भारत नक्सलवाद की समस्या से लंबे समय से जूझ रहा है.पूरे देश में नक्सली समय-समय पर तांडव करते रहते हैं.कई जगहों पर इनकी समानांतर सरकार है.स्थानीय पुलिस तो इनके सामने बेबस है ही, सेना भी पूरी तरह से कारगर नहीं.लेकिन नब्बे के दशक में एक ऐसा शख्स बिहार की धरती पर अवतरित हुआ जो देखते-देखते नक्सलियों के लिए खौफ का पर्याय बन गया.नक्सली डाल-डाल तो वे पात-पात थे. उनकी दूरदर्शिता और योजना का अनुमान लगाना भी नक्सलियों के बूते की बात नहीं थी और संगठन शक्ति ऐसी बेमिसाल कि दुश्मन भी पानी मांगता. बाहुबल और चाणक्य नीति का ऐसा बेजोड़ इस्तेमाल वे करते कि सामने वाला चारो खाने चित्त. वे नक्सलियों के लिए काल पुरुष बन गए थे और ये शख्स कोई और नहीं बल्कि बाबा ब्रह्मेश्वर यानी ब्रह्मेश्वर सिंह मुखिया थे जिन्हें नक्सली मीडिया ने ‘बिहार का कसाई’ नाम से पुकारा और बदनाम करने में कोई कोर – कसर नहीं छोड़ी.
लेकिन हकीकत ये है कि बाबा ब्रह्मेश्वर ने आजीवन नक्सलियों से लोहा लिया और किसानों की रक्षा करते-करते अपने जीवन का बलिदान कर दिया. वक्त उन्हें समझ नहीं पाया या फिर समझने की कोशिश ही नहीं की. मीडिया और छिछली राजनीति ने उनके संघर्ष को जातीय रंग में रंग दिया जबकि असलियत में ये लड़ाई उस अन्याय और आतंकवाद के खिलाफ थी जो नक्सलवादी देशद्रोहियों के इशारों पर चीन और पाकिस्तान के पैसों से करते थे.मीडिया में लगे इसी पैसे के प्रभाव में नक्सली मीडिया ने योद्धा को कसाई का दर्जा दिया और खूब दुष्प्रचार किया. दूसरी तरफ नक्सलवाद का अप्रत्यक्ष तौर पर महिमामंडन किया क्योंकि नक्सली के एजेंडे में नक्सलवाद का विस्तार था. लेकिन उस विस्तार की राह में बाबा ब्रह्मेश्वर ऐसी चट्टान बनकर सामने आए कि बिहार में नक्सलवाद की जड़े हिल गयी. खौफ के जरिए साम्राज्य बनाने वाले नक्सली खुद खौफ़जदा हो गए. वो भी एक ऐसे शख्स से जिसने हथियार नहीं उठाया लेकिन उसने जो हथियार बनाया, उसने एक वक्त पर बिहार में नक्सलवाद की कमर तोड़कर रख दी. इस हथियार का नाम था रणवीर सेना.

 

रणवीर सेना को नक्सलवाद से इस लड़ाई में किसानों और स्थानीय लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला और देखते-देखते नक्सलवाद के खिलाफ वो देश के इतिहास का सबसे कारगर हथियार बनकर उभरा जिसके नाम से ही देशभर के नक्सली और दिल्ली-मुंबई में बैठे उनके वामपंथी आका थर-थर कांपने लगे. तब नक्सली नेता और मीडिया ने नक्सली सोंच के तहत नक्सलवाद के खिलाफ उनके मुहिम को जातीय रंग में रंग कर उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने की साजिश रची और उसमें काफी हद तक कामयाब भी रहे और उनकी साजिश को कामयाब बनाने में तत्कालीन सरकारों ने भी बखूबी सहयोग दिया. लेकिन निष्पक्षता से नक्सलवाद के खिलाफ बाबा ब्रह्मेश्वर की कार्यशैली को देखेंगे तो पायेंगे उनकी नीति और कार्यशैली बेहद कारगर थी और यदि सरकार उनके दिखाए मार्ग पर चलती तो आज बिहार क्या देश से नक्सलवाद का नामोनिशान मिट गया होता. नक्सलवाद के खिलाफ उनसे बड़ा नायक देश में कोई दूसरा नहीं.अफ़सोस राजनीति की छोटी सोंच उनके महामात्य को समझ ही नहीं पाया.
दरअसल अपने समय में नक्सलियों के खिलाफ जननायक ब्रहमेश्वर मुखिया से बड़ा देश में कोई रणनीतिकार नहीं था. यदि उन्हें ये मिशन दे दिया जाता तो आज देश से नक्सलवाद और उग्रवाद का नामोनिशान मिट जाता. आधे माओवादी नेपाल के रास्ते चीन भाग जाते और आधे राष्ट्रद्रोही पाकिस्तान चले जाते. बाकी को आधुनिक परशुराम दोजख का रास्ता दिखा देते. (परशुराम की डायरी)

 ज़मीन से ज़मीन की बात – भू-मंत्र