बिहार में सोशल जस्टिस की टेस्टिंग पिछले 25 साल से चल रही है. पहले लालू यादव ने टेस्टिंग की, फिर उनसे अलग होकर नीतिश कुमार ने की. व्यक्तिगत रूप से दोनों के टेस्ट सफल रहे. लेकिन उससे भी जब गरीब-गुरबों का भला न हुआ तो सोंचा गया कि एक बार मिलकर ज्वाईंट टेस्टिंग की जाए और इस तरह वर्तमान दौर आया. इस बार इस टेस्टिंग का जलवा भागलपुर की भूमिहीन महिलाओं पर टूटा. ज़मीन से ज़मीन की बात करने पर उन्हें बेतरह ज़मीन पर पटक-पटक कर धोया गया और इस तरह 25 साल से चल रहा गरीबों के उद्धार का प्रयोग अंततः परवान चढ़ा. तो जिस सोशल इंजीनियरिंग के नारों को चुनाव में भुनाकर लालू-नीतिश-पासवान सरीखे नेता सत्ता से चिपके रहे,उस सोशल इंजीनियरिंग की सफलता की कहानी खुद इन्हीं लोगों ने दिखा दी.गौरतलब ये है कि सोशल इंजीनियरिंग के चक्कर में इन्होने पिछले 25 सालों से बिहारियों को माफ कीजियेगा चू... बनाया. पूरी तरह से जाति के जंजाल में फंसाकर विकास की हवा पंक्चर कर दी और फिर भी मसीहा का दर्जा पाते रहे.बहरहाल भागलपुर की उन तस्वीरों के साथ हम सोशल मीडिया पर आयी एक टिप्पणी के साथ आपको छोड़े जाते हैं. 'शशि शेखर' की ये टिप्पणी सोशल जस्टिस से सोशल इंजीनियरिंग के खेल को अच्छी तरह से बेनकाब करती है. (परशुराम)
नीतीश कुमार शराबबन्दी के झुनझुने से आगे नहीँ बढ पा रहे है?
सोशल जस्टिस से सोशल इंजीनियरिंग तक पहुंचते–पहुंचते भागलपुर आ जाता है… 15 साल उस लालू यादव के, जिसकी आलोचना करना भी अपना समय बर्बाद करने जैसा है. 10 साल नीतीशे कुमार. हमारी पीढी ने इसी बिहार को देखा है और देख रहा है. 25 साल, हमारी पीढी की उम्र का आधा से अधिक समय.भागलपुर मेँ लोक के पीठ पर तंत्र का जो डंडा पडा है, वो न पहला है, न आखिरी. ये उनकी नियति है कि वे बिहार मेँ रह कर लाठी खाते है. हमारी नियति है कि हम अपने जड से कट कर हर रोज एक एक पत्ता सूखने को विवश है. मेरे जैसे भूरेबाल और उन जैसे दलितोँ के बीच का शायद यही एक फर्क है. फिर, सवाल है कि हमने नीतीश का समर्थन क्योँ किया? भाजपा का विरोध क्योँ किया? हमने लालू को क्योँ चुना? क्या सिर्फ इसलिए कि भाजपा को हराना था? या, इसलिए कि नीतीश कुमार के रूप मेँ आशा की एक किरण दिखी थी? तो क्या हुआ उम्मीद की उस किरण का? क्योँ नीतीश कुमार शराबबन्दी के झुनझुने से आगे नहीँ बढ पा रहे है?क्योँ सोशल जस्टिस के स्वघोषित चैंपियन लालू यादव और सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातियोँ के उपवर्ग (जैसे महादलित) बनाने वाले नीतीश कुमार की सरकार मेँ दलितोँ पर लाठी चलती है? क्योँ 25 साल के सामाजिक न्याय के तथाकथित संघर्ष के बाद भी दलितोँ को 4 डिसमिल जमीन के लिए अनशन करना पडता है?
दलित उद्यमिता, दलितोँ का आर्थिक सशक्तिकरण जैसे सवाल पूछना तो इसलिए भी गुनाह है क्योंकि मेरे जैसे भूरेबाल ने भी कभी ये सवाल करना न सीखा, न पूछने की हिम्मत की. 15 साल तक मुसहरोँ के बच्चोँ के बाल कटवा कर, चरवाहा विद्यालय खोल कर लालू यादव ने बिहारियोँ को उनकी औकात मेँ रखा तो नीतीश कुमार ने ठेके पर नौकरी देने के गुजराती माडल से हम बिहारियोँ को फुसलाते रहे. ये अलग बात है कि जब कभी भी आशाकर्मी, प्राथमिक शिक्षक अपना वेतन बढाने के लिए पटना मेँ धरना देने जाते थे तो उन पर जबरदस्त लाठी चार्ज होता था. जाहिर है, उसमेँ भूरेबाल भी रहे होंगे और दलित भी, पिछडे भी. तो, कोई हर्ज नहीँ है मूर्ख बनने मेँ. हम 25 साल से मूर्ख बन कर भी खुश है. आगे भी रहेंगे. श्रीमान नीतीश कुमार आप शराबबन्दी के बहाने गान्धी बनने का सपना देखिए और श्रीमान लालू यादव आप तो बस अपने दो लायक बेटोँ को स्थापित करने मेँ अपनी उर्जा लगाईए. लेकिन, एक बात याद रखिएगा. वैसे आप बहुत वरिष्ट लोग है, याद ही होगा. कांग्रेस का सीडो सेकुलरिज्म जब भागलपुर पहुंचा था तब इसी भागलपुर ने कांग्रेस को बिहार से उखाड फेंका था. इस बार आपका सोशल जस्टिस और सोशल इंजीनियरिंग भागलपुर पहुंच गया है…




