता था[6a,b].
ब्रिटिश समय के विश्वसनीय दस्तावेजों में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बाभन या बाम्हन (जो बाभन का एक विकृत बोलचाल का शब्द है) सैन्य और भूमिहार या ज़मींदार ब्राह्मण हैं। फ्रांसिस बुचनान ने बाभनो को मिलिट्री ब्राह्मण, मगही ब्राह्मण, पश्चिमा ब्राह्मण के नाम से सम्बोधित किया है| मगही और पश्चिमा ब्राह्मण बाभनो के मूल के उद्गम स्थान को दर्शाता है जो की मगध और पश्चिम भारत है| बाभनो को भू-पति होने के कारन ही भूमिहार कहा गया|
१९वी और प्रारंभिक २०वी सदी में बाभन समुदाय के प्रमुख भूस्वामी व राजा निम्नलिखित हैं:
1) काशी नरेश, वाराणसी
2) तमकुही राज, गोरखपुर
3) बेतिया राज, चम्पारण
4) टेकरी राज, गया
5) हथवा राज, सारण
6) शिवहर राज,
7) मधुबन के राजकुमार बाबू, चम्पारण
8) पाकुर के राजा, संथाल परगना,
9) आनापुर राज, इलाहाबाद
10) बराओं राज, इलाहाबाद
उपरोक्त लेख नीचे संदर्भ में दी गई पुस्तकों का एक अंश है
References:
[1] Hindu Castes and Sects: An Exposition of the Origin of the Hindu Caste by Jogendra Nath Bhattacharya (https://archive.org/details/hinducastesands00bhatgoog/page/n132)
[2,a] The Tribes And Castes Of Bengal: Ethnographic Glossary, Volume 1 By Risley, Herbert Hope, Sir,
(https://archive.org/details/TheTribesAndCastesOfBengal/page/n139)
[2,b] Census Of India 1901 Vol.1 (india ) (ethnographic Appendices) By Risley, Herbert Hope, Sir,
(https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.55922/page/n199)
[3]Peasants and Monks in British India by William R. Pinch
Peasants and Monks in British India (https://publishing.cdlib.org/ucpressebooks/view?docId=ft22900465&chunk.id=s1.3.13&toc.id=ch3&toc.depth=1&brand=ucpress&anchor.id=d0e4900#X)
[4] Indo-Aryan races: a study of the origin of Indo-Aryan people and institutions : Chanda, Ramaprasad
(https://archive.org/details/Indo-aryanRacesAStudyOfTheOriginOfIndo-aryanPeopleAndInstitutions/page/n173)
[5] Hindu Tribes and castes
Hindu Tribes And Castes Vol 1 : Sherring : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.469749/page/n63)
[6,a] Census of india 1901, Census of India, 1901 : India. Census Commissioner : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/cu31924071145571/page/n405)
[6,b] East India (Census) [microform] : General report of the census of India, 1901
( https://archive.org/details/pts_eastindiacensusg_3720-1115/page/n513)
[7] Refer Census of India from 1872 -1881–1891–1901–1911–1921–1931–1941. These census and ethnographic study by Indian and British historians and officers clearly tells about all the castes in India.
[8]Census of India 1931 (Census Of India 1931 Vol.7 Bihar And Orissa Pt.1 Report : Lacey, W.g. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive)
[9]. Statistical Account Of Bengal Vol.12 : Hunter, W.w. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.534069/page/n197)
[10]. A Statistical Account Of Bengal Vol.xiii : W.w.hunter : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.279433/page/n237?q=babhan)
[11]. Report of a tour in Bihar and Bengal in 1879-80. Vol. 15 : Cunningham, Alexander : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/pli.kerala.rare.12155/page/n121)
[12]. A Manual of the Land Revenue Systems and Land Tenures of British India : Baden Henry Baden -Powell : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/amanuallandreve01powgoog/page/n247)
[13]. Report On The Census Of Bengal(1872) : Beverley, H. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.94529/page/n217)
[14]. Bengal District Gazetteers Sahabad : O’malley L. S. S. : Fre (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206888/page/n59)e Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive
[15]. Bengal District Gazetteers Darbhanga : O’malley L. S.s. : Free Download, Borrow, and Streaming : Internet Archive (https://archive.org/details/in.ernet.dli.2015.206867/page/n55)
Babhan should use babhan and military brahmin terms along with bhumihar. Bhumihar was merely a landholding title not a caste itself, the name of caste was babhan or militry brahmin. You will find almost all official documents of british era has mentioned this community merely with babhan terminology. Francis buchanan has mentioned this community as babhan, military brahmin, magahi brahmin and paschima brahman. Francis Buchanan has mentioned about bhumihar and zamindar to be similar terms meaning involved in management of land. Bhumihar is merely a land holding designation of 19th century not the name of caste which has gained focus and momentum because of patronage of few big landlords. Swami shajanand sarswati gave brahmarshi term in 20th century but the actual babhan name by which this community was known for centuries got hardly any acknowledgement. Bhumihar is not a caste it is landholding title of babhans and babhan is the name of caste which is military brahmin. Bhumihar term is just like thakur term. In many provinces thakur is used as synonym for rajputs but not used invariably as synonym everywhere. Similarly bhumihar term does not always mean babhan or babhan landlords. In assam bhumihar are mere landholders of assam. similarly at many other place this term is merely used to show hereditary landed estate. Bhumihar merely mean holder or taker of Bhum, where bhum means a hereditary landed estate free of tax assessment. In akbar era bhoome was the term used to convey the meaning of bhumihar term(as indicated in aine akberi). Prior to 19th century this term was hardly existent. I request all menbers of babhan community to use babhan or military brahmin term over bhumihar. After abolition of zamindari this feudal title or designation perhaps does not have any relevance.
Comments are closed.